प्र1.
सङ्गच्छध्वं ………… सं वो ………… जानताम्। देवा ………… यथा पूर्वे सं………… उपासते। [पट्टिका — संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहासति, मनांसि]
उत्तर
पूर्ण मन्त्रः —
सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
| रिक्तस्थानम् | पूरितं पदम् | अर्थः |
|---|---|---|
| प्रथमम् | संवदध्वं | एकस्वरेण वदत — एक स्वर में बोलो |
| द्वितीयम् | मनांसि | चित्तानि — मन (नपुंसकलिङ्ग, बहुवचन) |
| तृतीयम् | भागं | स्वं स्वं कर्तव्यम् — अपना हिस्सा |
| चतुर्थम् | जानाना | ‘सं’ + जानाना = संजानानाः — एकमत होकर |
कैसे पहचानें: ‘सङ्गच्छध्वं’ के बाद वही रूप चाहिए जो उसी लय और उसी लोट्-आत्मनेपद रूप में हो — इसीलिए संवदध्वं। ‘सं वो …… जानताम्’ में क्रिया ‘जानताम्’ बहुवचन है, अतः कर्म भी बहुवचन मनांसि ही होगा, ‘मनः’ नहीं। अन्तिम रिक्तस्थान से पहले ‘सं’ छपा है, इसलिए वहाँ केवल जानाना बैठेगा — ‘संजानाना’ पूरा नहीं।