दीपकम् अध्याय 10 सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
पाठ का स्रोत और रूप — पाठ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है और यह गद्य तथा संवाद (नाट्य) दोनों में चलता है — कथावाचन के बीच-बीच में ‘राजा –’, ‘वीरवरः –’, ‘मन्त्री –’, ‘राजलक्ष्मीः –’ के संवाद और कोष्ठक में रङ्गसंकेत (जैसे स्वगतम् , तदालोक्य , साष्टाङ्गं नमस्कृत्य ) आते हैं। पाठ दो भागों में है; यह ‘क-भागः’ है, आगे की कथा ग्यारहवें पाठ (ख-भागः) में है। कथा का ढाँचा — शोभावती नगरी → महापराक्रमी, नानाशास्त्रवित्, पूतचरित्र राजा शूद्रक → आजीविका के लिए आया राजपुत्र वीरवर (साथ में पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर, कन्या वीरवती) → चार सौ स्वर्णमुद्रा प्रतिदिन का वेतन माँगना → राजा का ‘नैतच्छक्यम्’ → मन्त्रियों की सलाह से चार दिन की परीक्षा → कृष्णचतुर्दशी की आधी रात का क्रन्दन → राजलक्ष्मी का प्रकट होना और दुःसाध्य उपाय बताना। वीरवर का चरित्र — वह अपनी ‘सामग्री’ केवल ‘इमौ बाहू, एष खड्गश्च’ बताता है। वेतन का
अभ्यास
- पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः
- पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः
- वयं शब्दार्थान् जानीमः
- अत्र इदम् अवधेयम्
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- योग्यताविस्तरः
- योग्यताविस्तरः
- परियोजनाकार्यम्