क्योंकि यही एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई सरकार ईमानदारी से यह दावा कर सकती है कि वह संपूर्ण जनता की ओर से बोलती है — और यही एकमात्र व्यवस्था है जिसमें जनता उसे हटा भी सकती है। अध्याय इसे “भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला” कहता है। कारण, और उनके साथ अध्याय के प्रमाण —
- यह नागरिकों को राजनीतिक रूप से समान बनाता है। जाति, मत, नस्ल, धर्म, लिंग, शिक्षा या आय का भेदभाव किए बिना प्रत्येक वयस्क को एक मत मिलता है और सभी मतों का मूल्य समान है। मतदान केंद्र के बाहर लोगों में धन और शक्ति का बड़ा अंतर होता है; भीतर नहीं। समानता का यही एक दिन निर्धनतम नागरिक को सबसे शक्तिशाली पर पकड़ देता है।
- यह प्रतिनिधियों को उत्तरदायी बनाता है। पृष्ठ 120 का मानस-मानचित्र कहता है — निर्वाचित प्रतिनिधि निर्वाचकों के प्रति उत्तरदायी हैं — और बाहर का गोला बताता है कैसे — “चुनाव में लोग इन्हें हरा सकते हैं।” जिस प्रतिनिधि का पद जा सकता है, उसे सुनते रहना पड़ता है।
- किसी समूह की उपेक्षा सुरक्षित नहीं रहती। जब प्रत्येक वयस्क मत देता है, तब निर्धनों, महिलाओं या किसी छोटे समुदाय की उपेक्षा करने वाला दल उनके मत खो देता है। सार्वभौमिक मताधिकार हर समुदाय को राजनीतिक गणना के भीतर ले आता है।
- यह लोगों को अपने भविष्य पर अधिकार देता है। लोग निश्चित करते हैं कि वे कैसा भविष्य चाहते हैं और उनका प्रतिनिधित्व उत्तम ढंग से कौन कर सकता है, तथा वे अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान में भाग लेते हैं।
- यह वैधता और शांति देता है। सब वयस्कों द्वारा चुनी गई सरकार को वे भी स्वीकार कर लेते हैं जिन्होंने उसके विरुद्ध मत दिया — इसलिए सत्ता बल से नहीं, मत गिनकर बदलती है।
- यह नागरिकता की पाठशाला है। मताधिकार नागरिक सहभागिता बढ़ाता है — समझदारी से मत देने के लिए व्यक्ति को यह जानना पड़ता है कि हो क्या रहा है और प्रत्याशी क्या कह रहे हैं।