दीपकम् अध्याय 1 मन्त्राणां भावार्थं जानीमः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
प्रथमस्य मन्त्रस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत — “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥”
उत्तर
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १॥

पदच्छेदः — संगच्छध्वम् + संवदध्वम् + सम् + वः + मनांसि + जानताम् + देवाः + भागम् + यथा + पूर्वे + संजानानाः + उपासते।

अन्वयः — (यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं, वः मनांसि संजानताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते।

अर्थः (हिन्दी) — (हे मनुष्यो!) तुम मिलकर चलो, एक स्वर में बोलो, तुम्हारे मन एक-दूसरे को भली-भाँति जानें — ठीक वैसे ही, जैसे सृष्टि के आरम्भ में देवगण अपना-अपना भाग (कर्तव्य) स्वीकार कर, परस्पर एकमत होकर अपने कर्म का निर्वाह करते थे।

पदम्अर्थः
संगच्छध्वम्मिलित्वा गच्छत — मिलकर आगे बढ़ो (लोट्, मध्यमपुरुष, बहुवचन, आत्मनेपद)
संवदध्वम्एकस्वरेण वदत — एक स्वर में बोलो
वः मनांसियुष्माकं चित्तानि — तुम्हारे मन
जानताम्जानन्तु — जानें, परिचित हों
देवाःब्रह्माण्डीय-शक्तयः — अग्नि, वायु, आदित्य आदि
भागम्स्वं स्वं कर्तव्यम् — अपना-अपना हिस्सा
संजानानाःएकमनसः भूत्वा — एक विचार वाले होकर
उपासतेसेवन्ते — श्रद्धापूर्वक कर्तव्य निभाते हैं
भावः: मन्त्र तीन क्रम में एकता माँगता है — पहले चरण मिलें (संगच्छध्वम्), फिर वाणी मिले (संवदध्वम्), और अन्त में मन मिलें (मनांसि जानताम्)। साथ चलना सबसे सरल है, मन का मिलना सबसे कठिन — इसीलिए वह अन्त में रखा गया है। उदाहरण सृष्टि से लिया गया है : अग्नि, वायु और सूर्य आपस में झगड़ते नहीं, प्रत्येक अपना भाग चुपचाप निभाता है, इसीलिए सृष्टि-यज्ञ चलता रहता है। मनुष्य भी परिवार, वर्ग, समाज तथा राष्ट्र में इसी समन्वय से चले, तो अभ्युदय निश्चित है।
ध्यान दें: ‘संगच्छध्वम्’ में गम्-धातु के साथ ‘सम्’ उपसर्ग है, इसलिए रूप आत्मनेपद में बना — यही बात पृष्ठ ६ के ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में समझाई गई है।
प्र2.
द्वितीयस्य मन्त्रस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत — “समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥”
उत्तर
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २॥

पदच्छेदः — समानः + मन्त्रः + समितिः + समानी + समानम् + मनः + सह + चित्तम् + एषाम् + समानम् + मन्त्रम् + अभिमन्त्रये + वः + समानेन + वः + हविषा + जुहोमि।

अन्वयः — एषां मन्त्रः समानः, समितिः समानी, मनः समानं, चित्तं सह (अस्तु)। वः समानं मन्त्रम् अभिमन्त्रये, वः समानेन हविषा जुहोमि।

अर्थः (हिन्दी) — एक ही कर्म में साथ लगे हुए इन लोगों का चिन्तन समान हो, इनकी लक्ष्यसिद्धि समान हो, मन समान हो और बुद्धि से उपजा ज्ञान भी एक हो जाए। हे मनुष्यो! तुम्हारे उस समान सङ्कल्प को मैं दिव्यभाव से जोड़कर प्रकट करता हूँ, और तुम्हारी सामूहिक प्रार्थना रूपी हवि से ज्ञानयज्ञ सम्पन्न करता हूँ।

पदम्अर्थः
मन्त्रःविचारः, चिन्तनम् — सोच
समितिःसमाना प्राप्तिः, लक्ष्यसिद्धिः — समान सिद्धि
चित्तम्बुद्धिजन्यं ज्ञानम् — बुद्धि से बना ज्ञान
अभिमन्त्रयेसंस्कृत्य प्रचारयामि — अभिमन्त्रित कर प्रचारित करता हूँ
हविषाप्रार्थनापूर्वकेण समर्पणेन — प्रार्थनारूपी आहुति से
जुहोमिज्ञानकर्ममयं यज्ञं साधयामि — ज्ञानयज्ञ सम्पन्न करता हूँ
भावः: पहला मन्त्र करने की एकता माँगता है, दूसरा सोचने की। जिस समूह के लोगों का चिन्तन अलग-अलग हो, वह साथ चलकर भी एक दिशा में नहीं जाता। इसीलिए ऋषि चार वस्तुओं को समान करना चाहता है — मन्त्र (सोच), समिति (लक्ष्य), मनः (भावना) और चित्त (ज्ञान)। अन्तिम दो पंक्तियाँ बताती हैं कि ऋषि और महात्मा ऐसे सङ्कल्प को केवल कहते नहीं, उसे दिव्यभाव से जोड़कर समाज में फैलाते हैं और उसकी सफलता के लिए प्रार्थना करते हैं।
ध्यान दें: यहाँ ‘हविषा’ का अर्थ घी या सामग्री नहीं, प्रार्थनारूपी समर्पण है और ‘जुहोमि’ का अर्थ अग्नि में आहुति देना नहीं, ज्ञानयज्ञ करना है — पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका यही अर्थ देती है।
प्र3.
तृतीयस्य मन्त्रस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत — “समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥”
उत्तर
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३॥

पदच्छेदः — समानी + वः + आकूतिः + समाना + हृदयानि + वः + समानम् + अस्तु + वः + मनः + यथा + वः + सु + सह + असति।

अन्वयः — (हे मानवाः!) वः आकूतिः समानी (अस्तु)। वः हृदयानि समाना (सन्तु)। यथा वः सह सु असति, (तथा) वः मनः समानम् अस्तु।

अर्थः (हिन्दी) — हे मनुष्यो! तुम्हारा सङ्कल्प समान हो, तुम्हारे हृदय सामरस्यपूर्ण हों, और तुम्हारा मन भी एकरूप तथा सामञ्जस्ययुक्त हो — जिससे तुम्हारा संघटन सुन्दर और उत्कृष्ट बने।

पदम्अर्थः
आकूतिःसङ्कल्पः — इरादा, संकल्प
समानीसमाना — एक जैसी
हृदयानिअन्तःकरणानि — हृदय (नपुंसकलिङ्ग, बहुवचन)
वःयुष्माकम् — तुम्हारा
सु सह असतिसुसंघटितः भवेत् — भली-भाँति संगठित हो
भावः: यह मन्त्र एकता की सबसे भीतरी परत तक जाता है। बाहर से साथ चलना, एक स्वर में बोलना — ये दिखते हैं; पर सङ्कल्प और हृदय नहीं दिखते। ऋषि कहता है कि जब तक भीतर का इरादा एक न हो, बाहर की एकता टिकती नहीं। इसी से परिवार, गण, समाज, राष्ट्र तथा विश्व में सुख, शान्ति और मैत्रीभाव विराजते हैं, और स्वजीवन में प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आयु, आरोग्य, विजय, समृद्धि, धर्म, ज्ञानप्राप्ति तथा आत्मतृप्ति प्राप्त होती है।
तीनों मन्त्रों का क्रम: १ — कर्म की एकता (चलो, बोलो), २ — विचार की एकता (चिन्तन, लक्ष्य), ३ — भाव की एकता (सङ्कल्प, हृदय)। यही तीन सीढ़ियाँ मिलकर ‘संघटन’ बनाती हैं — इसीलिए इस सूक्त का दूसरा नाम संघटन-सूक्तम् है।
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