पहले भाग का उत्तर अध्याय स्वयं देता है — “ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि ही राष्ट्रपति के निर्वाचन में मतदान करें। इससे लोकतांत्रिक रूप बना रहता है क्योंकि राष्ट्रपति को जनता की इच्छा का प्रतिनिधि माना जाता है — अप्रत्यक्ष किंतु सार्थक रूप से।” देखिए कि यह एक नियम पूरी बहिष्कृत सूची को कैसे समझा देता है, और फिर दूसरा प्रश्न लीजिए।
निर्वाचक मंडल में कौन है (पृष्ठ 136) —
- संसद के दोनों सदनों — लोकसभा और राज्यसभा — के सदस्य।
- भारत के प्रत्येक राज्य तथा दिल्ली और पुडुचेरी के केंद्र/संघ शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के सदस्य।
कौन सम्मिलित नहीं, और बहिष्कार एक ही नियम से क्यों निकलता है —
| बाहर रखा गया समूह | वे क्यों बाहर हैं |
|---|---|
| राज्यसभा के मनोनीत सदस्य (12) | इन्हें राष्ट्रपति ने नामित किया है, किसी ने चुना नहीं। यदि ये अगले राष्ट्रपति के चयन में भाग लें, तो एक पद अपने ही उत्तराधिकार को प्रभावित करने लगेगा |
| राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य | वही कारण — किसी मतदाता ने इन्हें नहीं चुना, इसलिए इन्हें जनता से जोड़ने वाली मतों की कोई कड़ी नहीं है |
| द्विसदनीय विधानमंडलों में विधान परिषदों के सदस्य — निर्वाचित और मनोनीत, दोनों | विधान परिषद राज्य का उच्च सदन है। इसके ‘निर्वाचित’ सदस्य भी आम मतदाता-समूह द्वारा नहीं चुने जाते — उन्हें शिक्षकों, स्नातकों और स्थानीय निकायों जैसे विशेष निर्वाचक समूह चुनते हैं। अर्थात् वे जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित नहीं हैं |
| केंद्र शासित प्रदेशों, दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य | फिर वही — ये निर्वाचित नहीं, मनोनीत हैं |
इस स्तंभ को नीचे तक पढ़िए और नियम दिखाई देगा — केवल वही मत दे सकते हैं जिन्हें स्वयं मतदाताओं ने पद पर बैठाया है। प्रत्येक बाहर रखा गया समूह इसी एक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
आम जनता प्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित क्यों नहीं होती। कई कारण मिलकर काम करते हैं —
- राष्ट्रपति कोई कार्यक्रम चलाने के लिए चुना गया नीति-निर्माता नहीं है। सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री करता है, जो लोकसभा के बहुमत से आता है — और लोकसभा को जनता प्रत्यक्ष रूप से चुनती ही है। राष्ट्रपति के लिए अलग से देशव्यापी जन-चुनाव कराने पर संसदीय शासन प्रणाली में जनता के अधिकार के दो प्रतिद्वंद्वी दावे खड़े हो जाते, जिसके लिए यह प्रणाली बनी ही नहीं है।
- राष्ट्रपति पूरे देश का — संघ और राज्यों का — प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए निर्वाचक मंडल में सांसदों के साथ विधायक भी हैं। अध्याय कहता है — “चूँकि राष्ट्रपति पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए यह पद्धति केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों का सहयोग लेती है।”
- एकल संक्रमणीय मत प्रणाली और मतों का भारित मूल्य। मतदान और मतगणना के नियम बहुत विस्तृत हैं और अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। राज्यों के बीच तथा संसद और राज्यों के बीच का यह सावधान संतुलन एक निश्चित निर्वाचक मंडल से ही संभव है, साधारण देशव्यापी मतदान से नहीं।
- वैधता की कड़ी टूटती नहीं, केवल लंबी होती है। जनता सांसदों और विधायकों को चुनती है; वही सांसद और विधायक राष्ट्रपति को चुनते हैं। इसलिए राष्ट्रपति भी जनता की इच्छा से ही पद पर है — अप्रत्यक्ष किंतु सार्थक रूप से।