उपनिवेशवाद वह व्यवहार है जब एक देश किसी अन्य प्रदेश पर अधिकार कर वहाँ अपनी बस्तियाँ स्थापित करता है और अपना राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक तंत्र आरोपित करता है। यही अध्याय की अपनी परिभाषा है। ध्यान दीजिए कि इसमें तीन बातें हैं — केवल व्यापार या केवल विजय उपनिवेशवाद नहीं है।
| तीनों अंग | अर्थ | इसी अध्याय से उदाहरण |
|---|---|---|
| राजनैतिक नियंत्रण | किसी भूभाग के निर्णय वहाँ के निवासी नहीं, बाहरी लोग लेते हैं | सहायक संधि ने वास्तविक सत्ता ब्रिटिशों को दे दी और भारतीय शासक के पास प्रभुसत्ता का केवल आभास रहा |
| बस्तियाँ | अधिकार करने वाला देश अपने लोग, दुर्ग, बंदरगाह और प्रशासन बसाता है | गोवा (1510) पुर्तगाली उपनिवेश की राजधानी; सूरत, मद्रास, बंबई और कलकत्ता में अंग्रेजी केंद्र; दुर्गीकृत, ग्रिड-रूपरेखा वाला पांडिचेरी (चित्र 4.6) |
| अपना तंत्र आरोपित करना | उसकी अर्थव्यवस्था, विधि, भाषा और मान्यताएँ स्थानीय व्यवस्थाओं का स्थान ले लेती हैं | प्रथागत विधियों के स्थान पर ब्रिटिश कानून-संहिताएँ; मैकॉले की शिक्षा नीति; गोवा का धर्म-न्यायाधिकरण और बलात धर्मांतरण |
यह नवीन घटना नहीं है। अध्याय उपनिवेशवाद की परंपरा को प्रथम सहस्राब्दी सा.सं. पू. के महान साम्राज्यों तक ले जाता है और बताता है कि प्रथम सहस्राब्दी सा.सं. में ईसाई तथा इस्लामी धर्मों के प्रसार के साथ-साथ जिन क्षेत्रों को नए धर्मों में परिवर्तित किया गया, वहाँ का उपनिवेशीकरण भी हुआ। किंतु ‘औपनिवेशिक युग’ से सामान्यतः आशय 15वीं शताब्दी से आरंभ हुए यूरोपीय विस्तार से है — स्पेन, पुर्तगाल, ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड द्वारा अफ्रीका, एशिया, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा प्रशांत महासागर के अनेक द्वीपों पर उपनिवेश स्थापित करना।