दीपकम् अध्याय 1 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति।
उत्तर

कः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति ? (हिन्दी — सर्वत्र कौन व्याप्त है ?)

कैसे बना: रेखाङ्कित पद परमेश्वरः पुंल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन है और वाक्य का कर्ता है। कर्ता (प्राणिवाचक, पुंल्लिङ्ग, प्रथमा एकवचन) के लिए प्रश्नवाचक शब्द कः होता है — इसलिए ‘परमेश्वरः’ के स्थान पर ‘कः’ रखकर वाक्य वैसा ही रहने दिया।
प्र2.
वयम् ईश्वरं नमामः।
उत्तर

वयं कं नमामः ? (हिन्दी — हम किसको नमन करते हैं ?)

कैसे बना: ईश्वरम् यहाँ कर्म है — पुंल्लिङ्ग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन। पुंल्लिङ्ग द्वितीया एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कम् है, अतः ‘ईश्वरं’ के स्थान पर ‘कं’ आया।
ध्यान दें: ‘नम्’ धातु के साथ प्रायः चतुर्थी भी आती है (नमः शिवाय), किन्तु इस वाक्य में ‘नमामः’ के साथ द्वितीया प्रयुक्त है — इसलिए प्रश्न भी द्वितीया में ‘कं’ ही बनेगा।
प्र3.
वयम् ऐक्यभावेन जीवामः।
उत्तर

वयं केन भावेन जीवामः ? (हिन्दी — हम किस भाव से जीते हैं ?)

अथवा — वयं कथं जीवामः ? (हम कैसे जीते हैं ?)

कैसे बना: ऐक्यभावेन पुंल्लिङ्ग, तृतीया विभक्ति, एकवचन है और यहाँ ‘जीने का ढंग’ बताता है। तृतीया एकवचन का प्रश्नवाचक रूप केन है, इसलिए ‘केन भावेन’। ढंग पूछने के लिए अव्यय ‘कथम्’ भी चलता है — दोनों उत्तर मान्य हैं, किन्तु रेखाङ्कित पद की विभक्ति सुरक्षित रखने वाला उत्तर ‘केन भावेन’ अधिक ठीक है।
प्र4.
ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते।
उत्तर

कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते ? (हिन्दी — किसकी प्रार्थना से शान्ति प्राप्त होती है ?)

कैसे बना: ईश्वरस्य पुंल्लिङ्ग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन है (सम्बन्ध बताता है — किसकी प्रार्थना)। षष्ठी एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्य है।
सावधानी: इस वाक्य में ‘प्रार्थनया’ (तृतीया) भी है, पर रेखा ‘ईश्वरस्य’ के नीचे है — इसलिए प्रश्न ‘कया’ नहीं, ‘कस्य’ बनेगा। रेखाङ्कित पद ही प्रश्न का लक्ष्य होता है।
प्र5.
अहं समाजाय श्रमं करोमि।
उत्तर

अहं कस्मै श्रमं करोमि ? (हिन्दी — मैं किसके लिए परिश्रम करता/करती हूँ ?)

कैसे बना: समाजाय पुंल्लिङ्ग, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन है और ‘प्रयोजन’ (किसके लिए) बताता है। चतुर्थी एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्मै है।
Tip: चतुर्थी का चिह्न ‘के लिए’ है — जहाँ हिन्दी में ‘के लिए’ आए, वहाँ संस्कृत में चतुर्थी और प्रश्न में ‘कस्मै’ समझें।
प्र6.
अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः।
उत्तर

अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः ? (हिन्दी — यह पाठ किससे संकलित है ?)

कैसे बना: ऋग्वेदात् पुंल्लिङ्ग, पञ्चमी विभक्ति, एकवचन है — यह ‘अपादान’ है, अर्थात् जहाँ से पाठ लिया गया। पञ्चमी एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्मात् है।
जोड़कर देखिए: चित्र-संवाद में छात्र ने भी यही रूप पूछा था — “कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्देशः ?” — वही विभक्ति यहाँ अभ्यास में लौटी है।
प्र7.
वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः।
उत्तर

कस्य अपरं नाम श्रुतिः ? (हिन्दी — किसका दूसरा नाम श्रुति है ?)

कैसे बना: वेदस्य पुंल्लिङ्ग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन है, इसलिए प्रश्नवाचक रूप कस्य
Did you know? वेद को ‘श्रुति’ इसलिए कहते हैं क्योंकि वह गुरु-मुख से सुनकर ही शिष्य-परम्परा में सुरक्षित रहा — लिखकर नहीं, सुनकर। इसी कारण उसका पाठ सस्वर और शुद्ध उच्चारण के साथ करना आवश्यक माना गया।
प्र8.
मन्त्राः वेदेषु भवन्ति।
उत्तर

मन्त्राः केषु भवन्ति ? (हिन्दी — मन्त्र किनमें होते हैं ?)

अथवा — मन्त्राः कुत्र भवन्ति ? (मन्त्र कहाँ होते हैं ?)

कैसे बना: वेदेषु पुंल्लिङ्ग, सप्तमी विभक्ति, बहुवचन है (अधिकरण — ‘में’)। सप्तमी बहुवचन का प्रश्नवाचक रूप केषु है। स्थान पूछने के लिए अव्यय ‘कुत्र’ भी लिख सकते हैं, पर विभक्ति और वचन दोनों बनाए रखने वाला उत्तर ‘केषु’ ही श्रेष्ठ है।
अभ्यास का सार: प्रश्ननिर्माण का नियम एक ही है — रेखाङ्कित पद की विभक्ति, लिङ्ग और वचन देखो, फिर ‘किम्’ शब्द का उसी विभक्ति-लिङ्ग-वचन वाला रूप रखो; शेष वाक्य ज्यों का त्यों रहेगा और अन्त में ‘?’ लगेगा।
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