प्र1.
नील एक प्राकृतिक गहरा नीला रंग है, जो वस्त्र रंगने में प्रयोग होता है। क्या आप ऐसे अन्य पारंपरिक प्राकृतिक रंगों को जानते हैं, जिनका उपयोग भारत में वस्त्र रंगने के लिए किया जाता रहा है?
उत्तर
हाँ — रासायनिक रंगों से बहुत पहले भारत के पास प्राकृतिक रंगों की पूरी पट्टिका थी, जो जड़ों, छाल, फूलों, बीजों, कीटों और खनिजों से बनती थी। इसीलिए भारतीय वस्त्र अपने चमकीले रंगों के लिए प्रसिद्ध थे, जैसा अध्याय कुछ पृष्ठ पहले बता चुका है।
| रंग | प्राकृतिक स्रोत | टिप्पणी |
|---|---|---|
| नीला | नील, नील के पौधे की पत्तियों से | यही वह रंग है जिसके कारण नील विद्रोह (1859–1862) हुआ |
| लाल | मंजिष्ठा (भारतीय मजीठ) की जड़; लाख के कीट से प्राप्त लाक्षा | मजीठ का लाल गुजरात और कोरोमंडल तट के प्रसिद्ध छापे वाले सूती वस्त्रों का आधार था |
| पीला | हल्दी; अनार का छिलका; हरड़ (हरीतकी) | हरड़ रंगबंधक (मॉर्डेंट) का काम भी करती है, जो रंग को कपड़े पर बाँधता है |
| नारंगी / केसरिया | कुसुम के फूल; केसर; पलाश (टेसू) के फूल | पलाश के फूल आज भी होली के रंग के लिए उबाले जाते हैं |
| भूरा | खैर की लकड़ी से कत्था; अखरोट और प्याज के छिलके; मेहँदी | मेहँदी कपड़े पर भी नारंगी-भूरा रंग देती है |
| काला / धूसर | गुड़ के पानी में भिगोया लोहे का बुरादा (कसीम या लौह-जल) | कलमकारी और अजरख छपाई की परंपरागत काली रेखा |
| हरा | प्रायः दो बार रँगकर — किसी वानस्पतिक पीले के ऊपर नील का नीला | बहुत कम पौधे सीधे पक्का हरा रंग देते हैं |
इसमें केवल पौधा नहीं, कौशल लगता था : अधिकांश प्राकृतिक रंग सूती कपड़े पर स्वयं नहीं चढ़ते। उन्हें रंगबंधक (मॉर्डेंट) चाहिए — फिटकरी, लोहा या हरड़ जैसा कोई पदार्थ जो पहले लगाया जाता है, रंग को रेशे से बाँधता है और उसे बदल भी देता है (वही मजीठ फिटकरी के साथ लाल और लोहे के साथ गहरा बैंगनी-काला देती है)। भारतीय रँगरेजों ने ये संयोग शताब्दियों में सिद्ध किए थे, इसीलिए भारतीय सूती वस्त्र धोने पर भी रंग नहीं छोड़ते थे जबकि यूरोपीय नकलें फीकी पड़ जाती थीं। ये परंपराएँ आज भी जीवित हैं — अजरख (कच्छ), बगरू और सांगानेर की छपाई (राजस्थान), कलमकारी (आंध्र प्रदेश) तथा बंधनी (गुजरात और राजस्थान)।
स्वयं जाँचिए : मुट्ठीभर प्याज के छिलके दस मिनट पानी में उबालिए और श्वेत सूती कपड़े की एक पट्टी उसमें डुबोइए। दूसरे बर्तन में हल्दी उबालकर दूसरी पट्टी डुबोइए। अब दोनों धोइए। जो जल्दी फीकी पड़े, उसी को रंगबंधक की आवश्यकता थी — यह एक प्रयोग ही बता देता है कि रँगरेज का ज्ञान इतना मूल्यवान क्यों था।