प्र1.
यथा — अहं भवतः सेवायां नियोजितः। — राज्ञे ॥ (क) ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः।
उत्तर
उत्तरम् — वीरवराय
क्यों: यह वाक्य राजा के मुख से नहीं, कथावाचक के मुख से है — “(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः।)” — अर्थात् वह (वीरवर) उस रोने के स्वर का अनुसरण करता हुआ चल पड़ा। राजा की आज्ञा ‘क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!’ पाकर जाने वाला वीरवर ही है, इसलिए ‘असौ’ वीरवर के लिए प्रयुक्त है।
हिन्दी अर्थ: वह (वीरवर) उस क्रन्दन-स्वर के पीछे-पीछे चल पड़ा।
हिन्दी अर्थ: वह (वीरवर) उस क्रन्दन-स्वर के पीछे-पीछे चल पड़ा।
ध्यान दीजिए: उत्तर चतुर्थी विभक्ति में लिखा जाता है (‘किसके लिए प्रयुक्त हुआ?’) — जैसे उदाहरण में ‘भवतः’ का उत्तर ‘राज्ञे’ है, वैसे ही यहाँ ‘वीरवराय’।