दीपकम् अध्याय 1 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अस्य सूक्तस्य भावार्थं मित्रैः सह मातृभाषया चर्चयत।
उत्तर

यह चर्चा-कार्य है — मित्रों के साथ अपनी मातृभाषा में बैठकर सूक्त का भाव समझना। शिक्षक इसे कक्षा में समूह-चर्चा के रूप में कराएँगे।

चर्चा कैसे करें (विधि) —

  1. चार-पाँच के समूह बनाइए। हर समूह एक मन्त्र लेकर पहले उसका शब्दार्थ (पृष्ठ ५ की तालिका से) पढ़े।
  2. फिर हर सदस्य अपनी भाषा में एक वाक्य कहे कि उस मन्त्र से उसे क्या समझ आया।
  3. अन्त में समूह मिलकर तीन वाक्य लिखे — मन्त्र क्या कहता है, आज के जीवन में उसका उदाहरण क्या है, और उसे कक्षा में कैसे उतारा जाए।

अच्छी चर्चा में ये बातें अवश्य आएँ —

  • तीनों मन्त्रों का क्रम — कर्म की एकता → विचार की एकता → भाव की एकता।
  • देवों का उदाहरण — अग्नि, वायु, सूर्य अपना-अपना कर्तव्य बिना झगड़े निभाते हैं।
  • एकता का लाभ — प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आरोग्य, विजय, समृद्धि।
नमूना उत्तर (हिन्दी में चर्चा का सार): “इस सूक्त का भाव यह है कि किसी भी समूह की शक्ति उसकी संख्या में नहीं, उसके तालमेल में है। हमारे विद्यालय के दल ने फुटबॉल इसीलिए जीती क्योंकि खिलाड़ियों में सामञ्जस्य था। जब हम मिलकर चलते हैं, एक-दूसरे को सुनकर बोलते हैं और मन में भेद नहीं रखते, तब घर, कक्षा और गाँव — तीनों में शान्ति रहती है। मन्त्र कहता है कि यही रीति सृष्टि के आरम्भ से देवों की भी थी।” — इसी को अपनी मातृभाषा में कहिए।
प्र2.
संज्ञानसूक्तम् इव ऋग्वेदस्य पञ्चानां सूक्तानां नामानि लिखत।
उत्तर

ऋग्वेदस्य पञ्च प्रसिद्धानि सूक्तानि —

क्रमःसूक्तस्य नामस्थानम् (मण्डलम्·सूक्तम्)विषयः
नासदीयसूक्तम्१०.१२९सृष्टेः उत्पत्तिविषयकं चिन्तनम् — सृष्टि से पहले क्या था ?
पुरुषसूक्तम्१०.९०विराट् पुरुषस्य वर्णनम्
हिरण्यगर्भसूक्तम्१०.१२१सृष्टिकर्तुः हिरण्यगर्भस्य स्तुतिः
वाक्सूक्तम् (देवीसूक्तम्)१०.१२५वाग्देव्याः माहात्म्यम्
नदीसूक्तम्१०.७५सिन्धु-आदि-नदीनां स्तुतिः

(हिन्दी — ये पाँचों सूक्त संज्ञान-सूक्त की ही तरह ऋग्वेद के प्रसिद्ध सूक्त हैं। ध्यान दीजिए कि इनमें से चार दसवें मण्डल के ही हैं — वही मण्डल जिससे हमारा पाठ लिया गया है।)

अन्य नाम भी लिख सकते हैं: अक्षसूक्तम् (१०.३४), उषस्सूक्तम् (१.११३), इन्द्रसूक्तम्, अरण्यानीसूक्तम् (१०.१४६)। उत्तर में नाम के साथ मण्डल-सूक्त की संख्या भी लिखें — इससे उत्तर पूर्ण माना जाता है।
प्र3.
संज्ञानसूक्तस्य आधारेण भवत्सु एकतां स्थापयितुं विविधान् उपायान् अध्यापकैः सह आलोचयत।
उत्तर

यह शिक्षक के साथ की जाने वाली आलोचना (विचार-विमर्श) है — कक्षा में एकता कैसे बनाई जाए, इसके उपाय सोचने हैं।

अच्छे उत्तर में क्या हो — हर उपाय सूक्त के किसी मन्त्र से जुड़ा हो, और वह उपाय ऐसा हो जिसे कक्षा सचमुच कर सके। नीचे तालिका इसी ढंग से बनी है।

मन्त्रस्य सन्देशःकक्षायाम् उपायः
संगच्छध्वम् — मिलकर चलोसमूह-कार्यम् (group work) — प्रत्येक परियोजना चतुर्णां छात्राणां समूहेन एव क्रियताम्, येन सर्वे सहभागिनः भवेयुः।
संवदध्वम् — एक स्वर में बोलोप्रतिदिनं प्रार्थनासभायां समवेतस्वरेण मन्त्रपाठः; वादविवादे प्रथमं श्रवणम्, ततः उत्तरम्।
मनांसि जानताम् — मन एक-दूसरे को जानें‘मित्र-परिचय-दिवसः’ — प्रत्येकः छात्रः अन्यस्य छात्रस्य विषये पञ्च वाक्यानि लिखतु, पठतु च।
समितिः समानी — लक्ष्य समान होकक्षायाः एकं वार्षिकं लक्ष्यं निश्चित्य भित्तिपत्रे लिखत — यथा ‘अस्माकं कक्षा स्वच्छतमा भविष्यति’।
समाना हृदयानि — हृदय एक होंविवादे मध्यस्थता — यदा द्वौ छात्रौ कलहं कुरुतः, तदा तृतीयः मित्रं समाधानं कारयतु; ‘क्षम्यताम्’ इति वक्तुं शिक्षणम्।
सु सह असति — संघटन सुन्दर होक्रीडायां प्रतिमासं दलपरिवर्तनम्, येन सर्वैः सह क्रीडितुं शक्यते, न च स्थायिणः गुटाः भवेयुः।
नमूना उत्तर (आलोचना का सार): “हमने अध्यापक जी के साथ मिलकर तय किया कि कक्षा में एकता के लिए तीन काम तुरन्त आरम्भ करेंगे — (१) हर सप्ताह समूह बदलकर काम करेंगे, जिससे सब सबके साथ काम करना सीखें; (२) प्रार्थनासभा में सब मिलकर संज्ञान-सूक्त का सस्वर पाठ करेंगे; (३) कक्षा के भित्तिपत्र पर ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ लिखकर नीचे उस सप्ताह किसने किसकी सहायता की, यह लिखेंगे। एक मास बाद हम स्वयं देखेंगे कि झगड़े घटे या नहीं।”
यह कार्य क्यों: सूक्त का सन्देश केवल याद करने का नहीं, बरतने का है। जब तक एकता कक्षा के दैनिक व्यवहार में नहीं उतरती, मन्त्र केवल शब्द रह जाता है — यही बात आचार्य ने चित्र-संवाद में क्रीडोत्सव के उदाहरण से समझाई थी।
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