कक्षा ८ सामाजिक विज्ञान अध्याय 4 आइए पता लगाएँ के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन2026-09-19
प्र1.
चित्र 4.17 में कलाकार की कल्पना से 1856 में चित्रित संथालों के वर्ण, वस्त्र एवं अस्त्रों को ध्यान से देखें और यह अनुमान लगाएँ कि ब्रिटेन की सामान्य जनता में यह चित्र किस प्रकार की धारणा उत्पन्न करता रहा होगा।
अग्रभूमि — संथाल। लगभग एक दर्जन पुरुष, नंगे बदन और नंगी टाँगों वाले, केवल एक छोटी सफ़ेद लंगोटी पहने, लंबे बिखरे बाल और गहरी छायांकित (श्याम) त्वचा। एक पैर फैलाए लंबा धनुष खींच रहा है; दूसरा टेढ़ा अस्त्र भाँज रहा है; तीसरा हाथ में तीर लिए झुका है। कई भूमि पर पड़े हैं — मृत अथवा घायल — और उनके धनुष-बाण घास में गिरे हैं।
मध्य दूरी — सिपाही। ठोस भूमि पर वर्दीधारी सैनिकों की सीधी, अटूट पंक्ति कंधे से कंधा मिलाए खड़ी है — बटन वाले कोट, टोपियाँ और जूते पहने, बंदूकें तानी हुई। अभी-अभी दागी गई गोलियों का सफ़ेद धुआँ उनके सामने फैला है।
पृष्ठभूमि। फूस की नीची झोपड़ियों की कतार, ताड़ के वृक्ष, वृक्षों से ढकी ढलान और धुँधला उत्कीर्ण आकाश।
दोनों पक्षों की स्थिति। संथाल नीची घासभरी अग्रभूमि में बिखरे, झुके और गिरते हुए दिखाए गए हैं; सैनिक दूर, छोटे किंतु पूर्ण व्यवस्था में, सीधे खड़े और अछूते दिखाए गए हैं।
चित्र 4.17, पृष्ठ 107 — इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़ में छपा 1856 का काष्ठ-उत्कीर्ण चित्र, जो कलाकार की कल्पना से बनाया गया था। यहाँ केवल उसका वर्णन है; चित्र के लिए पाठ्यपुस्तक देखिए।
उत्तर
चित्र में वास्तव में क्या है। दोनों पक्षों को अलग-अलग देखिए — यही विरोधाभास चित्र का पूरा प्रयोजन है।
संथाल (बाएँ तथा मध्य में)
सिपाही (दाहिनी ओर)
वर्ण
गहरा, भारी छायांकन के साथ
अपेक्षाकृत हलका, दूरी पर
वस्त्र
लगभग निर्वस्त्र — केवल कटिवस्त्र; नंगे पाँव; लंबे, बिखरे बाल
पूरी वर्दी — कोट, टोपी, श्वेत पतलून, पेटियाँ
अस्त्र
धनुष-बाण, एक उठी हुई तलवार
बंदूकें, एक साथ चलाई जाती हुईं — मैदान में धुआँ फैला हुआ
व्यवस्था
बिखरे हुए, झुके, झपटते — प्रत्येक अलग-अलग
सीधी, अनुशासित पंक्ति
दशा
अनेक पहले ही अग्रभाग में मृत या घायल पड़े हुए
सुरक्षित दूरी पर, अक्षत
निष्कर्ष। यहाँ कुछ भी तटस्थ रिपोर्टिंग नहीं है। कलाकार ने वह घटना देखी ही नहीं थी — शीर्षक कहता है कि यह कलाकार की कल्पना से बनाया गया रेखाचित्र है — और यह ब्रिटेन के पाठकों के लिए इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज में छपा था। अतः यह चित्र संथालों की युद्ध-पद्धति का नहीं, ब्रिटिश जनमत का प्रमाण है।
यह ‘सभ्यता बनाम बर्बरता’ का दृश्य रचता है। एक ओर वस्त्रधारी, व्यवस्थित, आधुनिक; दूसरी ओर लगभग नग्न, अव्यवस्थित, आदिम। 1856 के ब्रिटिश पाठक को एक शब्द कहे बिना दिखा दिया गया कि ये वही ‘आदिम’ लोग हैं जिन्हें, अध्याय के अनुसार, ब्रिटिश जनजातियों के लिए कहते थे।
यह हत्या को अवश्यंभावी, बल्कि स्वाभाविक बना देता है। यदि एक ओर बंदूकें हों और दूसरी ओर बाण, तो परिणाम को किसी औचित्य की आवश्यकता नहीं रहती — वह प्राकृतिक नियम जैसा दिखने लगता है, न कि गाँव जलाने और हजारों को मारने का नीतिगत निर्णय।
यह कारण को हटा देता है। चित्र में कहीं कोई साहूकार, जमींदार, कर की माँग या भू-अभिलेख नहीं है — और विद्रोह के कारण वही थे। संथालों ने उन साहूकारों और जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह किया था जो ब्रिटिश समर्थन से उनके पूर्वजों की भूमि छीन रहे थे। कारण हटा दीजिए तो विद्रोह केवल उग्रता दिखने लगता है।
यह ‘सभ्यकारी अभियान’ को शोभा देता है। जो पाठक प्रति सप्ताह ऐसे चित्र देखते, वे यही निष्कर्ष निकालते कि ब्रिटेन असभ्यों के बीच व्यवस्था स्थापित कर रहा है — ठीक वही मान्यता जिसे अध्याय आरंभ में उपनिवेशवाद का आवरण बताता है।
यह रेखाचित्र जो सच्चाई दिखा देता है : शीर्षक स्वयं इसे “असमान टकराव” कहता है, और चित्र इस असमानता को छिपाता नहीं — बाणों के सामने बंदूकें, भूमि पर पड़े शव। उलटी दिशा से पढ़ने पर वही चित्र इस बात का प्रमाण बन जाता है कि दमन कितना एकपक्षीय था। सिद्धू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में संथालों ने अपने शासन की घोषणा की थी और ‘रक्त की अंतिम बूँद तक युद्ध’ का संकल्प लिया था; ब्रिटिशों ने गाँव जला दिए और हजारों संथालों की हत्या की। ब्रिटिश श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए बनाया गया चित्र अंततः ब्रिटिश बल का ही अभिलेख बन जाता है।
परीक्षा के लिए सुझाव : औपनिवेशिक काल के किसी भी चित्र के सामने तीन प्रश्न अवश्य पूछिए — यह किसने बनाया, किसके लिए बनाया, और इसमें कौन अनुपस्थित है? यहाँ : एक ब्रिटिश कलाकार ने, ब्रिटिश पत्रिका के लिए, और अनुपस्थित हैं संथालों के कारण।