अन्वेषण अध्याय 4 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उपनिवेशवाद क्या है?
उत्तर

उपनिवेशवाद वह व्यवहार है जब एक देश किसी अन्य प्रदेश पर अधिकार कर वहाँ अपनी बस्तियाँ स्थापित करता है और अपना राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक तंत्र आरोपित करता है। यही अध्याय की अपनी परिभाषा है। ध्यान दीजिए कि इसमें तीन बातें हैं — केवल व्यापार या केवल विजय उपनिवेशवाद नहीं है।

तीनों अंगअर्थइसी अध्याय से उदाहरण
राजनैतिक नियंत्रणकिसी भूभाग के निर्णय वहाँ के निवासी नहीं, बाहरी लोग लेते हैंसहायक संधि ने वास्तविक सत्ता ब्रिटिशों को दे दी और भारतीय शासक के पास प्रभुसत्ता का केवल आभास रहा
बस्तियाँअधिकार करने वाला देश अपने लोग, दुर्ग, बंदरगाह और प्रशासन बसाता हैगोवा (1510) पुर्तगाली उपनिवेश की राजधानी; सूरत, मद्रास, बंबई और कलकत्ता में अंग्रेजी केंद्र; दुर्गीकृत, ग्रिड-रूपरेखा वाला पांडिचेरी (चित्र 4.6)
अपना तंत्र आरोपित करनाउसकी अर्थव्यवस्था, विधि, भाषा और मान्यताएँ स्थानीय व्यवस्थाओं का स्थान ले लेती हैंप्रथागत विधियों के स्थान पर ब्रिटिश कानून-संहिताएँ; मैकॉले की शिक्षा नीति; गोवा का धर्म-न्यायाधिकरण और बलात धर्मांतरण

यह नवीन घटना नहीं है। अध्याय उपनिवेशवाद की परंपरा को प्रथम सहस्राब्दी सा.सं. पू. के महान साम्राज्यों तक ले जाता है और बताता है कि प्रथम सहस्राब्दी सा.सं. में ईसाई तथा इस्लामी धर्मों के प्रसार के साथ-साथ जिन क्षेत्रों को नए धर्मों में परिवर्तित किया गया, वहाँ का उपनिवेशीकरण भी हुआ। किंतु ‘औपनिवेशिक युग’ से सामान्यतः आशय 15वीं शताब्दी से आरंभ हुए यूरोपीय विस्तार से है — स्पेन, पुर्तगाल, ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड द्वारा अफ्रीका, एशिया, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा प्रशांत महासागर के अनेक द्वीपों पर उपनिवेश स्थापित करना।

परिभाषा क्यों महत्वपूर्ण है : उपनिवेशक अपने कार्य को ‘सभ्यकारी अभियान’ कहते थे और उपनिवेशित लोगों का ‘असभ्य’, ‘आदिम’ या ‘बर्बर’ कहकर असुरीकरण करते थे। ऊपर दी गई परिभाषा से आप उस दावे को वास्तविकता की कसौटी पर परख सकते हैं — स्वतंत्रता का ह्रास, उपनिवेशकों द्वारा संसाधनों का दोहन, पारंपरिक जीवन-पद्धतियों का विनाश तथा विदेशी सांस्कृतिक मूल्यों का आरोपण। अध्याय यहाँ सावधान और निष्पक्ष है — वह मानता है कि औपनिवेशिक युग ने विश्व को जोड़ा और अर्थव्यवस्थाओं व प्रौद्योगिकियों की तीव्र वृद्धि हुई, किंतु जोड़ता है कि इसका लाभ प्रायः उपनिवेशकों को ही मिला और अनेक ऐतिहासिक अध्ययनों ने प्रमाणित किया है कि उपनिवेशित समुदायों को अत्यंत कष्ट भोगने पड़े।
क्या आप जानते हैं? 20वीं शताब्दी के मध्य में, विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात, उपनिवेशवाद का अंत होने लगा और अधिकांश उपनिवेशित राष्ट्र स्वतंत्र हुए। अर्थात ‘औपनिवेशिक युग’ लगभग पाँच शताब्दियों का था — लंबा, किंतु स्थायी नहीं।
प्र2.
यूरोपीय शक्तियों को भारत की ओर आकर्षित करने वाले कारण क्या थे?
उत्तर

भारत की समृद्धि। यही संक्षिप्त उत्तर है, और अध्याय कारण बताने से पहले उसका प्रमाण देता है।

  • दो सहस्राब्दियों की माँग। भारत का व्यापार यूनानियों और रोमनों के साथ लगभग दो सहस्राब्दियों पूर्व से चलता आ रहा था। भारतीय वस्तुओं — मसाले, कपास, हाथी-दाँत, रत्न, चंदन, सागवान की लकड़ी और वूट्ज स्टील — की भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में अत्यधिक माँग थी।
  • अर्थव्यवस्था का आकार। इतिहासकारों (विशेषतया अर्थशास्त्री ऐंगस मैडिसन) का आकलन है कि 16वीं शताब्दी तक विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का योगदान कम-से-कम एक-चौथाई था, जिससे वह चीन के साथ (जिसका योगदान भी समान स्तर का था) विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था।
  • प्रत्यक्षदर्शी। 16वीं शताब्दी से अनेक यूरोपीय यात्री भारत को ‘समृद्धशाली’ बताते थे और इसकी विनिर्माण क्षमताओं, विविध कृषि उत्पाद तथा व्यापक आंतरिक एवं बाह्य व्यापारिक संजालों का वर्णन करते थे।

इस विशेष आकर्षण के अतिरिक्त उसी समय चार सामान्य कारण प्रत्येक यूरोपीय शक्ति को बाहर की ओर धकेल रहे थे :

कारणव्यवहार में इसका अर्थ
1. राजनैतिक प्रतिस्पर्धायूरोपीय शक्तियों की आपसी होड़ ने भौगोलिक विस्तार तथा वैश्विक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा उत्पन्न कर दी — इसी कारण ब्रिटेन और फ्रांस के कर्नाटक युद्ध (1746–1763) भारत की भूमि पर लड़े गए
2. आर्थिक लाभनए प्राकृतिक संसाधनों, नए बाजारों तथा नए व्यापार मार्गों तक पहुँच — और प्रायः लूट भी
3. धर्मांतरणस्थानीय जनसंख्या का ईसाई धर्म में परिवर्तन — यह पुर्तगालियों में सबसे प्रबल था, जिन्होंने 1560 में गोवा में धर्म-न्यायाधिकरण स्थापित किया
4. वैज्ञानिक जिज्ञासा“अपेक्षाकृत गौण किंतु महत्वपूर्ण” — अज्ञात भूभागों का अन्वेषण कर पृथ्वी के भौगोलिक स्वरूप एवं प्राकृतिक इतिहास का ज्ञान संचित करने की अभिलाषा
स्मरण रखने योग्य वाक्य : अध्याय स्पष्ट कहता है — “इसी आर्थिक संपन्नता ने भारत को यूरोपीय औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक आकर्षक लक्ष्य बनाया।” भारत निर्धन और दुर्बल होने के कारण उपनिवेश नहीं बना। वह समृद्ध होने के कारण बना, और इसलिए भी कि मुगल सत्ता के ह्रास के बाद की राजनैतिक परिस्थिति ने बाहरी शक्तियों को भारतीय झगड़ों में पक्ष लेने का अवसर दे दिया।
प्र3.
औपनिवेशिक काल से पूर्व तथा उसके दौरान भारत की आर्थिक एवं भू-राजनैतिक स्थिति क्या थी?
उत्तर

पूर्व : विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक। दौरान : संसार के सबसे निर्धन देशों में से एक। अध्याय यह पूरा उलटफेर एक वाक्य में कह देता है — “दो शताब्दियों से भी कम समय में संसार के सबसे समृद्ध भूभागों में से एक, सबसे निर्धन देशों में से एक बन गया।”

0% 10% 20% 30% कम-से-कम 25% मात्र 5% 16वीं शताब्दी तक स्वतंत्रता के समय (1947) विश्व के जी.डी.पी. में भारत का भाग
अध्याय में दिए गए दोनों आँकड़े आमने-सामने। पहला ऐंगस मैडिसन का पूर्व-औपनिवेशिक काल का आकलन है, दूसरा स्वतंत्रता के समय भारत का भाग।
 औपनिवेशिक काल से पूर्वऔपनिवेशिक काल के दौरान
विश्व जी.डी.पी. में भागकम-से-कम एक-चौथाई — चीन के साथ दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं मेंनिरंतर घटता रहा; स्वतंत्रता के समय मात्र 5 प्रतिशत
विनिर्माणवस्त्रों के लिए प्रसिद्ध — सूती, रेशमी, ऊनी, पटसन, भांग, कोयर; मलमल और उभरे हुए वस्त्र विश्वभर में माँग में; लोहा, स्टील और कागज भीब्रिटेन में भारी कर तथा भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर नाममात्र कर से वस्त्र उद्योग नष्ट; यही लोहा, स्टील और कागज के साथ हुआ
कारीगरपीढ़ी-दर-पीढ़ी शिल्प में निपुण कुशल कारीगरों के समुदायनिर्धनता में धकेल दिए गए; अधिक कर वाले कृषि क्षेत्रों में जीविका के लिए लौटने को विवश
व्यापारव्यापक आंतरिक एवं बाह्य संजाल; भारतीय व्यापारी स्वतंत्रतापूर्वक निर्यात करते थेब्रिटेन ने समुद्री व्यापार तथा विनिमय दरों पर नियंत्रण कर लिया, अतः पहले की भाँति निर्यात असंभव हो गया
शासनग्राम पंचायतें समुदाय के कार्य, विवाद तथा सिंचाई व सड़कें सँभालती थीं; क्षेत्रीय राज्यों की जटिल प्रशासनिक संरचनाएँ शताब्दियों में विकसितस्थान पर केंद्रीकृत नौकरशाही, जिसका उद्देश्य कर-संग्रह और विधि-व्यवस्था था, जनहित नहीं
भू-राजनैतिक स्थितिएक आर्थिक व सांस्कृतिक केंद्र, जहाँ अन्य लोग आते थे‘ब्रिटिश साम्राज्य के मुकुट में मणि’ — साम्राज्य का सबसे विशाल उपनिवेश; 500 से अधिक रियासतें सहायक संधियों से बँधी
जनसामान्यअकाल पड़ते थे — सूखा, बाढ़, युद्ध से — किंतु इतने व्यापक स्तर पर कभी नहींग्रामीण भारत “गहन निर्धनता में डूब गया और कभी उबर नहीं पाया”; अकाल-मृत्यु का अनुमान 5 करोड़ से 10 करोड़
यह पतन दुर्घटना क्यों नहीं था : उपर्युक्त तालिका का प्रत्येक खाना किसी नीति से जुड़ा है, दुर्भाग्य से नहीं। करों और विनिमय दर के नियंत्रण ने निर्यात समाप्त किया; कर-प्रणाली ने उजड़े बुनकरों को करभारित भूमि पर धकेला; निकास ने लाभ विदेश भेज दिया; और ‘मुक्त बाजार’ के सिद्धांत ने अकाल में मूल्य बढ़ने पर सरकार को हस्तक्षेप से रोक दिया। मेटकाफ की गवाही — ग्राम समुदाय “लघु गणराज्यों के सदृश हैं… वे वहाँ बने रहते हैं जहाँ अन्य सब कुछ नष्ट हो जाता है” — यह दिखाती है कि जिसे तोड़ा गया वह ब्रिटिश आगमन से पूर्व एक के बाद एक राजवंशों को झेलकर बचा हुआ था।
प्र4.
ब्रितानी (ब्रिटिश) औपनिवेशिक प्रभुत्व का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर

इसने भारतीय जीवन के प्रायः प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया, क्योंकि शासक यह मानते थे कि भारत को उनके ‘श्रेष्ठ’ विचारों के अनुसार पुनः आकार दिया जाना चाहिए। अध्याय इन प्रभावों को वर्गों में बाँटता है; उन्हें अलग-अलग रखना ही उचित है।

  1. मानवीय कीमत — अकाल। भूमि की उपज पर नकद कर, चाहे फसल हो या न हो। 1770–1772 में दो वर्ष की फसल विफलता के ऊपर इस नीति ने ऐसा अकाल उत्पन्न किया जिसमें बंगाल की लगभग एक-तिहाई जनसंख्या, अनुमानतः एक करोड़ लोग मारे गए — और कंपनी ने उसी समय भूमि-कर बढ़ा दिया। 1876–1878 में मुख्यतः दक्कन में 80 लाख लोग मरे, जबकि प्रतिवर्ष लगभग दस लाख टन चावल ब्रिटेन निर्यात होता रहा। संपूर्ण काल में भीषण अकालों की संख्या 12 से 20 तक और मृत्यु का अनुमान 5 करोड़ से 10 करोड़ तक है।
  2. औद्योगिक विनाश। ब्रिटेन में भारतीय वस्त्रों पर भारी कर, भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर नाममात्र कर, और ब्रिटेन का समुद्री व्यापार तथा विनिमय दरों पर नियंत्रण। परिणाम — निर्यात ढह गया, आयात बढ़ा, बुनकर समुदाय निर्धनता में धकेल दिए गए। गवर्नर-जनरल बैंटिक ने 1834 में लिखा : “सूती बुनकरों की अस्थियाँ भारत के मैदानों का विरंजन कर रही हैं।”
  3. संपदा का निकास। नौरोजी (1901) और आर.सी. दत्त ने ब्रिटिश प्रतिवेदनों से ही भारत से निकाली गई संपदा का लेखा तैयार किया; उत्सा पटनायक का नवीनतम अनुमान 1765–1938 के लिए 45 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (वर्तमान मूल्य) है। यह केवल करों से नहीं, अपितु रेलवे, टेलीग्राफ और युद्धों तक के व्यय भारतीयों से वसूलकर लिया गया।
  4. स्वशासन का विघटन। जो ग्राम पंचायतें विवाद, सिंचाई और सड़कें सँभालती थीं, उनके स्थान पर कर-संग्रह और विधि-व्यवस्था के लिए बनी केंद्रीकृत नौकरशाही आई। ब्रिटिश कानून-संहिताओं ने प्रथागत विधियों की उपेक्षा की, और नए न्यायालय महँगे, समय लेने वाले तथा विदेशी भाषा में संचालित थे — अर्थात सामान्य जन अपनी ही न्याय-व्यवस्था से बाहर कर दिया गया।
  5. शिक्षा का रूपांतरण। मैकॉले के 1835 के मिनिट ने लक्ष्य रखा ऐसे भारतीयों का वर्ग जो “रक्त और रंग से तो भारतीय हो परंतु स्वाद, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज”। पारंपरिक विद्यालय — पाठशालाएँ, मदरसे, विहार — धीरे-धीरे विलुप्त हो गए, यद्यपि ब्रिटिश प्रतिवेदनों में ही 1830 तक बंगाल और बिहार में 1,00,000 से 1,50,000 ग्राम्य विद्यालयों का उल्लेख है। अंग्रेजी प्रतिष्ठा की भाषा बन गई और अंग्रेजी शिक्षित अभिजनों व सामान्य जनों के बीच स्थायी विभाजन उत्पन्न हुआ।
  6. समाज में विभाजन। ‘फूट डालो और राज करो’ ने शासकों की प्रतिस्पर्धा और उत्तराधिकार विवादों का लाभ उठाया, और ब्रिटिशों ने धार्मिक समुदायों के मध्य विद्वेष को पहचानकर उसे बढ़ावा भी दिया। एक औपनिवेशिक विधि ने सैकड़ों जनजातियों को ‘अपराधी जनजाति’ घोषित कर दिया, जिससे दशकों तक उनके साथ अन्याय हुआ।
  7. संस्कृति — क्षति, और एक अनपेक्षित लाभ। हजारों मूर्तियाँ, चित्र, रत्न और पांडुलिपियाँ चुराकर यूरोपीय संग्रहालयों तथा निजी संग्रहों में भेज दी गईं। साथ ही ब्रिटिशों ने उपमहाद्वीप का गहन सर्वेक्षण किया, स्मारकों के दस्तावेज बनाए, कुछ खंडहरों को पुनर्स्थापित किया और पुरातत्वशास्त्र का आरंभ किया; और संस्कृत ग्रंथों के अनुवादों (चार्ल्स विल्किन्स की भगवद्गीता, 1785 से आरंभ) का यूरोपीय दार्शनिकों, साहित्यकारों और कलाकारों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
दोनों पक्षों को ईमानदारी से कैसे तौलें : अध्याय अनपेक्षित परिणामों से इनकार नहीं करता — रेलमार्गों ने आंतरिक बाजार को एकीकृत किया, पुरातत्वशास्त्र आरंभ हुआ, भारतीय ग्रंथ यूरोप पहुँचे। किंतु वह दो बातें कहता है जो तराजू का पलड़ा तय कर देती हैं। पहली, ये अधिकांशतः अनपेक्षित परिणाम थे, उद्देश्य नहीं : रेलमार्ग कच्चा माल बंदरगाहों तक और सेनाएँ विद्रोहों तक पहुँचाने के लिए बिछाए गए थे और उन्होंने विद्यमान व्यापार मार्गों की प्रायः उपेक्षा की। दूसरी, इनका व्यय भारतीयों ने चुकाया। अध्याय का निष्कर्ष है : “भारतवासियों ने अपने ही अधीनीकरण के लिए स्वयं धन उपलब्ध कराया।” और ‘सभ्यकारी अभियान’ बचाव नहीं हो सकता — भारत की अपनी सभ्यता यूरोप से कहीं प्राचीन थी।
सुझाव : ‘प्रभाव’ पूछे जाने पर सदैव आर्थिक, राजनैतिक/प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों को अलग-अलग लिखिए और प्रत्येक के लिए एक ठोस प्रमाण दीजिए। विशेषणों की सूची उत्तर नहीं होती; एक तिथि, एक आँकड़ा या एक उद्धरण उत्तर होता है।
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