प्र1.
“ब्रिटिश साम्राज्य पर सूर्य कभी अस्त नहीं होता”— इस वाक्य का अभिप्राय क्या है? क्या यह कथन उचित था? विचार करें।
उत्तर
अभिप्राय। ब्रिटिश साम्राज्य विश्व के इतने भागों में फैला था — अफ्रीका, एशिया, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत में — कि दिन के किसी भी क्षण उसके किसी न किसी भाग पर सूर्य चमक रहा होता था। लंदन में रात होती तो कलकत्ता में दिन; कलकत्ता में रात होती तो कनाडा में दिन। अतः अक्षरशः, साम्राज्य पर सूर्य कभी अस्त नहीं होता था।
किंतु यह वाक्य केवल भूगोल का कथन नहीं था। यह दो और अर्थ लिए हुए एक घोषणा थी :
- विस्तार। इससे पूर्व किसी साम्राज्य ने एक ही समय में विश्व के प्रत्येक भाग में भूभाग नहीं रखा था।
- स्थायित्व। इसीलिए इस अध्याय में यह वाक्य उसी साँस में आता है जिसमें यह उद्घोषणा है कि भारत “सदा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना रहेगा”। ‘सूर्य कभी अस्त नहीं होता’ कहने का अर्थ है : यह कभी समाप्त नहीं होगा।
क्या यह कथन उचित था? उत्तर को बाँटिए, क्योंकि दोनों भागों का निर्णय अलग है।
| दावा | निर्णय | प्रमाण |
|---|---|---|
| साम्राज्य के चरम पर भौगोलिक कथन के रूप में | सत्य | प्रत्येक बसे हुए महाद्वीप पर उपनिवेश, सभी देशांतरों में फैले हुए |
| स्थायित्व के कथन के रूप में | असत्य | अध्याय कहता है कि 20वीं शताब्दी के मध्य में, विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात उपनिवेशवाद का अंत होने लगा और अधिकांश उपनिवेशित राष्ट्र स्वतंत्र हुए — भारत 1947 में |
| साम्राज्य के स्वरूप के कथन के रूप में | भ्रामक | यह साम्राज्य को केवल लंदन की ओर से देखता है। यह नहीं बताता कि ये भूभाग कैसे प्राप्त हुए, या यह कि प्रशासन, सेना और अधिकारियों की भव्य जीवन-शैली का व्यय भारतीय अपने करों से चुका रहे थे |
यह घोषणा कहे जाने के समय ही असत्य क्यों थी : अध्याय में यह वाक्य प्रतिरोध वाले अनुभाग से ठीक पहले आता है — और यह स्थान जानबूझकर चुना गया है। “भारत पर ब्रिटिश अधिग्रहण के आरंभ से ही प्रतिरोध की चेष्टाएँ प्रकट होने लगीं।” संन्यासी-फकीर विद्रोह, कोल और खासी जनक्रांतियाँ, संथाल विद्रोह, नील विद्रोह, और फिर 1857 : साम्राज्य किसी भी क्षण वास्तव में निर्विरोध नहीं था। जिस समय भूभाग बनाए रखने के लिए गाँव जलाए जा रहे हों, उस समय स्थायित्व की घोषणा तथ्य नहीं, इच्छा का कथन है।