कक्षा ८ संस्कृत अध्याय 1 योग्यताविस्तरः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
वेदाः, ब्राह्मणानि, उपनिषदः, उपवेदाः, वेदोपाङ्गानि / षड्-दर्शनानि, वेदाङ्गानि च कानि सन्ति ?
उत्तर

पुस्तक इस स्थान पर वैदिक वाङ्मय का पूरा नक्शा एक साथ देती है। इसे तालिका के रूप में याद रखना सरल है।

क्रमःवर्गःनामानिसङ्ख्या
१वेदाःऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः४
२ब्राह्मणानिऐतरेयः, शतपथः, सामविधानं, गोपथः, इत्यादयःअनेकानि
३उपनिषदः (प्रसिद्धाः)ईशः, केन, कठः, प्रश्नः, मुण्डकः, माण्डूक्यः, ऐतरेयः, तैत्तिरीयः, छान्दोग्यः, बृहदारण्यकः, इत्यादयः१० प्रसिद्धाः
४उपवेदाःआयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्ववेदः, अर्थवेदः / स्थापत्यवेदः४
५वेदोपाङ्गानि / षड्-दर्शनानिन्यायः, वैशेषिकं, साङ्ख्यं, योगः, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदान्तः)६
६वेदाङ्गानिशिक्षा, व्याकरणं, छन्दः, निरुक्तं, ज्योतिषं, कल्पः६
इन्हें कैसे जोड़कर देखें: चारों वेद मूल संहिता हैं। ब्राह्मण ग्रन्थ बताते हैं कि यज्ञ-कर्म कैसे किया जाए; उपनिषद् बताते हैं कि उसके पीछे का तत्त्वज्ञान क्या है। उपवेद जीवन के व्यावहारिक शास्त्र हैं — चिकित्सा (आयुर्वेद), युद्ध (धनुर्वेद), सङ्गीत-कला (गान्धर्ववेद) तथा वास्तु-शिल्प (स्थापत्यवेद)। वेदाङ्ग वेद को शुद्ध पढ़ने और समझने के छह साधन हैं, और षड्-दर्शन उसी ज्ञान की छह विचारधाराएँ।
याद रखने की युक्ति: छह वेदाङ्ग को शरीर से जोड़कर याद करते हैं — शिक्षा = नासिका (उच्चारण), व्याकरण = मुख, निरुक्त = श्रोत्र, छन्द = चरण, कल्प = हस्त, ज्योतिष = नेत्र। इसी क्रम में सूची दोहराएँ, भूलेंगे नहीं।
प्र2.
ऋग्वेदस्य विभाजनं कथं भवति ? अस्य पाठस्य आधारः कः ?
उत्तर

ऋग्वेदे मन्त्राणां सङ्ख्या — दश सहस्राणि, पञ्च शतानि, द्विपञ्चाशत् च (१०,५५२) मन्त्राः सन्ति। अस्य ग्रन्थस्य विभजनं द्विधा भवति। (हिन्दी — ऋग्वेद में १०,५५२ मन्त्र हैं और इस ग्रन्थ का विभाजन दो प्रकार से होता है।)

क्रमःविभाजनम्विवरणम्
१मण्डलक्रमः१० मण्डलानि, ८५ अनुवाकाः, १,०२८ सूक्तानि
२अष्टकक्रमः८ अष्टकाः, प्रत्यष्टकम् ८ अध्यायाः, आहत्य ६४ अध्यायाः
अष्टकक्रमे अध्यायानां गणना —
८ अष्टकाः × ८ अध्यायाः प्रत्यष्टकम्
= ६४ अध्यायाः

अस्य पाठस्य आधारः — ऋग्वेदस्य अन्तिमस्य दशम-मण्डलस्य अन्तिमम् एकशताधिक-एकनवतितमं (१०.१९१) सूक्तम् अस्ति, यत् ‘संज्ञान-सूक्तम्’, ‘संघटन-सूक्तम्’ वेति नामभ्यां प्रसिद्धम् अस्ति। (हिन्दी — यह पाठ ऋग्वेद के अन्तिम अर्थात् दसवें मण्डल के अन्तिम, १९१वें सूक्त पर आधारित है, जो ‘संज्ञान-सूक्त’ तथा ‘संघटन-सूक्त’ — दोनों नामों से प्रसिद्ध है।)

यह सूक्त अन्त में क्यों ? ऋग्वेद का समापन इसी एकता के सन्देश से होता है — मानो पूरा वेद अन्त में यही कहना चाहता हो कि जो कुछ पढ़ा-सुना, उसका सार ‘मिलकर चलो, एक स्वर में बोलो, एक मन हो’ ही है। इसीलिए इसका नाम ‘संज्ञान’ (सम्यक् ज्ञान / एकमत होना) और ‘संघटन’ (संगठित होना) दोनों पड़ा।
Did you know? ‘एकशताधिक-एकनवतितमम्’ का अर्थ है ‘एक सौ के ऊपर इक्यानवेवाँ’ अर्थात् १९१वाँ — संस्कृत में बड़ी संख्याओं के क्रमवाचक इसी प्रकार जोड़कर बनाए जाते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा?