उनका तात्पर्य था कि भारत में ब्रिटिश शासन उन्हीं सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा था जिन पर ब्रिटेन स्वयं गर्व करता था। वे यह नहीं कह रहे थे कि शासन इसलिए बुरा है क्योंकि वह ब्रिटिश है; वे कह रहे थे कि वह पर्याप्त ब्रिटिश नहीं है — अर्थात न्याय, स्वतंत्रता और शासितों के हित में शासन के जिन मानकों की घोषणा ब्रिटेन करता था, भारत में उसका शासन उन पर खरा नहीं उतरता।
सूचना संकेत ही पूरे वाक्यांश की कुंजी है। दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में निर्वाचित होने वाले प्रथम भारतीय थे (1892) — यह यूनाइटेड किंगडम की द्विसदनीय संसद का निर्वाचित निम्न सदन है। अर्थात उनके श्रोता ब्रिटिश मतदाता और ब्रिटिश सांसद थे। दो संभावित तर्कों की तुलना कीजिए :
| संभावित तर्क | 1890 के दशक की ब्रिटिश संसद इसे कैसे सुनती |
|---|---|
| ‘भारत में ब्रिटिश शासन अन्यायपूर्ण है, इसे समाप्त होना चाहिए।’ | एक विरोधी बाहरी व्यक्ति की शिकायत मानकर टाल दिया जाता |
| ‘भारत में ब्रिटिश शासन अन-ब्रिटिश है — आप भारत में वह कर रहे हैं जो अपने देश में कभी स्वीकार न करते।’ | इसे टालने का अर्थ अपना पाखंड स्वीकारना होता। यह ब्रिटेन की अपनी नैतिक शब्दावली को ही मापदंड बना देता है |
इस वाक्यांश के पीछे आवेश नहीं, गणित था। उनकी 1901 की पुस्तक पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया में उन्होंने ब्रिटिश सूत्रों से ही प्राप्त आँकड़ों के आधार पर भारत से निष्कासित धन का अनुमान प्रस्तुत किया। लगभग उसी समय रोमेश चंद्र दत्त ने ईकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया में यही अध्ययन किया। इन सब अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि उपनिवेशवादियों ने भारत से असंख्य अरब पाउंड की संपत्ति निकाली। ब्रिटिश सरकारी आँकड़े प्रयोग करना स्वयं में तर्क का अंग था — ऐसे प्रमाण को ‘भारतीय अतिशयोक्ति’ कहकर उड़ाया नहीं जा सकता था।