अन्वेषण अध्याय 5 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार क्या है?
उत्तर

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अर्थ है — प्रत्येक वयस्क नागरिक को एक मत देने का अधिकार है और सभी मतों का समान मूल्य है। भारत में इसका अर्थ यह हुआ कि जाति, मत, नस्ल, धर्म, लिंग, शिक्षा, आय आदि का भेदभाव किए बिना 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक भारतीय नागरिक को मत देने का अधिकार है। ‘सार्वभौमिक’ शब्द का अर्थ यही है — किसी भी वयस्क समूह को बाहर नहीं रखा जाता।

तीनों शब्दों को अलग-अलग देखिए, क्योंकि हर शब्द कुछ काम कर रहा है —

शब्दयह किसे रोकता हैयह क्यों महत्वपूर्ण है
सार्वभौमिकजाति, मत, नस्ल, धर्म, लिंग, शिक्षा या आय के आधार पर कोई भी रोकएक निर्धन खेतिहर मजदूर और एक धनी प्राध्यापक — दोनों एक-एक मत देते हैं और दोनों मतों का मूल्य समान है
वयस्कबालकों को मताधिकारसंविधान 18 वर्ष की आयु को वह आयु मानता है जब नागरिक यह निर्णय ले सकता है; भारत ने 1988 में यह आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी
मताधिकारऐसी कृपा जिसे जब चाहे वापस ले लिया जाएमताधिकार संविधान या सरकार द्वारा प्रदान किया गया अधिकार है — यहाँ अनुच्छेद 326 द्वारा। अंग्रेजी में ‘सफ्रेज’ इसका पर्यायवाची है

इस अधिकार के साथ दो व्यावहारिक शर्तें भी हैं। पहली — मताधिकार का प्रयोग करने के लिए मतदाता का अपने निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत होना आवश्यक है। दूसरी — गंभीर अपराध में दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति को मतदान करने से रोका जाता है। और एक नियम इसकी रक्षा करता है — कोई भी व्यक्ति अन्य व्यक्ति की ओर से मतदान नहीं कर सकता।

इसे आधारशिला क्यों कहा जाता है: लोकसभा, प्रत्येक राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश की विधानसभा और गाँवों एवं शहरों में सभी स्थानीय चुनाव — ये सभी सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित हैं। अर्थात् यही सिद्धांत ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक चलता है। यदि किसी एक स्तर पर इसे हटा दिया जाए, तो वह स्तर जनता के प्रति उत्तरदायी रहना बंद कर देगा।
प्र2.
निर्वाचन प्रणाली क्या है?
उत्तर

निर्वाचन प्रणाली वह संपूर्ण व्यवस्था है जिसके द्वारा नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनते हैं — नियम, संस्थाएँ और उन्हें चलाने वाले लोग, जो मिलकर काम करते हैं। अध्याय की हाशिया-टिप्पणी प्रणाली को इस प्रकार परिभाषित करती है — “परस्पर जुड़े या परस्पर निर्भर तत्वों का एक समूह जो एक सामान्य उद्देश्य या कार्य को प्राप्त करने के लिए एक साथ काम करते हैं।” निर्वाचन प्रणाली ठीक यही है, और उसका सामान्य उद्देश्य है — स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव

अध्याय पढ़कर इसके अंग गिनाए जा सकते हैं —

  • नियम — सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326), गुप्त मतदान, ‘जो सबसे आगे, वह जीता’ के आधार पर गणना, सीटों का आरक्षण, आदर्श आचार संहिता।
  • संस्थाएँ — भारत निर्वाचन आयोग, तथा स्थानीय निकायों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग।
  • धरातल का तंत्र — मतदाता सूची, निर्वाचन क्षेत्र, मतदान केंद्र, मतदान अधिकारी, ई.वी.एम. और वी.वी.पी.ए.टी., अमिट स्याही, मतगणना कक्ष।
  • भागीदार — मतदाता, प्रत्याशी और राजनैतिक दल, जो सब एक ही नियमों से बँधे हैं।
इसे केवल नियमों का समूह न कहकर ‘प्रणाली’ क्यों कहते हैं: क्योंकि इसके अंग एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पूर्ण मतदाता सूची तब व्यर्थ है जब मतदान केंद्र तक पहुँचा ही न जा सके; गुप्त मतदान तब व्यर्थ है जब प्रत्याशी मत खरीद सके; ईमानदार मतगणना तब व्यर्थ है जब सत्ता में बैठा दल सरकारी संसाधनों से मतदाताओं को प्रभावित कर ले। कोई एक अंग हटा दीजिए, शेष अंग अकेले निष्पक्ष परिणाम नहीं दे पाएँगे — इसीलिए अध्याय कहता है कि भारत को “एक व्यापक और सुव्यवस्थित प्रणाली” चाहिए।
प्र3.
भारत की निर्वाचन प्रणाली कैसे कार्य करती है?
उत्तर

यह तीन स्तरों पर कार्य करती है, और प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष चुनावों में अलग-अलग ढंग से। पूरा अध्याय एक साथ इस प्रकार देखा जा सकता है —

1. इसे कौन चलाता है। भारत निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) — एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय, जिसकी स्थापना 1950 में हुई। इसकी संरचना राष्ट्रीय स्तर से मतदान केंद्र तक उतरती है —

भारत निर्वाचन आयोग राष्ट्रीय स्तर पर राज्य/संघ शासित स्तर पर जिला स्तर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त दो निर्वाचन आयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी जिला निर्वाचन अधिकारी निर्वाचन अधिकारी (रिटर्निंग) चुनाव का संचालन निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी — मतदाता सूची स्थानीय निकायों के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराते हैं।
भारत निर्वाचन आयोग की संरचना, जैसी पृष्ठ 127 पर चित्र 5.11 में छपी है।

2. प्रत्यक्ष चुनाव — लोकसभा और राज्य विधान सभाएँ। लोकसभा निर्वाचन के लिए देश को 543 निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक पंजीकृत मतदाता एक गुप्त मत देता है; भारत ‘जो सबसे आगे, वह जीता’ प्रणाली का उपयोग करता है, इसलिए सर्वाधिक मत पाने वाला प्रत्याशी 50 प्रतिशत मत के बिना भी जीत जाता है। विजेता सांसद (लोकसभा) और विधायक (विधान सभा) कहलाते हैं। बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन सरकार बनाता है और उसका नेता प्रधानमंत्री — राज्य में मुख्यमंत्री — बनता है।

3. मतदान के दिन मतदाता चार चरणों से गुजरता है — प्रथम मतदान अधिकारी मतदाता सूची में नाम और पहचान-पत्र की जाँच करता है; द्वितीय अंगुली पर स्याही लगाकर पर्ची देता है और हस्ताक्षर लेता है; तृतीय पर्ची लेकर अंगुली की जाँच करता है (नोटा का विकल्प भी उपलब्ध रहता है); फिर मतदाता ई.वी.एम. पर बटन दबाता है, एक बीप की ध्वनि सुनता है और वी.वी.पी.ए.टी. में छपी पर्ची देखता है।

4. अप्रत्यक्ष चुनाव। राज्यसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव आम जनता प्रत्यक्ष रूप से नहीं करती। राज्यसभा के 245 सदस्यों में से 233 को निर्वाचित विधायक चुनते हैं और 12 को राष्ट्रपति नामित करते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों तथा राज्यों एवं दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के सदस्यों के निर्वाचक मंडल द्वारा होता है। इन सबमें एकल संक्रमणीय मत प्रणाली का उपयोग किया जाता है।

स्वयं जाँचिए: अध्याय का अपना उदाहरण — 2024 में लगभग 96.8 करोड़ मतदाता, 543 निर्वाचन क्षेत्र और 10 लाख से अधिक मतदान केंद्र — यही वह पैमाना है जो प्रणाली को इतने स्तरों में बाँटने के लिए विवश करता है। एक अधिकारी दस लाख केंद्रों की देख-रेख नहीं कर सकता; मुख्य निर्वाचन आयुक्त से निर्वाचन अधिकारी तक की श्रृंखला कर सकती है।
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