दीपकम् अध्याय 10 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यथा — अहं भवतः सेवायां नियोजितः। — राज्ञे ॥ (क) ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः।
उत्तर
उत्तरम् — वीरवराय
क्यों: यह वाक्य राजा के मुख से नहीं, कथावाचक के मुख से है — “(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः।)” — अर्थात् वह (वीरवर) उस रोने के स्वर का अनुसरण करता हुआ चल पड़ा। राजा की आज्ञा ‘क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!’ पाकर जाने वाला वीरवर ही है, इसलिए ‘असौ’ वीरवर के लिए प्रयुक्त है।
हिन्दी अर्थ: वह (वीरवर) उस क्रन्दन-स्वर के पीछे-पीछे चल पड़ा।
ध्यान दीजिए: उत्तर चतुर्थी विभक्ति में लिखा जाता है (‘किसके लिए प्रयुक्त हुआ?’) — जैसे उदाहरण में ‘भवतः’ का उत्तर ‘राज्ञे’ है, वैसे ही यहाँ ‘वीरवराय’।
प्र2.
(ख) तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य।
उत्तर
उत्तरम् — राज्ञे शूद्रकाय
क्यों: यह राजा शूद्रक का स्वगत कथन है — “(स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्। तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति।” अतः ‘अहम्’ राजा के लिए प्रयुक्त है।
हिन्दी अर्थ: इसलिए मैं भी इसके पीछे-पीछे जाता हूँ और देखता हूँ कि यह क्या है।
कथा-सङ्केतः: इसी वाक्य से कथा का मोड़ बनता है — राजा स्वयं खड्ग लेकर पीछे-पीछे जाता है, इसलिए आगे (ख-भागः में) वीरवर की सारी बातें वह अपने कानों से सुनता है।
प्र3.
(ग) चिरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि।
उत्तर
उत्तरम् — राज्ञे शूद्रकाय
क्यों: यह वाक्य राजलक्ष्मी कहती है, और ठीक पिछले वाक्य में वह बता चुकी है — “अहम् एतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि।” अतः ‘एतस्य’ राजा शूद्रक के लिए ही आया है।
हिन्दी अर्थ: मैं चिरकाल से इसकी (राजा शूद्रक की) भुजाओं की छाया में बड़े सुख से रहती हूँ।
प्र4.
(घ) सा चातीव दुःसाध्या।
उत्तर
उत्तरम् — प्रवृत्त्यै (उपायाय)
क्यों: पूरा वाक्य है — “अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।” अर्थात् ‘सा’ ठीक पहले आए ‘प्रवृत्तिः’ (आचरण/उपाय) के लिए प्रयुक्त है, किसी व्यक्ति के लिए नहीं।
हिन्दी अर्थ: और वह (उपाय) अत्यन्त कठिन है।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘प्रवृत्तिः’ स्त्रीलिङ्ग है, इसीलिए सर्वनाम ‘सा’ और विशेषण ‘दुःसाध्या’ — दोनों स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन में हैं। लिङ्ग-मेल से ही पता चल जाता है कि ‘सा’ किसके लिए है।
प्र5.
(ङ) किं ते वर्तनम् ?
उत्तर
उत्तरम् — वीरवराय
क्यों: यह राजा का प्रश्न है और वह वीरवर से पूछ रहा है, इसलिए ‘ते’ (= तव, तुम्हारा) वीरवर के लिए प्रयुक्त है। उत्तर भी वीरवर ही देता है — ‘प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव!’
हिन्दी अर्थ: तुम्हारा वेतन क्या है?
व्याकरण-सङ्केतः:ते’ युष्मद् शब्द के षष्ठी एकवचन (तव) तथा चतुर्थी एकवचन (तुभ्यम्) — दोनों का लघु रूप है। यहाँ ‘वर्तनम्’ के साथ सम्बन्ध है, इसलिए षष्ठी का अर्थ ‘तुम्हारा’ लिया जाएगा।
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