दीपकम् अध्याय 1 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सङ्गच्छध्वं ………… सं वो ………… जानताम्। देवा ………… यथा पूर्वे सं………… उपासते। [पट्टिका — संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहासति, मनांसि]
उत्तर

पूर्ण मन्त्रः —

सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
रिक्तस्थानम्पूरितं पदम्अर्थः
प्रथमम्संवदध्वंएकस्वरेण वदत — एक स्वर में बोलो
द्वितीयम्मनांसिचित्तानि — मन (नपुंसकलिङ्ग, बहुवचन)
तृतीयम्भागंस्वं स्वं कर्तव्यम् — अपना हिस्सा
चतुर्थम्जानाना‘सं’ + जानाना = संजानानाः — एकमत होकर
कैसे पहचानें: ‘सङ्गच्छध्वं’ के बाद वही रूप चाहिए जो उसी लय और उसी लोट्-आत्मनेपद रूप में हो — इसीलिए संवदध्वं। ‘सं वो …… जानताम्’ में क्रिया ‘जानताम्’ बहुवचन है, अतः कर्म भी बहुवचन मनांसि ही होगा, ‘मनः’ नहीं। अन्तिम रिक्तस्थान से पहले ‘सं’ छपा है, इसलिए वहाँ केवल जानाना बैठेगा — ‘संजानाना’ पूरा नहीं।
प्र2.
समानो मन्त्रः ………… समानी समानं ………… सह चित्तमेषाम्। ………… मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो ………… जुहोमि।
उत्तर

पूर्ण मन्त्रः —

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥
रिक्तस्थानम्पूरितं पदम्अर्थः
प्रथमम्समितिःसमाना प्राप्तिः / लक्ष्यसिद्धिः
द्वितीयम्मनःचित्तम् — मन
तृतीयम्समानंएकरूपम् — समान (यहाँ ‘मन्त्रम्’ का विशेषण)
चतुर्थम्हविषाप्रार्थनापूर्वकेण समर्पणेन
कैसे पहचानें: ‘समानी’ स्त्रीलिङ्ग विशेषण है, इसलिए उसके साथ स्त्रीलिङ्ग संज्ञा समितिः ही आएगी। ‘समानं …… सह चित्तम्’ में ‘समानं’ नपुंसकलिङ्ग है, अतः मनः (नपुंसकलिङ्ग एकवचन)। ‘…… मन्त्रम् अभिमन्त्रये’ में मन्त्रम् द्वितीया एकवचन है, इसलिए उसका विशेषण भी द्वितीया एकवचन समानम् (समानं)। अन्त में ‘जुहोमि’ (हवन करता हूँ) के साथ करण में हविषा ही बैठेगा।
प्र3.
समानी व ………… समाना ………… वः। समानमस्तु वो ………… यथा वः …………।
उत्तर

पूर्ण मन्त्रः —

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥
रिक्तस्थानम्पूरितं पदम्अर्थः
प्रथमम्आकूतिःसङ्कल्पः — संकल्प (स्त्रीलिङ्ग)
द्वितीयम्हृदयानिअन्तःकरणानि — हृदय (नपुंसकलिङ्ग बहुवचन)
तृतीयम्मनोमनः (सन्धि से ‘मनो’) — मन
चतुर्थम्सुसहासतिसुसंघटितः भवेत् — भली-भाँति संगठित हो
कैसे पहचानें: ‘समानी’ स्त्रीलिङ्ग है → आकूतिः (स्त्रीलिङ्ग)। ‘समाना’ के साथ नपुंसकलिङ्ग बहुवचन → हृदयानि। ‘समानम् अस्तु वो ……’ में ‘समानम्’ नपुंसकलिङ्ग एकवचन है, अतः मनः; किन्तु आगे ‘यथा’ का ‘य’ आने से विसर्ग-सन्धि होकर वह ‘मनो’ लिखा जाता है — पट्टिका में यही रूप दिया गया है। अन्तिम स्थान पर क्रिया चाहिए, इसलिए सुसहासति
Check it yourself: पट्टिका में १२ शब्द थे और रिक्तस्थान भी १२ ही हैं — यदि आपने सही भरा है, तो पट्टिका का कोई शब्द बचना नहीं चाहिए और कोई दुबारा नहीं आना चाहिए।
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