प्र1.
पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत — (क) संगच्छध्वम् (ख) संवदध्वम् (ग) मनः (घ) उपासते (ङ) वसूनि (च) विश्वानि (छ) आकूतिः | [सेवन्ते, चित्तम्, मिलित्वा चलत, सङ्कल्पः, समस्तानि, एकस्वरेण वदत, धनानि]
उत्तर
शुद्धं मेलनम् —
| क्रमः | शब्दः | भावानुसारि पदम् | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|
| (क) | संगच्छध्वम् | मिलित्वा चलत | मिलकर चलो |
| (ख) | संवदध्वम् | एकस्वरेण वदत | एक स्वर में बोलो |
| (ग) | मनः | चित्तम् | मन, अन्तःकरण |
| (घ) | उपासते | सेवन्ते | श्रद्धापूर्वक कर्तव्य निभाते हैं |
| (ङ) | वसूनि | धनानि | धन, सम्पत्तियाँ |
| (च) | विश्वानि | समस्तानि | सारे, सब |
| (छ) | आकूतिः | सङ्कल्पः | संकल्प, इरादा |
मिलान का तर्क: तीन जोड़े लोट्-लकार की क्रियाएँ हैं — ‘संगच्छध्वम्’ और ‘मिलित्वा चलत’, ‘संवदध्वम्’ और ‘एकस्वरेण वदत’, ‘उपासते’ और ‘सेवन्ते’ (दोनों आत्मनेपद, प्रथमपुरुष बहुवचन)। शेष चार संज्ञाएँ हैं और लिङ्ग-वचन से पहचानी जाती हैं — ‘मनः’ तथा ‘चित्तम्’ दोनों नपुंसकलिङ्ग एकवचन; ‘वसूनि’ तथा ‘धनानि’ दोनों नपुंसकलिङ्ग बहुवचन; ‘विश्वानि’ तथा ‘समस्तानि’ दोनों नपुंसकलिङ्ग बहुवचन विशेषण; ‘आकूतिः’ तथा ‘सङ्कल्पः’ दोनों का अर्थ एक — इरादा।
ध्यान दें: ‘वसूनि’ तथा ‘विश्वानि’ पाठ में छपे तीन मन्त्रों में नहीं आते; ये संज्ञान-सूक्त (ऋ. १०.१९१) के प्रथम मन्त्र — “संसमिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ। इळस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर॥” — के शब्द हैं, जो सूक्त का ही अंश है। अर्थ याद रखें : वसूनि = धनानि, विश्वानि = समस्तानि।