भूगोल ने मराठों की केवल सहायता नहीं की — उसने उनकी रणनीति स्वयं तय कर दी। सह्याद्रि की पहाड़ियों ने दुर्ग और गुरिल्ला युद्ध को सबसे सस्ता विकल्प बना दिया; कोंकण के तट ने नौसेना को अनिवार्य बना दिया; और उसके आगे फैले खुले दक्कन पठार ने तीव्र घुड़सवार सेना को पूरे भारत तक शक्ति पहुँचाने का साधन बना दिया।
1. पर्वतों ने गुरिल्ला युद्ध सस्ता और घेराबंदी महँगी बना दी। अध्याय कहता है कि शिवाजी ने ‘गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई’, जिसमें छोटे दल भूभाग के गहन ज्ञान से तीव्र गति से आकस्मिक आक्रमण करते हैं। यह परिभाषा केवल विषम भूभाग में चरितार्थ होती है। सह्याद्रि में सेना को सँकरे घाट-मार्गों से चलना पड़ता है; एक छोटा स्थानीय दल उसके अग्र या पश्च भाग पर प्रहार कर पहाड़ी पर लुप्त हो सकता है। प्रतापगढ़ की तलहटी के घने जंगलों में ‘पहाड़ों में छिपे मराठों’ ने अफज़ल खाँ की सेना को इसी प्रकार परास्त किया।
2. पर्वतों ने दुर्ग को राज्य का स्वाभाविक रूप बना दिया। जिस पहाड़ी तक चढ़ाई का एक ही खड़ा मार्ग हो, उसे कुछ सौ सैनिक हजारों के विरुद्ध रोक सकते हैं। इसीलिए शिवाजी ने 16 वर्ष की आयु में ‘उपेक्षित और निर्जन दुर्गों पर कब्जा करके उनकी सुरक्षा को सुदृढ़’ किया, और दुर्ग ‘मराठा शक्ति के मुख्य आधार’ बने। इसी कारण रामचंद्रपंत अमात्य लिख सके कि यह राज्य ‘केवल दुर्गों से ही बनाया गया था’।
3. समुद्र तट ने नौसेना को अनिवार्य बनाया। जब राज्य पश्चिमी तट तक पहुँचा तो तटीय संसाधनों तक पहुँच आवश्यक हो गई — और जिस तट की रक्षा न हो, वहाँ शत्रु उतर सकता है। इसलिए 1657 में मराठा नौसेना बनी और सिंधुदुर्ग (चित्र 3.6) जैसे नौसैनिक दुर्ग बने। यह असाधारण था — बीजापुर के पास व्यापारी जहाज तो थे पर स्थायी नौसेना नहीं, और मुगलों में नौसेना का उपयोग अत्यंत सीमित था।
4. तट ने यह भी तय किया कि शत्रु कौन होगा। मराठों के पास बंदरगाह थे — मानचित्र में दाभोल, राजापुर, मालवन और वेंगुर्ला, तथा मस्कट, मोचा और मलक्का के मार्ग — इसलिए उनका सीधा टकराव यूरोपीय सामुद्रिक शक्ति से हुआ, जो कार्ताज व्यापार-पत्रों पर टिकी थी। मराठा पोत तकनीकी रूप से पीछे थे, फिर भी कान्होजी आंग्रे ने ‘कुशल भूगोल-ज्ञान और युद्धनीति’ से विजय पाई। भूगोल ने तकनीक की कमी पूरी कर दी।
5. पठार ने विस्तार का रूप तय किया। घाट के पार भूमि खुल जाती है। खुला भूभाग उन घुड़सवारों के अनुकूल है जो तेज चलें और मार्ग में ही निर्वाह करें — चौथ और सरदेशमुखी उन प्रांतों से इसी गतिशीलता के बल पर वसूली जा सकती थी जहाँ मराठों की स्थायी सेना नहीं थी। यही गतिशीलता 18वीं शताब्दी में उन्हें दिल्ली, लाहौर, अटक और पेशावर तक ले गई।
6. दूरी स्वयं एक अस्त्र बनी। 1677 के दक्षिण-दिग्विजय से उत्तरी तमिलनाडु और कर्नाटक के भाग जुड़े, जिसने अध्याय के अनुसार ‘मराठों को मुगल आक्रमण के विरुद्ध रणनीतिक रूप से उल्लेखनीय सामरिक सुदृढ़ता प्रदान की’। औरंगजेब ने रायगढ़ ले लिया, तो राजाराम ने युद्ध दूर दक्षिण के जिंजी से चलाया। जिस राज्य के पास गहराई हो, वह राजधानी छिन जाने से समाप्त नहीं होता।