अन्वेषण अध्याय 4 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपके अनुसार ‘अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ से दादाभाई नौरोजी का क्या तात्पर्य है? (सूचना संकेत— वे 1892 में हाउस ऑफ कॉमन्स में संसद सदस्य थे।)
उत्तर

उनका तात्पर्य था कि भारत में ब्रिटिश शासन उन्हीं सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा था जिन पर ब्रिटेन स्वयं गर्व करता था। वे यह नहीं कह रहे थे कि शासन इसलिए बुरा है क्योंकि वह ब्रिटिश है; वे कह रहे थे कि वह पर्याप्त ब्रिटिश नहीं है — अर्थात न्याय, स्वतंत्रता और शासितों के हित में शासन के जिन मानकों की घोषणा ब्रिटेन करता था, भारत में उसका शासन उन पर खरा नहीं उतरता।

सूचना संकेत ही पूरे वाक्यांश की कुंजी है। दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में निर्वाचित होने वाले प्रथम भारतीय थे (1892) — यह यूनाइटेड किंगडम की द्विसदनीय संसद का निर्वाचित निम्न सदन है। अर्थात उनके श्रोता ब्रिटिश मतदाता और ब्रिटिश सांसद थे। दो संभावित तर्कों की तुलना कीजिए :

संभावित तर्क1890 के दशक की ब्रिटिश संसद इसे कैसे सुनती
‘भारत में ब्रिटिश शासन अन्यायपूर्ण है, इसे समाप्त होना चाहिए।’एक विरोधी बाहरी व्यक्ति की शिकायत मानकर टाल दिया जाता
‘भारत में ब्रिटिश शासन अन-ब्रिटिश है — आप भारत में वह कर रहे हैं जो अपने देश में कभी स्वीकार न करते।’इसे टालने का अर्थ अपना पाखंड स्वीकारना होता। यह ब्रिटेन की अपनी नैतिक शब्दावली को ही मापदंड बना देता है

इस वाक्यांश के पीछे आवेश नहीं, गणित था। उनकी 1901 की पुस्तक पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया में उन्होंने ब्रिटिश सूत्रों से ही प्राप्त आँकड़ों के आधार पर भारत से निष्कासित धन का अनुमान प्रस्तुत किया। लगभग उसी समय रोमेश चंद्र दत्त ने ईकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया में यही अध्ययन किया। इन सब अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि उपनिवेशवादियों ने भारत से असंख्य अरब पाउंड की संपत्ति निकाली। ब्रिटिश सरकारी आँकड़े प्रयोग करना स्वयं में तर्क का अंग था — ऐसे प्रमाण को ‘भारतीय अतिशयोक्ति’ कहकर उड़ाया नहीं जा सकता था।

निकास सबसे तीखा उदाहरण क्यों था : ब्रिटेन को इस नियम पर गर्व था कि किसी जनता पर उसके अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से ही कर लगाया जा सकता है। भारत में भारतीयों पर भारी कर थे, मत का अधिकार नहीं था, और फिर उनसे औपनिवेशिक सत्ता के अपने व्यय — रेलवे, टेलीग्राफ और युद्ध तक — की पूर्ति भी वसूली जाती थी। यही ब्रिटेन में होता तो सरकार गिर जाती। भारत में यह करना, नौरोजी के ठीक शब्दों में, अन-ब्रिटिश था।
सुझाव : ध्यान दीजिए कि अध्याय इस तर्क को एक शृंखला की तरह बनाता है — पहले ब्रूक्स एडम्स (1895) और विलियम डिग्बी, फिर 1901 के आसपास नौरोजी और दत्त, और अंत में उत्सा पटनायक का यह आधुनिक अनुमान कि 1765 से 1938 तक भारत से लगभग 45 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर निकला (वर्ष 2023 में ब्रिटेन के जी.डी.पी. का लगभग 13 गुना)। ऐसे कुल आँकड़े प्रयुक्त मान्यताओं पर बहुत निर्भर करते हैं, इसलिए विभिन्न विद्वानों की संख्याएँ भिन्न होती हैं; किंतु प्रवाह की दिशा और उसका परिमाण किसी को विवादित नहीं।
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