दीपकम् अध्याय 10 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) राजलक्ष्मीः वदति यत् यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु त्यजति तदा सा पुनः शूद्रकस्य समीपे स्थास्यति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “श्रूयतां पुत्र ! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।”
हिन्दी अर्थ: “सुनो पुत्र! यदि तुम अपनी सबसे प्रिय वस्तु हँसते हुए मुख से भगवती सर्वमङ्गला को उपहार-रूप में अर्पित कर दो, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक फिर जीवित रहेगा और मैं भी सुखपूर्वक (यहाँ) रहूँगी।”
ध्यातव्यम्: प्रश्न में ‘श्लोकं’ शब्द छपा है, किन्तु यह पाठ (क-भागः) पूर्णतः गद्य-नाट्यात्मक है — इसमें कोई श्लोक नहीं है। अतः यहाँ ‘पाठ से सम्बद्ध गद्यांश’ ही चुनकर लिखना अपेक्षित है। परीक्षा में वही मूल वाक्य उद्धृत कीजिए जो ऊपर दिया गया है।
प्र2.
(ख) राजा शूद्रकः प्रथमं वीरवरस्य वृत्त्यर्थं प्रार्थनां न स्वीकरोति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “राजा — नैतच्छक्यम् !” (तत् श्रुत्वा वीरवरः राजानं प्रणम्य राजसभातः निर्गतः।)
हिन्दी अर्थ: राजा ने कहा — “यह सम्भव नहीं!” यह सुनकर वीरवर राजा को प्रणाम करके राजसभा से बाहर चला गया। प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्रा का वेतन राजा को अत्यधिक लगा, इसलिए उसने पहली बार में प्रार्थना स्वीकार नहीं की।
चरित्र-सङ्केतः: ध्यान दीजिए, इनकार सुनकर भी वीरवर न झगड़ता है, न गिड़गिड़ाता है — ‘राजानं प्रणम्य निर्गतः’, प्रणाम करके चला जाता है। यह शालीनता ही मन्त्रियों का ध्यान खींचती है।
सन्धि: नैतच्छक्यम् = न + एतत् + शक्यम्।
प्र3.
(ग) एकदा कोऽपि वीरवरः नाम राजपुत्रः वृत्तिं प्राप्तुं राज्ञः शूद्रकस्य समीपं गच्छति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्। तेन सह वेदरता नाम तस्य पत्नी, शक्तिधरो नाम सुतः, वीरवती नाम कन्या च समायाताः।”
हिन्दी अर्थ: एक बार वीरवर नाम का राजपुत्र आजीविका के लिए किसी दूसरे देश से (शोभावती के) राजद्वार पर आया। उसके साथ उसकी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती भी आए।
Tip: यही वाक्य प्रश्न ७ के उदाहरण (यथा) में पदच्छेद के लिए भी लिया गया है — ‘अथ एकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मात् अपि देशात् राजद्वारम् उपागच्छत्।’
प्र4.
(घ) सः तस्य कर्तव्यनिष्ठां साक्षात् पश्यति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “राजा — (स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्। तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति। (ततो नरपतिः खड्गपाणिः तस्य अनुसरणक्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात्।)”
हिन्दी अर्थ: राजा ने मन-ही-मन सोचा — “इस सघन अन्धकार में यह राजपुत्र अकेला जाने योग्य नहीं है। इसलिए मैं भी इसके पीछे जाता हूँ और देखता हूँ कि बात क्या है।” — फिर राजा हाथ में तलवार लिए उसके पीछे-पीछे नगर के द्वार से बाहर निकल गया। इसी प्रकार वह वीरवर की कर्तव्यनिष्ठा को अपनी आँखों से देखता है।
पूरक अंश: कर्तव्यनिष्ठा का मूल वर्णन इससे पहले आ चुका है — “धृतायुधः सः राजद्वारमहर्निशं सेवते। यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम्।” (शस्त्र धारण किए वह दिन-रात राजद्वार की सेवा करता है; राजा की आज्ञा मिलने पर ही घर जाता है।)
प्र5.
(ङ) राजा मन्त्रिणां मन्त्रणया वीरवराय वृत्तिं यच्छति।
उत्तर
पाठात् सम्बद्धः अंशः — “मन्त्री — (तदालोक्य) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति। अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”
हिन्दी अर्थ: मन्त्री ने यह देखकर कहा — “हे देव! चार दिन का वेतन देकर पहले इस वेतनार्थी राजपुत्र का स्वरूप परख लीजिए कि यह वेतन उचित है या नहीं।” इसके बाद मन्त्रियों के कहने से राजा ने ताम्बूल देकर उस राजपुत्र वीरवर को नियुक्त कर लिया।
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