प्र1.
संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लिखत च।
उत्तर
यह वाचन-कण्ठस्थीकरण का अभ्यास है — तीनों मन्त्रों को सस्वर (स्वर सहित) पढ़ना, याद करना और शुद्ध लिखना है। नीचे तीनों मन्त्र दिए हैं; इन्हें ही दोहराएँ।
ॐ
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥
सस्वर पाठ कैसे करें —
- पहले पूरा मन्त्र पद-पद करके शुद्ध बोलें : सं-गच्छ-ध्वम् / सं-वद-ध्वम् / सं वो म-नां-सि जा-न-ताम्।
- फिर पूरी पंक्ति एक साँस में, समवेतस्वरेण (सब मिलकर एक स्वर में) बोलें — मन्त्रों का यही ढंग पाठ में बताया गया है।
- प्रत्येक पंक्ति के अन्त में ‘।’ पर थोड़ा रुकें, ‘॥’ पर पूरा रुकें।
- लिखते समय ध्यान रखें — मनांसि (अनुस्वार), संजानाना, चित्तमेषाम्, सुसहासति — ये चार शब्द सबसे अधिक अशुद्ध लिखे जाते हैं।
कण्ठस्थ करने की युक्ति: तीनों मन्त्रों में ‘सम्/समान’ बार-बार लौटता है — संगच्छध्वं, संवदध्वं, समानो मन्त्रः, समानी समितिः, समानी आकूतिः, समानम् अस्तु। इसी शब्द को सूत्र मानकर याद करें, पूरा सूक्त जल्दी बैठ जाएगा।