आर.टी.ई. किस प्रकार एक अधिनियम बना, यह प्रक्रिया दर्शाने के लिए एक छोटा-सा चार्ट बनाएँ।
उत्तर
यह रहा चार्ट, जो पृष्ठ 146 पर आर.टी.ई. के अपने कथन और पृष्ठ 147 के चित्र 6.8 की सामान्य प्रक्रिया से बनाया गया है।
आर.टी.ई. की यात्रा — नीति-निदेशक तत्वों के एक विचार से संसद के अधिनियम तक; अध्याय के अनुसार यह यात्रा लगभग एक सदी लंबी है।
चरण
क्या हुआ
चित्र 6.8 का कौन-सा चरण
1
यह विचार राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों में निहित था; संविधान निर्माता चाहते थे कि स्वतंत्रता के एक दशक के भीतर इसे लागू कर दिया जाए, किंतु ऐसा नहीं हो सका
विधेयक से पहले — नीतिगत पृष्ठभूमि
2
1990 के दशक के आरंभ में न्यायालय में तर्क दिया गया कि शिक्षा पहले से ही मौलिक अधिकार ‘जीवन के अधिकार’ का अंग है, क्योंकि सार्थक जीवन के लिए शिक्षा आवश्यक है
न्यायपालिका की ओर से विधायिका को संकेत
3
86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 ने अनुच्छेद 21(क) जोड़ा — राज्य 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा
संसद का संवैधानिक कार्य
4
छह वर्ष बाद विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया
किसी भी सदन में प्रस्तुतीकरण
5
एक समिति ने गहन अध्ययन कर संशोधन सुझाए
स्थायी समिति को प्रेषण
6
मुख्य चर्चा वित्तपोषण पर थी — लाखों बच्चों के लिए नए विद्यालय, आधारभूत ढाँचा और शिक्षक महँगे थे। किंतु 2008 तक सांसदों ने निश्चय कर लिया कि समय आ गया है
विचार, खंड-दर-खंड चर्चा, संशोधनों पर मतदान
7
2009 के चुनावों के बाद नई सरकार ने विषय आगे बढ़ाया; अगस्त 2009 में यह लोकसभा में पारित हुआ
दूसरे सदन में प्रक्रिया का दोहराव
8
राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह अधिनियम बन गया
राष्ट्रपति की स्वीकृति (फिर राजपत्र अधिसूचना)
सुझाव: अपनी कॉपी में यह चार्ट बनाते समय बाईं ओर हाशिये में वर्ष लिखिए — 2002, 2008, 2009। इनके बीच का अंतराल ही असली बात है : जिस विधेयक से सिद्धांत रूप में सब सहमत थे, उसे भी अनुच्छेद 21(क) से अधिनियम तक पहुँचने में सात वर्ष लगे।
प्र2.
यदि आर.टी.ई. लोकसभा में प्रस्तुत किया गया होता तो आपके विचार से उसकी प्रकिया कैसी होती?
उत्तर
प्रक्रिया लगभग वही रहती — केवल दोनों सदनों का क्रम बदल जाता। चित्र 6.8 का पहला चरण ही है “संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुतीकरण”, इसलिए आर.टी.ई. जैसा साधारण विधेयक विधिक रूप से किसी भी सदन में आरंभ हो सकता था।
चरण
वास्तव में जो हुआ
यदि लोकसभा में प्रस्तुत होता
प्रस्तुतीकरण
राज्यसभा
लोकसभा
वाचन और समिति
वाचन, फिर समिति को प्रेषण जिसने संशोधन सुझाए
बिलकुल वही — वाचन, फिर समिति को प्रेषण
चर्चा और मतदान
खंड-दर-खंड चर्चा, संशोधनों पर मतदान, फिर विधेयक पर मतदान
बिलकुल वही
दूसरा सदन
लोकसभा में प्रक्रिया दोहराई गई, जिसने अगस्त 2009 में इसे पारित किया
राज्यसभा में प्रक्रिया दोहराई जाती
स्वीकृति और अधिसूचना
राष्ट्रपति की स्वीकृति, फिर राजपत्र अधिसूचना
बिलकुल वही
दूसरे सदन में जाना क्यों अनिवार्य है: विधेयक अधिनियम तभी बनता है जब दोनों सदन उसे एक ही रूप में पारित कर दें। द्विसदनीय विधायिका का यही उद्देश्य है — राज्यों की परिषद पूरे देश के लिए बनने वाले कानून को देखे, और जनता का सदन उस विधेयक को देखे जिसे परिषद ने आरंभ किया हो। लोकसभा में आरंभ होने से विधेयक राज्यसभा को छोड़ नहीं सकता था।
क्या आप जानते हैं? एक प्रकार का विधेयक ऐसा है जिसमें सदन का चुनाव वास्तव में मायने रखता है : धन विधेयक, जो वित्तीय मामलों (कर निर्धारण, सरकारी ऋण आदि) से संबंधित होता है, केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है — और उसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा भी आवश्यक है। आर.टी.ई. धन विधेयक नहीं था, यद्यपि उस पर सबसे बड़ी बहस धन को लेकर ही हुई।
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