अन्वेषण अध्याय 6 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आर.टी.ई. किस प्रकार एक अधिनियम बना, यह प्रक्रिया दर्शाने के लिए एक छोटा-सा चार्ट बनाएँ।
उत्तर

यह रहा चार्ट, जो पृष्ठ 146 पर आर.टी.ई. के अपने कथन और पृष्ठ 147 के चित्र 6.8 की सामान्य प्रक्रिया से बनाया गया है।

राज्य के नीति-निदेशक तत्व — हर बच्चे को शिक्षा का विचार 1990 के दशक के आरंभ में न्यायालय में तर्क : शिक्षा जीवन के अधिकार का अंग 86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 → अनुच्छेद 21(क) राज्यसभा में विधेयक के रूप में प्रस्तुत (2008) समिति ने गहन अध्ययन कर संशोधन सुझाए मुख्य चर्चा : वित्तपोषण — विद्यालय, शिक्षक, व्यय 2008 तक सांसदों ने तय किया कि समय आ गया है अगस्त 2009 में लोकसभा में पारित राष्ट्रपति की स्वीकृति — अधिनियम बना परिणाम : विद्यालय में प्रवेश के विधिक मार्ग, नए विद्यालयों का निर्माण, निःशुल्क पुस्तकें और गणवेश — बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009।
आर.टी.ई. की यात्रा — नीति-निदेशक तत्वों के एक विचार से संसद के अधिनियम तक; अध्याय के अनुसार यह यात्रा लगभग एक सदी लंबी है।
चरणक्या हुआचित्र 6.8 का कौन-सा चरण
1यह विचार राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों में निहित था; संविधान निर्माता चाहते थे कि स्वतंत्रता के एक दशक के भीतर इसे लागू कर दिया जाए, किंतु ऐसा नहीं हो सकाविधेयक से पहले — नीतिगत पृष्ठभूमि
21990 के दशक के आरंभ में न्यायालय में तर्क दिया गया कि शिक्षा पहले से ही मौलिक अधिकार ‘जीवन के अधिकार’ का अंग है, क्योंकि सार्थक जीवन के लिए शिक्षा आवश्यक हैन्यायपालिका की ओर से विधायिका को संकेत
386वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 ने अनुच्छेद 21(क) जोड़ा — राज्य 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगासंसद का संवैधानिक कार्य
4छह वर्ष बाद विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत किया गयाकिसी भी सदन में प्रस्तुतीकरण
5एक समिति ने गहन अध्ययन कर संशोधन सुझाएस्थायी समिति को प्रेषण
6मुख्य चर्चा वित्तपोषण पर थी — लाखों बच्चों के लिए नए विद्यालय, आधारभूत ढाँचा और शिक्षक महँगे थे। किंतु 2008 तक सांसदों ने निश्चय कर लिया कि समय आ गया हैविचार, खंड-दर-खंड चर्चा, संशोधनों पर मतदान
72009 के चुनावों के बाद नई सरकार ने विषय आगे बढ़ाया; अगस्त 2009 में यह लोकसभा में पारित हुआदूसरे सदन में प्रक्रिया का दोहराव
8राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह अधिनियम बन गयाराष्ट्रपति की स्वीकृति (फिर राजपत्र अधिसूचना)
सुझाव: अपनी कॉपी में यह चार्ट बनाते समय बाईं ओर हाशिये में वर्ष लिखिए — 2002, 2008, 2009। इनके बीच का अंतराल ही असली बात है : जिस विधेयक से सिद्धांत रूप में सब सहमत थे, उसे भी अनुच्छेद 21(क) से अधिनियम तक पहुँचने में सात वर्ष लगे।
प्र2.
यदि आर.टी.ई. लोकसभा में प्रस्तुत किया गया होता तो आपके विचार से उसकी प्रकिया कैसी होती?
उत्तर

प्रक्रिया लगभग वही रहती — केवल दोनों सदनों का क्रम बदल जाता। चित्र 6.8 का पहला चरण ही है “संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुतीकरण”, इसलिए आर.टी.ई. जैसा साधारण विधेयक विधिक रूप से किसी भी सदन में आरंभ हो सकता था।

चरणवास्तव में जो हुआयदि लोकसभा में प्रस्तुत होता
प्रस्तुतीकरणराज्यसभालोकसभा
वाचन और समितिवाचन, फिर समिति को प्रेषण जिसने संशोधन सुझाएबिलकुल वही — वाचन, फिर समिति को प्रेषण
चर्चा और मतदानखंड-दर-खंड चर्चा, संशोधनों पर मतदान, फिर विधेयक पर मतदानबिलकुल वही
दूसरा सदनलोकसभा में प्रक्रिया दोहराई गई, जिसने अगस्त 2009 में इसे पारित कियाराज्यसभा में प्रक्रिया दोहराई जाती
स्वीकृति और अधिसूचनाराष्ट्रपति की स्वीकृति, फिर राजपत्र अधिसूचनाबिलकुल वही
दूसरे सदन में जाना क्यों अनिवार्य है: विधेयक अधिनियम तभी बनता है जब दोनों सदन उसे एक ही रूप में पारित कर दें। द्विसदनीय विधायिका का यही उद्देश्य है — राज्यों की परिषद पूरे देश के लिए बनने वाले कानून को देखे, और जनता का सदन उस विधेयक को देखे जिसे परिषद ने आरंभ किया हो। लोकसभा में आरंभ होने से विधेयक राज्यसभा को छोड़ नहीं सकता था।
क्या आप जानते हैं? एक प्रकार का विधेयक ऐसा है जिसमें सदन का चुनाव वास्तव में मायने रखता है : धन विधेयक, जो वित्तीय मामलों (कर निर्धारण, सरकारी ऋण आदि) से संबंधित होता है, केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है — और उसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा भी आवश्यक है। आर.टी.ई. धन विधेयक नहीं था, यद्यपि उस पर सबसे बड़ी बहस धन को लेकर ही हुई।
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