क्योंकि भारत कभी बंद था ही नहीं। ‘पुनः जोड़ा’ एक सुधार है — यह वाक्य को उस औपनिवेशिक दावे को अनजाने दोहराने से रोकता है कि यूरोपीय लोगों ने भारत को ‘खोजा’ या ‘खोला’।
प्रमाण इसी अध्याय में, कुछ पृष्ठ पहले हैं :
- भारत का व्यापार यूनानियों और रोमनों के साथ लगभग दो सहस्राब्दियों पूर्व से चलता आ रहा था।
- भारतीय वस्तुओं — मसाले, कपास, हाथी-दाँत, रत्न, चंदन, सागवान, वूट्ज स्टील — की भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में अत्यधिक माँग थी।
- यूरोपीय पोतों के आने से पहले भारत के पास व्यापक आंतरिक एवं बाह्य व्यापारिक संजाल थे, और 16वीं शताब्दी से यूरोपीय यात्री उसे ‘समृद्धशाली’ बताते थे।
- 1498 में वास्को-डी-गामा को कोई अनजान भूमि नहीं मिली थी; वह एक चलते हुए बंदरगाह — कोझिकोड के समीप कप्पड़ — पर पहुँचा था, जहाँ उसका स्वागत भलीभाँति हुआ, जब तक उसके अपने आक्रामक आचरण ने संबंध बिगाड़ नहीं दिए।
अर्थात भारत और विश्व के बीच वस्तुओं, लोगों और विचारों का आवागमन बहुत पुराना है। औपनिवेशिक शासन में जो बदला वह संपर्क का आरंभ नहीं था, बल्कि यह था कि उस संपर्क पर नियंत्रण किसका है और शर्तें क्या हैं। ब्रिटेन ने समुद्री व्यापार और विनिमय दरों तक पर नियंत्रण कर लिया, जिससे जो संबंध कभी दोनों दिशाओं में बहता था, वह मुख्यतः एक दिशा में बहने लगा।