अन्वेषण अध्याय 5 प्रश्न और क्रियाकलाप

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर

क्योंकि यही एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई सरकार ईमानदारी से यह दावा कर सकती है कि वह संपूर्ण जनता की ओर से बोलती है — और यही एकमात्र व्यवस्था है जिसमें जनता उसे हटा भी सकती है। अध्याय इसे “भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला” कहता है। कारण, और उनके साथ अध्याय के प्रमाण —

  1. यह नागरिकों को राजनीतिक रूप से समान बनाता है। जाति, मत, नस्ल, धर्म, लिंग, शिक्षा या आय का भेदभाव किए बिना प्रत्येक वयस्क को एक मत मिलता है और सभी मतों का मूल्य समान है। मतदान केंद्र के बाहर लोगों में धन और शक्ति का बड़ा अंतर होता है; भीतर नहीं। समानता का यही एक दिन निर्धनतम नागरिक को सबसे शक्तिशाली पर पकड़ देता है।
  2. यह प्रतिनिधियों को उत्तरदायी बनाता है। पृष्ठ 120 का मानस-मानचित्र कहता है — निर्वाचित प्रतिनिधि निर्वाचकों के प्रति उत्तरदायी हैं — और बाहर का गोला बताता है कैसे — “चुनाव में लोग इन्हें हरा सकते हैं।” जिस प्रतिनिधि का पद जा सकता है, उसे सुनते रहना पड़ता है।
  3. किसी समूह की उपेक्षा सुरक्षित नहीं रहती। जब प्रत्येक वयस्क मत देता है, तब निर्धनों, महिलाओं या किसी छोटे समुदाय की उपेक्षा करने वाला दल उनके मत खो देता है। सार्वभौमिक मताधिकार हर समुदाय को राजनीतिक गणना के भीतर ले आता है।
  4. यह लोगों को अपने भविष्य पर अधिकार देता है। लोग निश्चित करते हैं कि वे कैसा भविष्य चाहते हैं और उनका प्रतिनिधित्व उत्तम ढंग से कौन कर सकता है, तथा वे अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान में भाग लेते हैं।
  5. यह वैधता और शांति देता है। सब वयस्कों द्वारा चुनी गई सरकार को वे भी स्वीकार कर लेते हैं जिन्होंने उसके विरुद्ध मत दिया — इसलिए सत्ता बल से नहीं, मत गिनकर बदलती है।
  6. यह नागरिकता की पाठशाला है। मताधिकार नागरिक सहभागिता बढ़ाता है — समझदारी से मत देने के लिए व्यक्ति को यह जानना पड़ता है कि हो क्या रहा है और प्रत्याशी क्या कह रहे हैं।
दूसरा विकल्प असफल क्यों होता: 1947 में कुछ लोगों ने मताधिकार केवल साक्षरों को देने का तर्क दिया था, जब साक्षरता लगभग 14 प्रतिशत और महिलाओं में 8 प्रतिशत थी। ऐसा नियम विशाल बहुमत को — और लगभग सभी महिलाओं को — मूक बना देता और सत्ता एक छोटे विशेषाधिकार-प्राप्त वर्ग के हाथ सौंप देता। स्वतंत्रता से पहले लगभग 13 प्रतिशत भारतीय ही मत दे सकते थे, और वह व्यवस्था औपनिवेशिक राज्य के काम आती थी, भारतीय जनता के नहीं। संविधान निर्माताओं ने उसे इसीलिए अस्वीकार किया — जिस लोकतंत्र में अधिकांश वयस्क मत ही न दे सकें, वह लोकतंत्र है ही नहीं।
क्या आप जानते हैं? सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सबसे नीचे तक पहुँचता है। भारत में 2,50,000 से भी अधिक स्थानीय निकायों में 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, जिनमें 13 लाख महिलाएँ हैं — और ये सभी इसी सिद्धांत से चुने जाते हैं।
प्र2.
‘गुप्त मतदान’ का क्या अर्थ है? यह लोकतंत्र में क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर

गुप्त मतदान का अर्थ है — ऐसा मतदान जिसमें कोई यह न जान पाए कि किसने अपना मत किसे दिया। अध्याय की अपनी परिभाषा सूर्योदय विद्यालय के प्रकरण से आती है — सुश्री उषा ने नियम समझाते हुए बताया कि गुप्त मतदान प्रक्रिया क्या होती है, “जिससे कोई यह न जान पाए कि किसने अपना मत किसे दिया। इससे यह प्रक्रिया गोपनीय और निष्पक्ष बनी रहती है।”

भारतीय चुनाव में गोपनीयता वास्तव में कैसे बनाई जाती है:

  • मतदाता अकेले परदे वाले मतदान कक्ष में जाता है।
  • ई.वी.एम. केवल प्रत्येक प्रत्याशी के मतों की कुल संख्या दर्ज करती है — यह कभी नहीं कि कौन-से मतदाता ने कौन-सा बटन दबाया।
  • वी.वी.पी.ए.टी. की पर्ची मतदाता को एक खिड़की से दिखाकर सीलबंद पेटी में गिरा दी जाती है; वह मतदान केंद्र से बाहर नहीं जाती।
  • मतपत्र या मशीनें गणना तक सीलबंद रहती हैं — ठीक जैसे सुश्री उषा ने कक्षा में पेटी सील की थी।

यह क्यों महत्वपूर्ण है — एक नहीं, चार परिणाम:

गोपनीयता किसे रोकती हैउसके बिना क्या होता
दबावनियोक्ता, भूस्वामी या कोई दबंग मतदाताओं को धमका सकता और फिर जाँच सकता कि किसने कहा माना
मत खरीदनाप्रत्याशी मतों का मूल्य देकर सौदा पूरा होना जाँच सकता। जिस खरीदे मत की जाँच न हो सके, वह घाटे का सौदा है — गोपनीयता ही उसे अपुष्ट बनाती है
परिणाम के बाद प्रतिशोधविजेता उन्हें पहचानकर दंडित कर सकते जिन्होंने उनके विरुद्ध मत दिया; हारने वालों के समर्थक भय में जीते
सामाजिक दबावलोग अपने विवेक से नहीं, बल्कि जाति-समूह, नियोक्ता या परिवार की अपेक्षा के अनुसार मत देते
यह मत को केवल गोपनीय नहीं, समान भी बनाता है: सार्वभौमिक मताधिकार प्रत्येक वयस्क को समान मूल्य का एक मत देता है। किंतु धमकी या धन के बल पर दिया गया मत वास्तव में मतदाता का रहता ही नहीं — उसका मूल्य उस व्यक्ति को चला जाता है जिसने दबाव डाला। गोपनीयता ही अनुच्छेद 326 की वादा की हुई समानता की रक्षा करती है। इसीलिए गोपनीयता और खुलापन साथ-साथ चलते हैं — चुनाव गुप्त है, जबकि प्रक्रिया — नियम, गणना, परिणाम — पूरी तरह सार्वजनिक।
प्र3.
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनावों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर

प्रत्यक्ष चुनाव में जनता स्वयं पदाधिकारी को चुनती है; अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता प्रतिनिधि चुनती है और वे प्रतिनिधि पदाधिकारी को चुनते हैं। अध्याय दोनों के स्पष्ट उदाहरण देता है।

 प्रत्यक्ष चुनावअप्रत्यक्ष चुनाव
कौन मत देता हैनिर्वाचन क्षेत्र का प्रत्येक पंजीकृत वयस्क नागरिकनिर्वाचित प्रतिनिधियों का एक निश्चित समूह
अध्याय से उदाहरणलोकसभा — 543 निर्वाचन क्षेत्र, सांसद मतदाताओं द्वारा निर्वाचित
राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों की विधान सभाएँ — विधायक मतदाताओं द्वारा निर्वाचित
ग्राम पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय — कक्षा 6 में पढ़े गए; इनका प्रबंधन राज्य निर्वाचन आयोग करता है
राज्यसभा — 245 में से 233 सदस्य राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित विधायकों द्वारा चुने जाते हैं (12 राष्ट्रपति द्वारा नामित)
भारत के राष्ट्रपति — संसद के दोनों सदनों के सदस्यों तथा राज्यों एवं दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के सदस्यों के निर्वाचक मंडल द्वारा
भारत के उपराष्ट्रपति — संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्यों के निर्वाचन मंडल द्वारा
मतदान की विधिएक व्यक्ति, एक मत; ‘जो सबसे आगे, वह जीता’ — सर्वाधिक मत पाने वाला प्रत्याशी विजयीएकल संक्रमणीय मत प्रणाली — मतदाता प्रत्याशियों को वरीयता के अनुसार क्रम देते हैं
अध्याय का विद्यालय-उदाहरणपूरी कक्षा कक्षा प्रतिनिधि चुनती हैयदि विद्यालयी स्तर की विशेष परिषद के सदस्य कक्षा प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाएँ, तो वह अप्रत्यक्ष चुनाव होगा
भारत दोनों का उपयोग क्यों करता है: प्रत्यक्ष चुनाव किसी सदन को स्वयं जनता का अधिकार देता है, इसीलिए लोकसभा — जिससे सरकार बनती है — प्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती है। अप्रत्यक्ष चुनाव किसी सदन को केवल जनसंख्या के अतिरिक्त कुछ और का प्रतिनिधित्व करने देता है। राज्यसभा ‘राज्यों की परिषद’ है — इसे राज्य विधानमंडल चुनते हैं ताकि संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व हो, और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली इसलिए ताकि छोटे राज्यों को भी समुचित प्रतिनिधित्व मिले। राष्ट्रपति, जिसे पूरे संघ का प्रतिनिधित्व करना है, संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा मिलकर चुना जाता है।
ध्यान रखें: ‘अप्रत्यक्ष’ का अर्थ ‘अलोकतांत्रिक’ नहीं है। मतदाता विधायक चुनते हैं; विधायक राज्यसभा के सदस्य चुनते हैं और राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। सहमति की कड़ी लंबी अवश्य है, किंतु आरंभ मतदाता से ही होता है।
प्र4.
लोकसभा के सदस्यों का चुनाव, राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर

अंतर नाम में नहीं है — दोनों के सदस्य सांसद ही कहलाते हैं — बल्कि इसमें है कि उन्हें कौन चुनता है, मतों की गणना कैसे होती है और सदन कितने समय तक रहता है।

 लोकसभाराज्यसभा
चुनाव का प्रकारप्रत्यक्ष — जनता द्वाराअप्रत्यक्ष — निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा
कौन मत देता हैनिर्वाचन क्षेत्र का 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक पंजीकृत नागरिकराज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य (विधायक)
संख्या543 निर्वाचन क्षेत्र245 सदस्य — 233 विधायकों द्वारा निर्वाचित और 12 भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित
गणना की विधि‘जो सबसे आगे, वह जीता’ — निर्वाचन क्षेत्र में सर्वाधिक मत पाने वाला जीतता है, चाहे 50 प्रतिशत न मिले होंएकल संक्रमणीय मत प्रणाली — विधायक प्रत्याशियों को वरीयता के अनुसार क्रम देते हैं
सीटों का बँटवाराप्रति निर्वाचन क्षेत्र एक सीट; 84 अनुसूचित जातियों और 47 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षितप्रत्येक राज्य को जनसंख्या के अनुसार सीटें — उत्तर प्रदेश की सीटें अरुणाचल प्रदेश से अधिक
सदन की आयुपूरा सदन एक साथ चुना जाता है और विघटित हो सकता हैस्थायी सदन — कभी विघटित नहीं होता। सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष; प्रत्येक दो वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और नए चुने जाते हैं
किसका प्रतिनिधित्वसीधे जनता का; इसी के बहुमत से सरकार बनती हैराज्यों का — यह राज्यों की परिषद है
रचना भिन्न क्यों है: दोनों सदनों के काम अलग हैं। लोकसभा को जनता की वर्तमान इच्छा दर्शानी है, इसलिए वह प्रत्यक्ष रूप से और पूरी एक साथ चुनी जाती है, और उसमें बहुमत पाने वाला दल या गठबंधन सरकार बनाता है। राज्यसभा को राज्यों का प्रतिनिधित्व करना है और निरंतरता देनी है — चूँकि प्रत्येक दो वर्ष में केवल एक-तिहाई बदलता है, यह कभी एक साथ नहीं बहती, और संसद में सदैव पिछले काल के अनुभव वाले सदस्य बने रहते हैं। एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से छोटे राज्य तथा विधान सभा के छोटे समूह भी सीट पा सकते हैं, न कि सबसे बड़ा दल सब कुछ ले जाए।
ध्यान दीजिए: एकल संक्रमणीय मत प्रणाली की सटीक कार्यप्रणाली आप उच्च कक्षाओं में पढ़ेंगे। अभी इतना जान लेना पर्याप्त है कि वह क्या साधती है — वरीयताओं के अनुपात में प्रतिनिधित्व, न कि विजेता को सब कुछ।
प्र5.
आपके विचार से मतपत्रों की तुलना में ई.वी.एम. के क्या-क्या लाभ हैं?
उत्तर

मुख्य लाभ हैं — गणना में तेजी और शुद्धता, अवैध मतों का लगभग समाप्त हो जाना, और वी.वी.पी.ए.टी. के साथ ऐसा कागजी प्रमाण जिसे फिर भी जाँचा जा सके। दोनों की सीधी तुलना कीजिए।

 मतपत्रवी.वी.पी.ए.टी. सहित ई.वी.एम.
मत डालनानाम के सामने ‘X’ का चिह्न लगाना, पत्र मोड़कर पेटी में डालनाएक बटन दबाना; बीप की ध्वनि से पुष्टि होती है और वी.वी.पी.ए.टी. में छपी पर्ची दिखती है
अवैध मतसामान्य — बिना चिह्न का मतपत्र, गलत स्थान पर चिह्न या दो चिह्न होने पर मत अवैध हो जाता है। 33 मतों के कक्षा-चुनाव में 3 मतपत्र इसी कारण अवैध हुएलगभग असंभव — मशीन ठीक एक बटन स्वीकार करती है, इसलिए मत या तो पड़ा है या नहीं पड़ा
गणनाप्रत्येक मतपत्र छाँटकर हाथ से गिनना पड़ता है; परिणाम में बहुत समय लगता है और मानवीय त्रुटि की संभावना रहती हैमशीन कुल संख्या दिखा देती है; पूरे निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम कुछ घंटों में मिल जाता है
व्यय और सामग्रीलाखों छपे मतपत्र, मतपेटियाँ, भंडारण — और बहुत सारा कागजमशीनें अनेक चुनावों में पुनः प्रयुक्त होती हैं; कागज बहुत कम
सुरक्षापेटी में अतिरिक्त मतपत्र भरे जा सकते हैं या पेटी छीनी जा सकती हैमशीन एक सीमित गति से ही मत दर्ज करती है और सीलबंद कर रखी जा सकती है; मतपत्र डालकर कुल नहीं बदला जा सकता
सत्यापनमतपत्र स्वयं ही प्रमाण हैंवी.वी.पी.ए.टी. मत की छपी पर्ची निकालती है, जिससे मतदाता जान लेता है कि उसका इलेक्ट्रॉनिक वोट सही से दर्ज हो गया है; और यह पर्ची विवाद अथवा इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली में त्रुटि की स्थिति में सत्यापन और पुनः गणना के लिए बैकअप प्रमाण देती है
इस तर्क में वी.वी.पी.ए.टी. का महत्व: किसी भी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली पर सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि मतदाता को ऐसी मशीन पर भरोसा करना पड़ता है जिसे वह जाँच नहीं सकता। वी.वी.पी.ए.टी. इस आपत्ति का उत्तर देती है और मशीन के लाभ भी बने रहते हैं — मतदाता अपनी पसंद की पुष्टि करती छपी पर्ची देख लेता है, और वही पर्ची सीलबंद पेटी में ऐसे प्रमाण के रूप में रह जाती है जिसे दोबारा गिना जा सके। इस प्रकार ई.वी.एम.–वी.वी.पी.ए.टी. का संयोजन इलेक्ट्रॉनिक की गति और शुद्धता तथा कागज की जाँच-योग्यता, दोनों बनाए रखता है।
क्या आप जानते हैं? भारत की ई.वी.एम. और वी.वी.पी.ए.टी. प्रणाली का उपयोग नामीबिया और भूटान जैसे देशों में भारत निर्वाचन आयोग की सहायता से किया जाता है, और अन्य देशों ने भी इस प्रौद्योगिकी का अध्ययन किया है तथा इसे अपनाने के लिए भारत से प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
प्र6.
भारत के कुछ नगरीय क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत में कमी आ रही है। इस प्रवृत्ति के क्या कारण हो सकते हैं और अधिक लोगों को मतदान हेतु प्रोत्साहित करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
उत्तर

अध्याय इस स्थिति को नाम देता है — “मतदाताओं की उदासीनता (विशेषकर शहरी क्षेत्रों में)” — और इसे भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों में गिनता है। 2024 में लगभग 34 प्रतिशत पात्र मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया। शहरी मतदान का ग्रामीण से कम रहना एक जानी-पहचानी प्रवृत्ति है, और इसके कारण चार वर्गों में आते हैं।

कारणशहरों में यह अधिक क्योंवास्तव में क्या काम करेगा
उदासीनता — “मेरे मत से क्या होगा”शहरी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता बहुत अधिक होते हैं, इसलिए एक मत छोटा लगता है। अनेक नगरवासी विजेता प्रत्याशी से स्वयं को दूर अनुभव करते हैंजागरूकता अभियान, जिनमें बहुत कम अंतर से तय हुई सीटें दिखाई जाएँ; विद्यालय-महाविद्यालय में मतदाता शिक्षा; मीडिया और संस्थाएँ यह समझाएँ कि सांसद या पार्षद वास्तव में क्या तय करता है
प्रवास और आवागमनलोग काम के लिए शहर आते हैं किंतु नाम गाँव या पिछले शहर की सूची में ही रहता है, और मतदान के दिन लौटना संभव नहीं होतानए पते पर पंजीकरण का सरल स्थानांतरण; नई बस्तियों में घर-घर नामांकन अभियान
मतदाता सूची की समस्याएँकिराए के मकान बार-बार बदलने से नाम हट जाते हैं या गलत वार्ड में चले जाते हैंसूची की ऑनलाइन जाँच और सुधार; चुनाव की घोषणा से पहले हर मोहल्ले में सत्यापन शिविर
मतदान के दिन को अवकाश मान लेनाकार्यदिवस के अवकाश का उपयोग यात्रा या मनोरंजन में होता है; कुछ मतदाता लौटने का कष्ट ही नहीं उठातेनियोक्ताओं के लिए सवेतन अवकाश देना और उसका अभिलेख रखना अनिवार्य हो; अवकाश को मतदान से जोड़ना संभव नहीं है, इसलिए यहाँ काम समझाने से ही होगा
विकल्पों से असंतोषजिन मतदाताओं को कोई प्रत्याशी उपयुक्त नहीं लगता, वे आपत्ति दर्ज कराने के बजाय घर बैठ जाते हैंनोटा समझाना — इससे परिणाम नहीं बदलता, किंतु यह दर्ज हो जाता है कि मतदाता बेहतर विकल्प चाहते हैं

अब तक क्या किया जा चुका है, अध्याय से ही: वृद्धों और दिव्यांगों के लिए घर से मतदान (2024 से), विशेष वर्गों के लिए डाक से मतदान, ब्रेल-सक्षम मतपत्र, पहिया कुर्सी और रैंप्स के लिए ऐप-आधारित अनुरोध, तथा अधिकारियों का दूर-दूर तक जाना — यहाँ तक कि केवल एक मतदाता के लिए मतदान केंद्र बनाना। इनसे आयोग का तरीका स्पष्ट होता है — मतदाता को दोष देने के बजाय बाधा हटाओ।

घटता शहरी मतदान केवल एक बेढंगा आँकड़ा क्यों नहीं है: यदि कोई वर्ग दूसरे वर्गों से बहुत कम मत देगा, तो विधायिका उस वर्ग की बात कम सुनेगी और नीतियाँ चुपचाप उन्हीं की ओर झुक जाएँगी जो मतदान करते हैं। और कम मतदान पर जीता प्रतिनिधि मतदाता-समूह के छोटे भाग का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे वह उत्तरदायित्व कमजोर पड़ता है जिसकी बात पृष्ठ 120 का मानस-मानचित्र करता है। अध्याय का निष्कर्ष यही है — “एक जागरूक और सतर्क मतदाता लोकतांत्रिक प्रणाली की सबसे शक्तिशाली सुरक्षा है।”
प्र7.
आपके विचार में लोकसभा की कुछ सीटें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित क्यों होती हैं? एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर

सीटों का आरक्षण इसलिए है कि जिन समुदायों को ऐतिहासिक रूप से सत्ता से बाहर रखा गया, वे विधायिका में वास्तव में उपस्थित हों — केवल मतदान करने की अनुमति भर न पाएँ। अध्याय संख्याएँ देता है — 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से 84 अनुसूचित जाति के व्यक्तियों के लिए और 47 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं; शेष 412 सामान्य हैं।

412 सामान्य + 84 अ.जा. + 47 अ.ज.जा. = 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र
आरक्षित सीटें = 84 + 47 = 131, अर्थात् सदन का लगभग 24 प्रतिशत
412 सामान्य 84 सीटें — अ.जा. 47 सीटें — अ.ज.जा. 412 सीटें — सामान्य कुल 543
लोकसभा की 543 सीटों का विभाजन, जैसा पृष्ठ 129 के वृत्त-चित्र में दिखाया गया है।

कारण, संक्षिप्त टिप्पणी के रूप में:

  1. केवल मतदान से प्रतिनिधित्व की गारंटी नहीं मिलती। ‘जो सबसे आगे, वह जीता’ प्रणाली में निर्वाचन क्षेत्र में सर्वाधिक मत पाने वाला जीतता है। यदि किसी समुदाय के लोग लगभग हर जगह अल्पसंख्यक हैं, तो वे हर चुनाव में मत देकर भी अपने बीच से लगभग किसी को नहीं चुन पाएँगे। कुछ निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित करने से यह निश्चित हो जाता है कि वहाँ विजेता उसी समुदाय से आएगा।
  2. इन समुदायों ने लंबे समय तक बहिष्कार सहा। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को पीढ़ियों तक शिक्षा, भूमि, मंदिर-प्रवेश और सार्वजनिक पदों से वंचित रखा गया। कागज पर लिखी समानता इसे शीघ्र नहीं मिटा सकती थी; कानून बनाने वाले सदन में निश्चित स्थान उन्हें उस समय तक आवाज़ दे सकता था जब तक यह मिटाया जा रहा हो।
  3. कानून तब बेहतर बनते हैं जब प्रभावित लोग उन्हें बनाने में भाग लें। जनजातीय भूमि, वन अधिकार, भेदभाव और शिक्षा तक पहुँच के प्रश्न वही सदस्य सबसे अच्छे ढंग से उठा सकते हैं जिन्होंने ये परिस्थितियाँ जी हैं — केवल दूसरों का वर्णन पर्याप्त नहीं।
  4. यह लोकतंत्र को कमजोर नहीं, मजबूत करता है। ध्यान दीजिए — आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में प्रत्येक मतदाता मत देता है; आरक्षण सीट का है, मत का नहीं। इसलिए किसी मतदाता का कोई अधिकार नहीं जाता; सदन केवल उस देश जैसा बन जाता है जिसका वह शासन करता है।
यह इसी अध्याय में क्यों है: अध्याय का तर्क यही है कि सार्वभौमिक मताधिकार तभी सार्थक है जब लोग उसका वास्तव में उपयोग कर सकें। सुगमता के उपाय यह सुनिश्चित करते हैं कि दिव्यांग या वृद्ध मतदाता मत डाल सके; आरक्षित सीटें यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत समुदाय बनने वाले सदन में वास्तव में सुने जाएँ। दोनों एक ही प्रश्न के उत्तर हैं — औपचारिक अधिकार को वास्तविक अधिकार कैसे बनाया जाए?
प्र8.
सोशल मीडिया हमारे चुनावी अनुभव के तरीके को बदल रहा है — आकर्षक प्रचार रीलों और लाइव भाषणों से लेकर इंस्टाग्राम और ट्विटर पर राजनैतिक वाद-विवाद तक। क्या यह लोकतंत्र को सशक्त बना रहा है या इसे उलझा रहा है? समूह बनाकर चर्चा कीजिए — इसके लाभ एवं चुनौतियाँ क्या हैं और डिजिटल युग में चुनावों का भविष्य क्या हो सकता है?
उत्तर

ईमानदार उत्तर यह है कि सोशल मीडिया दोनों काम करता है, और इनमें से कौन भारी पड़ेगा यह इस पर निर्भर है कि मतदाता उसका उपयोग कैसे करते हैं। समूह-चर्चा के लिए सामग्री — लाभ, चुनौतियाँ और भविष्य — साथ में वह कसौटी जो अध्याय स्वयं देता है।

लाभ — यह लोकतंत्र को कैसे सशक्त करता हैचुनौतियाँ — यह कैसे उलझा सकता है
सीधी पहुँच। मतदाता प्रत्याशी के अपने शब्द लाइव सुन सकता है, समाचार-पत्र की प्रतीक्षा किए बिनाझूठी सूचना तेजी से फैलती है। छेड़छाड़ किया गया वीडियो या गढ़ा गया दावा सुधार से पहले ही करोड़ों तक पहुँच जाता है — और सुधार मूल सामग्री से कहीं धीमे चलता है
बोलने की लागत कम। जिस प्रत्याशी के पास होर्डिंग के लिए धन नहीं और जिस साधारण नागरिक के पास प्रश्न है — दोनों सुने जा सकते हैंधन नए रूप में लौट आता है। सशुल्क विज्ञापन, प्रायोजित पोस्ट और खातों की भीड़ बिना धन वाली आवाज़ को दबा सकती है — यह अध्याय की उसी चिंता से जुड़ता है कि चुनावों में धन का प्रभाव बढ़ रहा है
दो-तरफा संवाद। मतदाता सार्वजनिक रूप से प्रश्न पूछ सकते हैं और देख सकते हैं कि उत्तर मिलता है या नहींअपशब्द और शत्रुता। अध्याय प्रत्याशी द्वारा आपत्तिजनक भाषा (चित्र 5.18) को आचार संहिता का उल्लंघन बताता है; ऑनलाइन ऐसी भाषा और दूर तथा और तेज फैलती है
युवाओं तक पहुँच। अनेक नए मतदाता समाचार यहीं से पाते हैं; आयोग स्वयं इन माध्यमों से मतदाता जागरूकता फैलाता हैएक जैसे विचारों का घेरा। फीड वही अधिक दिखाती है जिससे आप पहले ही सहमत हैं, इसलिए मतदाता दूसरे पक्ष के तर्क से मिलना ही बंद कर सकते हैं
सार्वजनिक जवाबदेही। रील में दर्ज वादा पाँच वर्ष बाद फिर चलाया जा सकता हैविषय से अधिक शैली। बीस सेकंड की रील में याद रह जाने वाली पंक्ति को पुरस्कार मिलता है, काम की योजना को नहीं

भविष्य कैसा हो सकता है: सड़क से अधिक ऑनलाइन प्रचार; निर्वाचन आयोगों द्वारा डिजिटल चुनावी व्यय और सशुल्क राजनैतिक विज्ञापन की उतनी ही कड़ी निगरानी जितनी पोस्टरों और सभाओं की; सत्यापन के तेज साधन और छेड़छाड़ की गई सामग्री पर स्पष्ट चिह्न; और — जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता से विश्वसनीय नकली वीडियो बनाना सरल होगा — ऐसे मतदाताओं की कहीं अधिक आवश्यकता जो साझा करने से पहले दावे की जाँच करें। आदर्श आचार संहिता को ऑनलाइन आचरण पर भी उतनी ही पूर्णता से लागू करना होगा जितना धरातल पर।

इस सबको जाँचने की कसौटी: अध्याय कहता है कि आगे बढ़ने का मार्ग मतदाताओं को उस जानकारी से सशक्त करने में है, जिसकी उन्हें “विचारशील और उत्तरदायी चुनाव करने के लिए आवश्यकता होती है”, और मीडिया, शिक्षा तथा जागरूकता अभियानों को मिलकर लोगों — विशेषकर युवाओं — को समझाना चाहिए कि सोच-समझकर मतदान करना क्यों महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी डिजिटल परिवर्तन से यह पूछिए — क्या इससे मतदाता बेहतर निर्णय कर पाता है, या इससे केवल कोई और तेजी से मना पाता है? जो सोशल मीडिया सूचना देता है वह लोकतंत्र को सशक्त करता है; जो केवल उत्तेजित करता, भ्रमित करता या बाँटता है, वह नहीं।
जोड़ी में चर्चा के लिए संकेत: किसी सार्वजनिक विषय पर हाल ही में ऑनलाइन देखा गया कोई एक दावा लीजिए और उसके मूल स्रोत तक पहुँचने का प्रयास कीजिए। आप सफल हों या न हों, यही अभ्यास स्वयं इस प्रश्न का उत्तर है — जागरूक और सतर्क मतदाता ही लोकतांत्रिक प्रणाली की सबसे शक्तिशाली सुरक्षा है।
प्र9.
वेबसाइट ______ पर जाएँ और किसी भी वर्ष के एक निर्वाचन संसदीय चुनाव क्षेत्र के परिणामों का अध्ययन करें। अपने राज्य के किसी विधान सभा चुनाव का भी इसी प्रकार अध्ययन करें।
उत्तर

पहले यह ध्यान दीजिए कि मुद्रित पुस्तक में इस प्रश्न में वेबसाइट का पता रिक्त छोड़ दिया गया है — जहाँ वेबसाइट का नाम आना चाहिए, वह स्थान हिंदी और अंग्रेजी दोनों संस्करणों में खाली है। जिस स्थल की बात है वह भारत निर्वाचन आयोग का आधिकारिक चुनाव परिणाम पोर्टल है, जो आयोग की अपनी वेबसाइट eci.gov.in से पहुँचा जा सकता है और जहाँ अनेक दशकों के प्रत्येक संसदीय तथा विधान सभा क्षेत्र के परिणाम प्रकाशित हैं। आरंभ करने से पहले वर्तमान पता अपने शिक्षक से पुष्ट कर लीजिए।

विधि — इसी क्रम में कीजिए:

  1. एक वर्ष और एक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र चुनिए — अपना क्षेत्र सबसे रोचक रहेगा।
  2. उसका परिणाम खोलकर लिखिए — विजेता प्रत्याशी और दल, दूसरे स्थान का प्रत्याशी, दोनों को मिले मत, कुल वैध मत, नोटा की संख्या और मतदान प्रतिशत।
  3. यही अपने राज्य के किसी विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए दोहराइए — यदि हो सके तो ऐसा क्षेत्र चुनिए जो उसी संसदीय क्षेत्र के भीतर आता हो।
  4. दोनों की तुलना कीजिए और चार-पाँच वाक्यों में लिखिए कि आपने क्या देखा।

क्या देखना है — यही आँकड़े उतारने को उत्तर में बदलता है:

आँकड़ों से पूछने योग्य प्रश्नयह आपको क्या सिखाता है
क्या विजेता को 50 प्रतिशत से अधिक मत मिले?प्रायः नहीं — यही ‘जो सबसे आगे, वह जीता’ प्रणाली है। अध्याय का अपना उदाहरण — गुरमत 33 में से 12 मत पाकर जीत गईं
जीत का अंतर कितना था?कुछ सीटें कुछ सौ मतों से तय होती हैं। “मेरे एक मत से क्या होगा” का इससे स्पष्ट उत्तर कोई नहीं
मतदान प्रतिशत कितना था?राष्ट्रीय आँकड़े से तुलना कीजिए — 2024 में लगभग 66 प्रतिशत ने मत दिया, अर्थात् लगभग 34 प्रतिशत ने नहीं
नोटा को कितने मत मिले?इससे परिणाम नहीं बदलता, पर सभी प्रत्याशियों से असंतोष दर्ज हो जाता है
क्या सीट अ.जा. या अ.ज.जा. के लिए आरक्षित है?84 लोकसभा सीटें अनुसूचित जातियों और 47 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं
क्या संसदीय और विधान सभा — दोनों सीटें एक ही दल ने जीतीं?प्रायः नहीं — मतदाता राष्ट्रीय और राज्य के मुद्दों में अंतर करते हैं
नमूना लेखन (अपने वास्तविक आँकड़ों से बदलिए): “हमारे संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में विजेता को लगभग 41 प्रतिशत वैध मत मिले, अर्थात् पाँच में से लगभग तीन मतदाताओं ने किसी और को चुना था — फिर भी ‘जो सबसे आगे, वह जीता’ प्रणाली में यह जीतने के लिए पर्याप्त था। मतदान लगभग 63 प्रतिशत रहा, जो राष्ट्रीय औसत से कुछ कम है। उसी के भीतर आने वाले विधान सभा क्षेत्र में दूसरे दल ने जीत दर्ज की और जीत का अंतर 4,000 मतों से भी कम था।”
यह क्रियाकलाप अध्याय के अंत में क्यों है: आपने जो कुछ पढ़ा — सार्वभौमिक मताधिकार, भारत निर्वाचन आयोग, ‘जो सबसे आगे, वह जीता’, नोटा, आरक्षित सीटें, मतदान प्रतिशत — वह सब एक ही परिणाम पृष्ठ पर एक साथ दिखाई देता है। ऐसे एक पृष्ठ को ध्यान से पढ़ना यह समझने का सबसे तेज तरीका है कि ‘निर्वाचन प्रणाली’ कोई अमूर्त विचार नहीं, बल्कि आपके अपने पड़ोस के आँकड़ों का समूह है।
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