दीपकम् अध्याय 10 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) शूद्रकः कीदृशः राजा आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — शूद्रकः महापराक्रमी नानाशास्त्रवित् पूतचरित्रः च महीपतिः आसीत्।
हिन्दी अर्थ: शूद्रक बहुत पराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता और पवित्र चरित्र वाला राजा था। पाठ की पहली ही पंक्ति यह तीनों गुण एक साथ गिनाती है — “तत्र शूद्रको नाम महापराक्रमी नानाशास्त्रवित् पूतचरित्रः महीपतिः प्रतिवसति स्म।”
व्याकरण-सङ्केतः: तीनों पद महीपतिः के विशेषण हैं, इसलिए तीनों पुंलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन में हैं। ‘कीदृशः’ का उत्तर सदा विशेषणों से दिया जाता है।
प्र2.
(ख) वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः स्वामिनः (राज्ञः शूद्रकस्य) समीपं गन्तुम् इच्छति स्म।
हिन्दी अर्थ: वीरवर स्वामी अर्थात् राजा शूद्रक के पास जाना चाहता था। उसने द्वारपाल से कहा — “भोः प्रतिहार ! वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्।” (इसलिए मुझे स्वामी के पास ले चलो।)
व्याकरण-सङ्केतः: प्रश्न में ‘कस्य’ षष्ठी है, इसलिए उत्तर भी षष्ठी में ही आएगा — ‘स्वामिनः / राज्ञः शूद्रकस्य’। इच्छति स्म — लट् + स्म = भूतकाल (‘चाहता था’)।
प्र3.
(ग) राज्ञः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?’ इति प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः किम् अयच्छत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “इमौ बाहू, एष खड्गश्च।” इति।
हिन्दी अर्थ: वीरवर ने उत्तर दिया — “ये दो भुजाएँ और यह तलवार (ही मेरी सामग्री है)।” अर्थात् उसके पास न सेना थी, न सम्पत्ति — केवल अपना बाहुबल और अपना शस्त्र। चार सौ स्वर्णमुद्रा माँगने वाला व्यक्ति जब यह उत्तर देता है, तभी राजा चौंककर कहता है — ‘नैतच्छक्यम्!’
Did you know? ‘सामग्री’ का यहाँ अर्थ है — कार्य करने के साधन। वीरवर का उत्तर बताता है कि वह अपने वेतन को अपनी क्षमता से जोड़कर देखता है, दिखावे से नहीं। आगे की कथा में वही दो भुजाएँ और तलवार राजा तथा राष्ट्र को बचाती हैं।
प्र4.
(घ) वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — यदा राजा स्वयम् आदिशति स्म, तदा एव वीरवरः स्वगृहं गच्छति स्म।

पाठे प्रमाणम् — “धृतायुधः सः राजद्वारमहर्निशं सेवते। यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम्।”

हिन्दी अर्थ: वह शस्त्र धारण किए दिन-रात राजद्वार की सेवा करता था; घर तभी जाता था जब राजा स्वयं आज्ञा देते थे। यही कारण है कि आधी रात को भी, जब राजा ने पूछा ‘कोऽत्र द्वारि तिष्ठति?’, तो उत्तर मिला — ‘सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्त्तते देव!’
व्याकरण-सङ्केतः:यदा… तदा…’ नित्य-सम्बन्धी अव्यय-युग्म है — एक के बिना दूसरा अधूरा। उत्तर में भी यही जोड़ा रखना चाहिए।
प्र5.
(ङ) वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं केभ्यः यच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं देवेभ्यः यच्छति स्म।

पाठे प्रमाणम् — “स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम्।”

हिन्दी अर्थ: वह प्रतिदिन सवेरे राजा के दर्शन के बाद अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को (देव-कार्य में) देता था। शेष का आधा दरिद्रों को और जो बचता, वह पत्नी के हाथ में रख देता था।
व्याकरण-सङ्केतः: प्रश्न में ‘केभ्यःचतुर्थी बहुवचन है (किनके लिए?), इसलिए उत्तर भी चतुर्थी बहुवचन में — ‘देवेभ्यः’। ‘दा’ धातु के साथ जिसे दिया जाए वह सम्प्रदान होकर चतुर्थी लेता है।
प्र6.
(च) राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ?
उत्तर
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः राज्ञः शूद्रकस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन अवसत्।

पाठे प्रमाणम् — “चिरमेतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि।”

हिन्दी अर्थ: राजलक्ष्मी राजा शूद्रक की भुजाओं की छाया में बहुत बड़े सुख से चिरकाल तक रहती थी। ‘भुजच्छाया’ का अर्थ है — बाहुबल का संरक्षण; अर्थात् राजा के पराक्रम से सुरक्षित होकर राज्य की लक्ष्मी (समृद्धि) वहाँ टिकी हुई थी।
अलङ्कारः: यहाँ रूपक है — राज्य की समृद्धि को स्त्री-रूप में ‘राजलक्ष्मी’ कहा गया, और राजा के बाहुबल को ‘छाया’। भाव यह है कि जहाँ रक्षा है, वहीं लक्ष्मी टिकती है
व्याकरण-सङ्केतः: ‘भुजच्छायायाम्’ — स्त्रीलिङ्ग, सप्तमी एकवचन (आधार); ‘कुत्र’ का उत्तर सप्तमी में ही मिलता है।
प्र7.
(छ) राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं श्रुत्वा बद्धाञ्जलिः वीरवरः किम् अवदत् ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?” इति।
हिन्दी अर्थ: राजलक्ष्मी के दुःख का कारण सुनकर वीरवर ने प्रणाम करके कहा — “हे भगवति! क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे आपका फिर यहाँ चिरकाल तक निवास हो जाए और स्वामी (राजा) दीर्घकाल तक जीवित रहें?”
चरित्र-सङ्केतः: ध्यान दीजिए — वीरवर ने अपने वेतन, अपने घर या अपनी नौकरी की चिन्ता नहीं की। उसका पहला प्रश्न ही स्वामी के जीवन और राज्य की लक्ष्मी के लिए है। यही ‘स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च’ है, जिसे पाठ की प्रस्तावना ‘प्रेरणार्हः’ कहती है।
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