अन्वेषण अध्याय 3 प्रश्न और क्रियाकलाप

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
विश्लेषण करें कि किस प्रकार भूगोल (विशेषकर पर्वत और समुद्र तट) ने मराठा सैन्य रणनीति और राज्य-निर्माण को निर्धारित किया।
उत्तर

भूगोल ने मराठों की केवल सहायता नहीं की — उसने उनकी रणनीति स्वयं तय कर दी। सह्याद्रि की पहाड़ियों ने दुर्ग और गुरिल्ला युद्ध को सबसे सस्ता विकल्प बना दिया; कोंकण के तट ने नौसेना को अनिवार्य बना दिया; और उसके आगे फैले खुले दक्कन पठार ने तीव्र घुड़सवार सेना को पूरे भारत तक शक्ति पहुँचाने का साधन बना दिया।

तटीय दुर्ग — सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग — बंदरगाहों और बेड़े की रक्षा बंदरगाह — दाभोल, राजापुर, मालवन, वेंगुर्ला — मस्कट, मोचा, मलक्का तक व्यापार सह्याद्रि के पहाड़ी दुर्ग — रायगढ़, प्रतापगढ़ — घाट-मार्गों पर नियंत्रण दक्कन पठार — खुला भूभाग, जहाँ हल्की घुड़सवार सेना दूर तक तेज चल सके अरब सागर कोंकण तट सह्याद्रि दक्कन पठार
मराठा भूमि का पश्चिम से पूर्व काट-चित्र। भूभाग के प्रत्येक पट्टे ने राज्य का एक अलग अंग बनाया — तट पर जलदुर्ग और बंदरगाह, ढलान पर पहाड़ी दुर्ग, पठार पर घुड़सवार सेना। स्थान-नाम चित्र 3.9 के मानचित्र से लिए गए हैं।

1. पर्वतों ने गुरिल्ला युद्ध सस्ता और घेराबंदी महँगी बना दी। अध्याय कहता है कि शिवाजी ने ‘गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई’, जिसमें छोटे दल भूभाग के गहन ज्ञान से तीव्र गति से आकस्मिक आक्रमण करते हैं। यह परिभाषा केवल विषम भूभाग में चरितार्थ होती है। सह्याद्रि में सेना को सँकरे घाट-मार्गों से चलना पड़ता है; एक छोटा स्थानीय दल उसके अग्र या पश्च भाग पर प्रहार कर पहाड़ी पर लुप्त हो सकता है। प्रतापगढ़ की तलहटी के घने जंगलों में ‘पहाड़ों में छिपे मराठों’ ने अफज़ल खाँ की सेना को इसी प्रकार परास्त किया।

2. पर्वतों ने दुर्ग को राज्य का स्वाभाविक रूप बना दिया। जिस पहाड़ी तक चढ़ाई का एक ही खड़ा मार्ग हो, उसे कुछ सौ सैनिक हजारों के विरुद्ध रोक सकते हैं। इसीलिए शिवाजी ने 16 वर्ष की आयु में ‘उपेक्षित और निर्जन दुर्गों पर कब्जा करके उनकी सुरक्षा को सुदृढ़’ किया, और दुर्ग ‘मराठा शक्ति के मुख्य आधार’ बने। इसी कारण रामचंद्रपंत अमात्य लिख सके कि यह राज्य ‘केवल दुर्गों से ही बनाया गया था’।

3. समुद्र तट ने नौसेना को अनिवार्य बनाया। जब राज्य पश्चिमी तट तक पहुँचा तो तटीय संसाधनों तक पहुँच आवश्यक हो गई — और जिस तट की रक्षा न हो, वहाँ शत्रु उतर सकता है। इसलिए 1657 में मराठा नौसेना बनी और सिंधुदुर्ग (चित्र 3.6) जैसे नौसैनिक दुर्ग बने। यह असाधारण था — बीजापुर के पास व्यापारी जहाज तो थे पर स्थायी नौसेना नहीं, और मुगलों में नौसेना का उपयोग अत्यंत सीमित था।

4. तट ने यह भी तय किया कि शत्रु कौन होगा। मराठों के पास बंदरगाह थे — मानचित्र में दाभोल, राजापुर, मालवन और वेंगुर्ला, तथा मस्कट, मोचा और मलक्का के मार्ग — इसलिए उनका सीधा टकराव यूरोपीय सामुद्रिक शक्ति से हुआ, जो कार्ताज व्यापार-पत्रों पर टिकी थी। मराठा पोत तकनीकी रूप से पीछे थे, फिर भी कान्होजी आंग्रे ने ‘कुशल भूगोल-ज्ञान और युद्धनीति’ से विजय पाई। भूगोल ने तकनीक की कमी पूरी कर दी।

5. पठार ने विस्तार का रूप तय किया। घाट के पार भूमि खुल जाती है। खुला भूभाग उन घुड़सवारों के अनुकूल है जो तेज चलें और मार्ग में ही निर्वाह करें — चौथ और सरदेशमुखी उन प्रांतों से इसी गतिशीलता के बल पर वसूली जा सकती थी जहाँ मराठों की स्थायी सेना नहीं थी। यही गतिशीलता 18वीं शताब्दी में उन्हें दिल्ली, लाहौर, अटक और पेशावर तक ले गई।

6. दूरी स्वयं एक अस्त्र बनी। 1677 के दक्षिण-दिग्विजय से उत्तरी तमिलनाडु और कर्नाटक के भाग जुड़े, जिसने अध्याय के अनुसार ‘मराठों को मुगल आक्रमण के विरुद्ध रणनीतिक रूप से उल्लेखनीय सामरिक सुदृढ़ता प्रदान की’। औरंगजेब ने रायगढ़ ले लिया, तो राजाराम ने युद्ध दूर दक्षिण के जिंजी से चलाया। जिस राज्य के पास गहराई हो, वह राजधानी छिन जाने से समाप्त नहीं होता।

यहाँ भूगोल इतना निर्णायक क्यों था: सैनिकों और धन में मराठे सदा छोटी शक्ति थे। भूभाग ही वह एकमात्र लाभ है जिसे खरीदा नहीं जा सकता — मुगल अधिक सैनिक और बेहतर तोपें जुटा सकते थे, पर सह्याद्रि की किसी घाटी या कोंकण की किसी खाड़ी का परिचय नहीं खरीद सकते थे। मूलतः मराठा रणनीति यही निर्णय थी कि युद्ध केवल वहीं लड़ा जाए जहाँ यह लाभ काम करता हो।
प्र2.
कल्पना कीजिए कि आप विद्यार्थियों के लिए किसी मराठा नेता की संक्षिप्त जीवनी लिख रहे हैं। किसी एक व्यक्तित्व (कान्होजी आंग्रे, बाजीराव प्रथम, महादजी शिंदे, अहिल्याबाई होलकर या ताराबाई) का चयन कीजिए और उनकी प्रेरणादायक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए तीन-चार अनुच्छेद लिखिए। किसी एक चुनौती का वर्णन कीजिए जिस पर उन्होंने विजय प्राप्त की।
उत्तर

अच्छी संक्षिप्त जीवनी में क्या चाहिए: आरंभ व्यक्ति से कीजिए, काल से नहीं; चुनौती को शीघ्र सामने लाइए, क्योंकि वही जीवन को कथा बनाती है; अध्याय से लिए गए सटीक वर्ष और स्थान-नाम दीजिए; और अंत में बताइए कि आज उनका क्या शेष है। वाक्य छोटे रखिए।

यदि आप चुनें…वह चुनौती जिस पर जीवनी टिकेगी
ताराबाईपति राजाराम का निधन, दक्कन में औरंगजेब और मुगल सेना, और राज्य अस्तित्व के लिए लड़ रहा है — फिर भी वे रक्षात्मक नहीं, आक्रामक होती हैं
कान्होजी आंग्रेमराठा पोत यूरोपीय पोतों से तकनीकी रूप से पीछे हैं, फिर भी उन्हें समुद्र पर यूरोपीय एकाधिकार तोड़ना है
बाजीराव प्रथमअभी-अभी अस्तित्व की लड़ाई लड़कर निकले एक दक्कनी राज्य को अखिल भारतीय शक्ति में बदलना
महादजी शिंदे1761 की पानीपत की महाविनाशकारी पराजय के बाद उत्तर में मराठा शक्ति को फिर खड़ा करना — वह भी यूरोपीय प्रशिक्षित सेनाओं के सामने
अहिल्याबाई होलकरपति और पुत्र दोनों को खोकर भी तीस वर्ष तक राज्य चलाना

नमूना उत्तर : अहिल्याबाई होलकर

अहिल्याबाई होलकर, होलकर राजवंश की उत्तराधिकारिणी थीं — यह वंश उत्तर भारत में मराठा विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रमुख कुलों में से एक था। 18वीं शताब्दी में होलकरों ने मध्य भारत में, वर्तमान इंदौर के आस-पास एक विशाल क्षेत्र पर शासन किया। किंतु अहिल्याबाई शासन के लिए जन्मी नहीं थीं। सत्ता उन तक सबसे कठिन मार्ग से आई — पहले उन्होंने अपने पति को खोया, फिर अपने पुत्र को।

अनेक शासक ऐसी स्थिति में राज्य किसी सेनानायक को सौंपकर हट जाते। अहिल्याबाई नहीं हटीं। उन्होंने तीस वर्ष तक शासन किया, और अध्याय उन वर्षों का मूल्यांकन बहुत सटीक शब्दों में करता है — उन्होंने ‘प्रजा का ध्यान रखते हुए बुद्धिमानी से प्रशासन चलाया’। यह संयोग जितना सरल सुनाई देता है, उतना है नहीं। शासक कुशल पर कठोर हो सकता है, या दयालु पर दुर्बल; तीन दशक तक एक बड़े राज्य को अच्छे ढंग से चलाने का अर्थ है — इनमें से कोई भी न होना।

उनकी दूसरी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने कोष से भारत के तीर्थ-परिदृश्य का पुनर्निर्माण किया। उन्होंने पूरे देश में सैकड़ों मंदिरों, घाटों, कुओं तथा मार्गों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया — उत्तर में केदारनाथ से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक। इनमें दो प्रसिद्ध क्षतियों की पूर्ति भी थी — उन्होंने वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, जिसे औरंगजेब ने नष्ट किया था, और गुजरात में सोमनाथ मंदिर का, जिसे महमूद गज़नी ने ध्वस्त किया था। ध्यान दीजिए कि तीर्थमार्ग पर बना एक कुआँ या मार्ग वस्तुतः क्या है — वह लोकोपयोगी निर्माण है, जो सबसे निर्धन यात्री के काम आता है, न कि शासक का स्मारक।

उनकी तीसरी उपलब्धि को आज भी छुआ जा सकता है। अहिल्याबाई को मध्य प्रदेश में महेश्वर के बुनाई उद्योग को बढ़ावा देने और पारंपरिक हथकरघा शिल्प को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है, जो आज भी फल-फूल रहा है — महेश्वरी साड़ियाँ वहीं बुनी जाती हैं। वे इसीलिए प्रेरणादायक हैं : सबसे गहरे निजी दुःख के बाद उन्होंने तीस वर्ष ऐसी वस्तुएँ बनाने में लगाए जो उनके बाद भी टिकें — और वे टिकी हैं।

लेखन के लिए संकेत: छोटे विद्यार्थियों के लिए किसी एक तथ्य को चित्र में बदल दीजिए। ‘केदारनाथ से रामेश्वरम तक’ तब तक अर्थहीन है जब तक आप यह न जोड़ें कि यह लगभग पूरे भारत की लंबाई है, और 18वीं शताब्दी में तीर्थयात्री यह दूरी पैदल तय करता था।
प्र3.
यदि आपको आज किसी एक मराठा दुर्ग (जैसे — रायगढ़, सिंधुदुर्ग, जिंजी या प्रतापगढ़) को देखने का अवसर मिले तो आप किसे चुनेंगे और क्यों? उसके इतिहास, वास्तुकला और सामरिक महत्व का अध्ययन कीजिए। कक्षा में अपने निष्कर्षों को डिजिटल या पोस्टर रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

पहले विधि। आप कोई भी दुर्ग चुनें, अध्ययन को प्रश्न में दिए गए तीन शीर्षकों में बाँटिए, और एक चौथा शीर्षक जोड़िए जो प्रस्तुति को आपकी अपनी बनाता है:

  1. इतिहास — किसने बनाया या जीता, और इस अध्याय की कौन-सी घटनाएँ वहाँ घटीं।
  2. वास्तुकला — प्रवेशद्वार, प्राचीरें, जल-संग्रह, और भवन स्थल के अनुसार कैसे बने हैं।
  3. सामरिक महत्व — दुर्ग किस पर नियंत्रण रखता है : कोई घाट, बंदरगाह, मार्ग या राजधानी।
  4. एक प्रश्न जिसका उत्तर अब भी नहीं मिला — ईमानदार खुला प्रश्न सबसे अच्छी अंतिम स्लाइड है।
दुर्गप्रकार (चित्र 3.9)देखने योग्य क्यों
रायगढ़पहाड़ी दुर्गराजधानी — 1674 में यहीं राज्याभिषेक हुआ और 1680 में यहीं निधन; संभाजी के बाद औरंगजेब ने इसे जीत लिया
सिंधुदुर्गतटीय दुर्गमहाराष्ट्र-गोवा सीमा के पास समुद्र में एक चट्टान पर बना — मराठों के कई नौसैनिक दुर्गों में से एक (चित्र 3.6)
प्रतापगढ़पहाड़ी दुर्गइसी की तलहटी में, घने जंगलों के बीच, अफज़ल खाँ से भेंट हुई थी
जिंजीदूर दक्षिण का पहाड़ी दुर्गरायगढ़ के पतन के बाद राजाराम यहीं आए और मुगल-मराठा संघर्ष दक्षिण भारत तक फैला

नमूना उत्तर : मैं रायगढ़ चुनूँगा/चुनूँगी।

इतिहास। मराठा साम्राज्य का औपचारिक आरंभ रायगढ़ में ही हुआ। अध्याय का पहला चित्र (चित्र 3.1) उसी महल का भव्य प्रवेश द्वार दिखाता है जहाँ 1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ — पूर्ण वैदिक विधि-विधान से। इसके बाद उनकी उपाधि ‘श्री राजा शिव छत्रपति’ हुई और उन्होंने अपनी नई संवत् प्रणाली ‘राज्याभिषेक शक’ आरंभ की। 1680 में पचास वर्ष की आयु में यहीं उनका निधन हुआ। संभाजी को बंदी बनाकर मार डालने के बाद औरंगजेब ने रायगढ़ पर भी अधिकार कर लिया।

वास्तुकला। रायगढ़ समुद्र तल से लगभग 800 मीटर ऊँचा एक किलेबंद पर्वतीय पठार है, जहाँ पहुँचने का मुख्य मार्ग एक ही खड़ी चढ़ाई है (आज रोपवे भी है)। यहाँ जो शेष है, वह दिखाता है कि दुर्ग केवल दीवार नहीं, एक कार्यरत राजधानी के रूप में बनाया गया था — विशाल महाद्वार, जिसका मुख ऐसा है कि आक्रमणकारी को सीधे नहीं, बगल से आना पड़े; दुकानों के चबूतरों वाली सीधी बाजारपेठ; जगदीश्वर मंदिर; चट्टान काटकर बनाए गए जल-कुंड, क्योंकि पहाड़ी दुर्ग का जीवन उसके संचित जल पर टिका होता है; और टकमक टोक, वह कगार जहाँ से पूरा चढ़ाई-मार्ग देखा जा सकता है।

सामरिक महत्व। रायगढ़ कोंकण के पीछे सह्याद्रि में स्थित है, इसलिए वह तट और पठार के बीच के मार्गों पर नियंत्रण रखता है और स्वयं अत्यंत दुर्गम है। खुले मैदान के किसी नगर के स्थान पर इसे राजधानी इसीलिए चुना गया — शासन का केंद्र स्वयं एक दुर्ग था। यह रामचंद्रपंत अमात्य की पंक्ति ‘दुर्ग राज्य का आधार हैं’ का मूर्त रूप है।

मेरा खुला प्रश्न : यदि रायगढ़ इतना सुदृढ़ था, तो औरंगजेब ने उसे कैसे लिया? इसका उत्तर खोजने के लिए रसद, विश्वासघात और घेरे की अवधि का अध्ययन करना होगा — और इससे यह भी समझ आता है कि कोई दुर्ग अजेय नहीं होता, केवल महँगा होता है।

प्रस्तुति के लिए: छह स्लाइड पर्याप्त हैं — (1) एक चित्र और एक वाक्य, (2) इतिहास, (3) रेखाचित्र सहित वास्तुकला, (4) छोटे मानचित्र सहित सामरिक महत्व, (5) आज का दुर्ग और उसका संरक्षण, (6) आपका खुला प्रश्न। प्रत्येक चित्र के नीचे उसका स्रोत अवश्य लिखिए।
प्र4.
अध्याय में लिखा है कि अंग्रेजों ने भारत को मुगलों या किसी भी अन्य शक्ति से अधिक मराठों से छीना। आपके विचार में इसका क्या अर्थ है? अध्याय में दिए गए कौन-से प्रमाण इस विचार का समर्थन करते हैं?
उत्तर

इसका अर्थ यह है कि 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक मुगल साम्राज्य केवल नाम का साम्राज्य रह गया था और भारत के बड़े भाग पर वास्तविक नियंत्रण मराठों के पास आ चुका था। इसलिए अंग्रेजों ने जब भारत पर अधिकार किया, तो जो भूभाग और जो सत्ता उन्होंने वास्तव में ली, वह मुख्यतः मराठा थी, मुगल नहीं।

1707 के बाद मुगल सत्ता का पतन
→ मध्य और उत्तर भारत के अधिकांश भाग तथा दिल्ली मराठों के पास
→ भारत पर शासन के लिए अंग्रेजों को मराठों को हराना आवश्यक
→ तीन आंग्ल-मराठा युद्ध, 1775 – 1818

अध्याय से प्रमाण

  • अंग्रेजों के प्रतिद्वंद्वी मराठे थे, मुगल नहीं। ‘अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में अंग्रेजों के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मराठे ही थे।’
  • भूभाग सबसे अधिक उन्हीं के पास था। मराठा शासन ने ‘अंग्रेजों द्वारा उपमहाद्वीप पर अधिकार से पूर्वी, उत्तरी और मध्य भारत के अधिकांश भागों पर नियंत्रण कर सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य स्थापित किया’।
  • दिल्ली स्वयं मराठों के पास थी। दिल्ली पर मराठा नियंत्रण 1754 में आरंभ हुआ; महादजी शिंदे ने 1771 में उसे पुनः जीता और वह ‘अग्रिम तीन दशकों तक मराठों के नियंत्रण में रही’, तदनंतर अंग्रेजों ने अधिकार किया। अर्थात मुगल राजधानी भी अंग्रेजों ने मराठों से ली।
  • इसमें तीन युद्ध और तैंतालीस वर्ष लगे। आंग्ल-मराठा युद्ध 1775 से 1818 तक चले; पहला युद्ध (1775–1782) मराठों ने जीता, और मराठा शक्ति का अंत केवल तीसरे युद्ध से हुआ। किसी अन्य भारतीय शक्ति के लिए इतना नहीं करना पड़ा।
  • प्रतिरोध का संगठन भी मराठों ने किया। नाना फड़णवीस को पहला अखिल भारतीय ब्रिटिश-विरोधी गठबंधन बनाने का श्रेय है, जिसमें मैसूर के हैदर अली और हैदराबाद के निजाम जैसे पुराने विरोधी भी सम्मिलित हुए।
  • वे अंततः हारे क्यों, यह भी लिखा है — ‘मराठों में बढ़ते आंतरिक कलह और विघटन एवं अंग्रेजों की उत्तम संगठनात्मक क्षमता और तकनीकी श्रेष्ठता के कारण’। ध्यान दीजिए, इनमें से कोई कारण मुगल शक्ति नहीं है।
इस वाक्य पर चर्चा क्यों होती है: इतिहासकार इस पर सहमत हैं कि मराठे अंग्रेजों की अंतिम बड़ी बाधा थे, किंतु आरंभ को वे अलग-अलग तौलते हैं। एक दृष्टिकोण यह बल देता है कि ब्रिटिश सत्ता की नींव पहले और अन्यत्र पड़ी — बंगाल में, जिसके राजस्व से 1760 के दशक के बाद वे सेनाएँ खड़ी हुईं जो आगे चलकर मराठों से लड़ीं — और यह भी कि मैसूर तथा सिख राज्य को भी पराजित करना पड़ा। अध्याय के कथन के पक्ष में सबसे प्रबल तर्क विस्तार और अंत-बिंदु का है : विजय का व्यय चाहे कहीं से आया हो, उत्तरी और मध्य भारत की जो भूमि अंततः अंग्रेजों के अधीन आई, वह मुख्यतः मराठों के हाथ से गई, और 1818 में मराठा शक्ति के पतन से पहले यह विजय पूरी नहीं हुई। दोनों बातें एक साथ सही हो सकती हैं — अच्छा उत्तर यही कहेगा।
प्र5.
तुलना कीजिए कि छत्रपति शिवाजी और उत्तरवर्ती मराठों ने धार्मिक स्थलों और विभिन्न धर्म के लोगों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया। इस अध्याय में कौन-सा प्रमाण धार्मिक विविधता के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है?
उत्तर

छत्रपति शिवाजी और उत्तरवर्ती मराठे, दोनों एक ही नीति पर चले — अपनी परंपरा की रक्षा और पुनरुत्थान, किंतु अन्य धर्मों को लक्ष्य बनाए बिना। अध्याय का निष्कर्ष यही है कि मराठों ने ‘बिना किसी धार्मिक भेदभाव के स्थानीय हिंदू परंपराओं को भी पुनर्जीवित किया’।

प्रश्नछत्रपति शिवाजीउत्तरवर्ती मराठे
युद्ध में धार्मिक स्थलों पर आक्रमण?नहीं। सूरत में लगभग एक करोड़ रुपये का खजाना लेने पर भी उन्होंने ‘धार्मिक स्थलों पर आक्रमण न करने का ध्यान रखा’ और दानवीर मोहनदास पारेख के घर को सुरक्षित रखाअध्याय पूजा-स्थलों पर आक्रमण की कोई नीति दर्ज नहीं करता; वह यह अवश्य कहता है कि सरदारों के स्वायत्त होने पर ‘कभी-कभी अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार भी हुए जो छत्रपति शिवाजी के मूल्यों से बिल्कुल विपरीत थे’
अपनी परंपरा‘एक धर्मनिष्ठ हिंदू, जो अपने धर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मों का भी सम्मान करते थे’; अपवित्र किए गए मंदिरों का पुनर्निर्माण; संस्कृत-मराठी साहित्य, धार्मिक संस्थाओं और पारंपरिक कलाओं को प्रोत्साहनअहिल्याबाई होलकर ने काशी विश्वनाथ और सोमनाथ मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया तथा केदारनाथ से रामेश्वरम तक सैकड़ों मंदिर, घाट, कुएँ और मार्ग बनवाए; नागपुर के भोंसले के संरक्षण से पुरी में जगन्नाथ पूजा पुनर्जीवित हुई, जो मुगल शासन में प्रायः बाधित रहती थी
शासन और धर्मधार्मिक विषय आठ विभागों में से एक थे — अष्टप्रधान मंडल में पंडितराव — अर्थात धर्म पूरा शासन नहीं थातंजावुर के मराठों ने ‘समृद्ध और नवीनता से परिपूर्ण समन्वयकारी संस्कृति’ को संरक्षण दिया; सरफोजी द्वितीय के धन्वंतरि महल में भारतीय और पाश्चात्य दोनों पद्धतियों से निःशुल्क उपचार होता था
भाषा और प्रतीकप्रचलित फारसी मुहरों के स्थान पर संस्कृत मुहर, और देवनागरी में सिक्के — यह सांस्कृतिक आत्म-प्रतिष्ठा थी, दूसरों का दमन नहीं‘गणपति-पंतप्रधान रुपया’ पर दो लिपियों — देवनागरी और फारसी — में लेख उत्कीर्ण हैं; 18वीं शताब्दी में मराठों ने लोकप्रिय मुगल-मुद्राशैली अपनाकर उसमें अपने प्रतीक जोड़े
धर्मों के पार राजनीतिउनके शत्रु शासक थे, समुदाय नहीं — वे बीजापुर और मुगलों से लड़े, और अलग से अपनी प्रजा को यूरोपीय दास-व्यापारियों से बचायानाना फड़णवीस ने मैसूर के हैदर अली और हैदराबाद के निजाम — दोनों मुस्लिम शासक और पुराने विरोधी — के साथ ब्रिटिश-विरोधी गठबंधन बनाया
सिक्का सबसे तीखा प्रमाण क्यों है: सिक्का राज्य का सबसे सार्वजनिक दस्तावेज है — वह हर व्यक्ति के हाथ में जाता है। पेशवा के अधीन सेनानायक पटवर्धनों ने उसकी एक ओर गणपति का आवाहन रखा और दूसरी ओर पेशवा के प्रति निष्ठा, और पूरा लेख देवनागरी तथा फारसी दोनों में उत्कीर्ण कराया। जो राज्य दूसरी परंपराओं को मिटाना चाहता हो, वह उनकी लिपि अपनी मुद्रा पर नहीं रखता।
परीक्षा में इस उत्तर के लिए संकेत: प्रश्न ‘तुलना कीजिए’ कहता है, इसलिए उत्तर में एक समानता और एक अंतर दोनों आने चाहिए। समानता — रक्षा है, उत्पीड़न नहीं, यह नीति दोनों काल में एक ही रही। अंतर — शिवाजी इसे केंद्रीकृत, वेतनभोगी प्रशासन के बल पर कठोरता से लागू कराते थे, जबकि बाद में अध्याय स्वयं मानता है कि स्वायत्त सरदार कभी-कभी उनके स्तर तक नहीं पहुँचे।
प्र6.
इस अध्याय में वर्णित है कि मराठों के लिए दुर्ग ‘राज्य की आधारशिला’ थे। वे इतने महत्वपूर्ण क्यों थे? उन्होंने मराठों को शक्तिशाली शत्रुओं के विरुद्ध खड़े रहने में किस प्रकार सहायता की?
उत्तर

दुर्ग राज्य की आधारशिला इसलिए थे क्योंकि वे एक साथ चार काम करते थे — मार्गों पर नियंत्रण, छापामार सेना को आश्रय, राज्य की संचित सामग्री की सुरक्षा, और शत्रु की संख्या-श्रेष्ठता को निर्णायक के बजाय महँगा बना देना

शिवाजी के वित्तमंत्री रामचंद्रपंत अमात्य ने आज्ञापत्र में यह तर्क इस प्रकार रखा :

‘दुर्ग राज्य का आधार हैं। उनके अभाव में बाह्य आक्रमण के समक्ष राज्य नष्ट हो जाता है … यह राज्य स्वर्गीय महान गुरु द्वारा केवल दुर्गों से ही बनाया गया था। औरंगजेब जैसे प्रबल शत्रु ने आक्रमण करके बीजापुर और भागनगर जैसे महान साम्राज्यों को जीता … किंतु दुर्गों के कारण ही [मराठा] राज्य दशकों के प्रचंड आघातों के बाद भी सुरक्षित रह सका।’

दुर्ग इतने महत्वपूर्ण क्यों थे

  1. वे आवागमन पर नियंत्रण रखते थे। अध्याय कहता है कि दुर्ग ‘सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्गों पर नियंत्रण’ के लिए आवश्यक थे। पहाड़ी भूभाग में कुछ ही घाट-मार्ग उपयोग योग्य होते हैं; जो घाट के ऊपर के दुर्ग का स्वामी है, वही तय करता है कि उससे कौन गुजरेगा। एक छोटा राज्य बड़े क्षेत्र से कर और व्यवस्था इसी प्रकार चलाता है।
  2. उन्होंने गुरिल्ला युद्ध को संभव बनाया। दुर्ग ‘छापामार युद्ध के दौरान सेना को सुरक्षित रखने’ के लिए थे। छोटे आक्रमणकारी दलों को विश्राम, पुनः शस्त्र-सज्जा और घायलों के लिए स्थान चाहिए। ठिकाने के बिना गुरिल्ला केवल भगोड़े रह जाते हैं।
  3. वे राज्य की पूँजी संभालते थे। अनाज, चट्टान काटकर बने कुंडों में जल, शस्त्र और कोष पहाड़ी पर सुरक्षित रह सकते थे। जो राज्य अपने संसाधन शत्रु की पहुँच से बाहर रख सके, वह एक अभियान में समाप्त नहीं होता।
  4. उन्होंने संख्या का गणित उलट दिया। जिस पहाड़ी दुर्ग तक चढ़ाई का एक ही खड़ा मार्ग हो, उसे छोटी सेना बहुत बड़ी सेना के विरुद्ध रोक सकती है, क्योंकि आक्रमणकारी एक समय में कुछ ही सैनिक प्राचीर तक ला सकता है। उधर घेरा डालने वाले को हजारों सैनिकों और घोड़ों को वहीं खिलाना पड़ता है। समय और भूख रक्षक के पक्ष में काम करते हैं।
  5. वे राजनैतिक घोषणा भी थे। शिवाजी ने 1674 के राज्याभिषेक के लिए ‘रायगढ़ के सुदृढ़ पर्वतीय दुर्ग’ को चुना। राज्य की राजधानी स्वयं एक दुर्ग थी।
  6. तटीय दुर्गों ने यही विचार समुद्र तक बढ़ाया। सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग ने बंदरगाहों की रक्षा की और मराठा बेड़े को सुरक्षित ठिकाने दिए (चित्र 3.6, चित्र 3.9)।

इससे वे शक्तिशाली शत्रुओं के सामने कैसे टिके — प्रमाण है 1682–1707। औरंगजेब पूरी मुगल सेना लेकर दक्कन आया। उसने दोनों बड़ी सल्तनतें — बीजापुर और गोलकुंडा — जीत लीं। संभाजी को बंदी बनाकर मार डाला और राजधानी रायगढ़ भी ले ली। उस युग के सामान्य नियमों से मराठा राज्य वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। किंतु हुआ यह :

  • राजाराम दूर दक्षिण के जिंजी चले गए और युद्ध भी वहीं चला गया — राज्य किसी एक स्थान से बँधा नहीं था।
  • मराठों ने ‘अपने दुर्गों की दृढ़ता से रक्षा की और अनेक युद्धों और संघर्षों में प्रायः मुगलों पर भारी पड़े’।
  • प्रत्येक दुर्ग को अलग-अलग घेरना पड़ता था, इसलिए औरंगजेब ‘दक्कन से निकलने में असमर्थ रहा और मराठों को परास्त किए बिना ही मर गया’।
यह अध्याय का सबसे गहरा बिंदु क्यों है: जो राज्य एक राजधानी पर टिका हो, उसे वह नगर जीतकर समाप्त किया जा सकता है। जो राज्य सैकड़ों दुर्गों पर टिका हो, उसे दुर्ग-दर-दुर्ग जीतना पड़ता है — और इसमें व्यय बढ़ता जाता है जबकि प्राप्ति छोटी रहती है। औरंगजेब ने इस प्रयास में पचीस वर्ष और अपना जीवन लगा दिया। मराठों ने मुगल साम्राज्य को अधिक बल से नहीं हराया; उन्होंने अपने ऊपर विजय को उसके मूल्य से अधिक महँगा बना दिया।
प्र7.
आपको मराठा सिक्कों का मुख्य अभिकल्पक (डिजाइनर) नियुक्त किया गया है। एक ऐसे सिक्के का रूपांकन कीजिए, जो मराठा उपलब्धियों और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करे। अपने द्वारा चुने गए प्रतीकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

पहले देखिए कि वास्तविक मराठा सिक्के क्या करते थे, क्योंकि अध्याय दो उदाहरण देता है और दोनों में एक स्पष्ट विचार है :

  • छत्रपति शिवाजी के सिक्के (चित्र 3.12) सोने और ताँबे के थे, उनके अपने नाम से ढाले गए — जो उनकी संप्रभुता दर्शाते थे — और उन पर देवनागरी लिपि थी, जिसे अध्याय ‘उनकी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक’ कहता है, जबकि उस समय मुद्रा की सामान्य भाषा फारसी थी।
  • ‘गणपति-पंतप्रधान रुपया’ (चित्र 3.14) 19वीं शताब्दी के आरंभ में पटवर्धनों ने ढाला। उसमें लोकप्रिय मुगल-मुद्राशैली रखी गई पर मराठा प्रतीक जोड़े गए — एक ओर गणपति का आवाहन, दूसरी ओर पेशवा के प्रति निष्ठा, और लेख देवनागरी तथा फारसी दोनों लिपियों में।
सिक्का राजनैतिक दस्तावेज क्यों है: यह राज्य की वह एकमात्र वस्तु है जिसे हर व्यक्ति छूता है। उस पर किसका नाम है, यह बताता है कि संप्रभु कौन है; किस लिपि में है, यह बताता है कि सार्वजनिक भाषा किसकी है; और उस पर क्या अंकित है, यह बताता है कि राज्य क्या याद रखवाना चाहता है। इसलिए अच्छा रूपांकन सजावट नहीं होता — उसका हर तत्व एक ऐसा दावा होता है जिसे आप सिद्ध कर सकें।
स्वराज्य रायगढ़ · 1674 श्री राजा शिव छत्रपति मराठा नौसेना अग्र भाग — दुर्ग और स्वराज्य पृष्ठ भाग — नौसेना और संप्रभु का नाम
प्रस्तावित रूपांकन। दोनों ओर देवनागरी का प्रयोग है, जैसा छत्रपति शिवाजी के अपने सिक्कों में था।

नमूना उत्तर : प्रतीक और उनके चुने जाने का कारण

प्रतीककहाँक्या दावा करता है, और प्रमाण
‘स्वराज्य’ शब्दअग्र भाग में ऊपरराज्य का मूल विचार। शिवाजी की ‘एक स्वतंत्र राज्य या स्वराज्य की कल्पना’ आगामी वर्षों में राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षों तक विस्तृत हुई, और अध्याय के अनुसार आगे चलकर इसी ने भारतीयों को स्वयं शासन करने का विश्वास दिया
पहाड़ी दुर्गअग्र भाग के मध्य में‘दुर्ग राज्य का आधार हैं’ — आज्ञापत्र। मराठा शक्ति को इससे सटीक कोई प्रतीक नहीं दर्शाता
रायगढ़ · 1674दुर्ग के नीचेरायगढ़ का राज्याभिषेक, जिससे मराठा साम्राज्य का औपचारिक आरंभ हुआ और ‘राज्याभिषेक शक’ चला
पाल खोले हुए पोतपृष्ठ भाग के मध्य में1657 में स्थापित नौसेना — जो कदम किसी पड़ोसी शक्ति ने नहीं उठाया था — और आगे चलकर कान्होजी आंग्रे की यूरोपीय बेड़ों पर विजय
‘श्री राजा शिव छत्रपति’पृष्ठ भाग में ऊपरराज्याभिषेक के बाद उनकी ठीक यही औपचारिक उपाधि थी। सिक्के पर शासक का अपना नाम ही संप्रभुता की घोषणा है, इसीलिए उन्होंने अपने नाम से सिक्के ढलवाए
पूरे सिक्के पर देवनागरीदोनों ओरउनके वास्तविक सिक्कों की भाँति, जहाँ देवनागरी का प्रयोग ‘उनकी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक’ था। राज्य-व्यवहार-कोष भी यही भाषा-नीति दिखाता है
सादा, अलंकरणरहित किनारासिक्के का किनारायह चुनाव वृक्षों वाले पत्र से आता है : जो राज्य अपने अधिकारियों को घास का तिनका तक बलपूर्वक न लेने का आदेश देता हो, उसे अपनी मुद्रा पर आत्मप्रशंसा नहीं करनी चाहिए
यह भी कीजिए: किसी बाद के मराठा शासक के लिए दूसरा सिक्का बनाइए और देखिए कि उसमें क्या बदलना पड़ेगा — पेशवा-काल के सिक्के पर पेशवा का अधिकार भी अंकित करना होगा, जैसा वास्तविक ‘गणपति-पंतप्रधान रुपये’ में हुआ, क्योंकि तब तक सत्ता छत्रपति से खिसककर प्रधानमंत्री के पास जा चुकी थी।
प्र8.
मराठा काल की इस भूमिका अध्ययन करने के पश्चात आपके विचार में भारतीय इतिहास में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या था? अध्याय से उदाहरण लेकर अपने विचार का समर्थन करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए। अपने विचारों को सहपाठियों के साथ साझा कर उन पर चर्चा कीजिए।
उत्तर

इस अध्याय से तीन उत्तर सिद्ध किए जा सकते हैं, और चुनाव से पहले तीनों को जान लेना चाहिए।

संभावित उत्तरसबसे अच्छा प्रमाणउसकी दुर्बलता
साम्राज्य स्वयंअंग्रेजों से पूर्व का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य; 1754/1771 से दिल्ली; उसे समाप्त करने में तीन युद्धवह समाप्त हो गया — 1818 में। जो साम्राज्य गिर जाए, वह उस विचार से कम शेष छोड़ता है जो नहीं गिरता
शासन की पद्धतिवंशानुगत पद और भूमि आवंटन के स्थान पर वेतनभोगी, स्थानांतरणीय अधिकारी; अष्टप्रधान मंडल; मृत्युदंड के संयमित प्रयोग वाली पंचायत-न्यायव्यवस्था; सैनिकों की विधवाओं को पेंशनमराठों ने स्वयं इसे ढीला छोड़ दिया — स्वायत्त सरदारों से ‘कभी-कभी अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार’ हुए
यह प्रमाण कि भारतीय स्वयं शासन कर सकते हैंअध्याय का अपना निष्कर्ष, और पृष्ठ 80 पर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ावइसे मापना सबसे कठिन है — प्रेरणा को भूभाग की तरह तौला नहीं जा सकता

नमूना उत्तर (आदर्श अनुच्छेद):

भारतीय इतिहास में मराठों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनके साम्राज्य का आकार नहीं, बल्कि वह प्रमाण था जो उन्होंने दिया — कि शक्तिशाली साम्राज्य पराजित किए जा सकते हैं और भारतीय स्वयं साम्राज्य का निर्माण, विस्तार और प्रशासन कर सकते हैं। अध्याय ठीक यही कहता है, और इसका प्रमाण पूरे अध्याय में फैला है। छत्रपति शिवाजी ने सोलह वर्ष की आयु में उपेक्षित दुर्ग जीतने से आरंभ किया और 1674 में रायगढ़ में अपनी संवत् प्रणाली के साथ राज्याभिषेक तक पहुँचे; औरंगजेब पूरी मुगल सेना लेकर पचीस वर्ष दक्कन में रहा, बीजापुर और गोलकुंडा जीते, संभाजी को मार डाला और रायगढ़ ले लिया — फिर भी मराठों को परास्त किए बिना ही मर गया। यह प्रमाण महाराष्ट्र से बाहर तत्काल पहुँचा : बुंदेला राजकुमार छत्रसाल शिवाजी के संघर्ष से प्रेरित होकर स्वतंत्र बुंदेलखंड की स्थापना करते हैं, और हिंदी कवि भूषण विशेष रूप से महाराष्ट्र जाकर उनके गुणगान में काव्य रचते हैं। यह प्रमाण साम्राज्य के पतन के बाद भी बचा रहा — अध्याय का अंतिम निर्णय यही है कि स्वराज्य के ज्वलंत आदर्श ने ‘भारतीयों को प्रेरित किया कि वे स्वयं शासन कर सकते हैं और इस प्रकार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का बीजारोपण किया’। भूभाग एक ही युद्ध में छिन सकता है — 1818 में मराठा भूभाग छिना भी। किंतु एक बार दिया गया प्रमाण वापस नहीं लिया जा सकता।

कक्षा-चर्चा के लिए: किसी मत की सच्ची परीक्षा यह है कि आप उसके विरुद्ध सबसे प्रबल तर्क बता सकें या नहीं। यदि आप स्वराज्य को सबसे बड़ा योगदान मानते हैं, तो आपके विरुद्ध तर्क यह है कि विचार सस्ते होते हैं और प्रशासन कठिन — और यह कि 17वीं शताब्दी के लिए वेतनभोगी, स्थानांतरणीय अधिकारी-वर्ग किसी भी नारे से कहीं अधिक असाधारण उपलब्धि थी। इस आपत्ति का उत्तर दे सकें, तभी आपका तर्क सार्थक है।
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