देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥
पदच्छेदः — संगच्छध्वम् + संवदध्वम् + सम् + वः + मनांसि + जानताम् + देवाः + भागम् + यथा + पूर्वे + संजानानाः + उपासते।
अन्वयः — (यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं, वः मनांसि संजानताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते।
अर्थः (हिन्दी) — (हे मनुष्यो!) तुम मिलकर चलो, एक स्वर में बोलो, तुम्हारे मन एक-दूसरे को भली-भाँति जानें — ठीक वैसे ही, जैसे सृष्टि के आरम्भ में देवगण अपना-अपना भाग (कर्तव्य) स्वीकार कर, परस्पर एकमत होकर अपने कर्म का निर्वाह करते थे।
| पदम् | अर्थः |
|---|---|
| संगच्छध्वम् | मिलित्वा गच्छत — मिलकर आगे बढ़ो (लोट्, मध्यमपुरुष, बहुवचन, आत्मनेपद) |
| संवदध्वम् | एकस्वरेण वदत — एक स्वर में बोलो |
| वः मनांसि | युष्माकं चित्तानि — तुम्हारे मन |
| जानताम् | जानन्तु — जानें, परिचित हों |
| देवाः | ब्रह्माण्डीय-शक्तयः — अग्नि, वायु, आदित्य आदि |
| भागम् | स्वं स्वं कर्तव्यम् — अपना-अपना हिस्सा |
| संजानानाः | एकमनसः भूत्वा — एक विचार वाले होकर |
| उपासते | सेवन्ते — श्रद्धापूर्वक कर्तव्य निभाते हैं |