प्र1.
यथा — अथैकदा = अथ + एकदा — एवमेव अधोलिखितानां पदानां रिक्तस्थानानि पूरयत — वृत्त्यर्थम्, कस्मादपि, कोऽपि, राजपुत्रोऽस्मि, यथेष्टम्, वेतनार्पणेन, तदालोक्य, ततोऽसौ, वर्त्तनार्थिनो, तदवशिष्टं, राजदर्शनादनन्तरं, वेति, राजलक्ष्मीरुवाच, चार्द्धं, बहिर्नगरादालोकिता, कापि, प्रत्युवाच, राजलक्ष्मीरस्मि, स्थास्यामीति, भुजच्छायायां, अस्त्यत्र, कश्चिदुपायो।
उत्तर
पुस्तक में जो स्थान रिक्त छोड़े गए हैं, वे नीचे नारङ्गी रंग वाले खाने में भरे गए हैं।
| सन्धिपदम् | = | विच्छेदः | सन्धेः नाम |
|---|---|---|---|
| अथैकदा (यथा) | = | अथ + एकदा | वृद्धि-सन्धिः (अ + ए = ऐ) |
| वृत्त्यर्थम् | = | वृत्ति + अर्थम् | यण्-सन्धिः (इ + अ = य्) |
| कस्मादपि | = | कस्मात् + अपि | जश्त्व-सन्धिः (त् + अ = द्) |
| कोऽपि | = | कः + अपि | विसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः |
| राजपुत्रोऽस्मि | = | राजपुत्रः + अस्मि | विसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः |
| यथेष्टम् | = | यथा + इष्टम् | गुण-सन्धिः (आ + इ = ए) |
| वेतनार्पणेन | = | वेतन + अर्पणेन | दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ) |
| तदालोक्य | = | तत् + आलोक्य | जश्त्व-सन्धिः (त् + आ = द्) |
| ततोऽसौ | = | ततः + असौ | विसर्ग(पूर्वरूप)-सन्धिः |
| वर्त्तनार्थिनो | = | वर्त्तन + अर्थिनः | दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ) |
| तदवशिष्टं | = | तत् + अवशिष्टम् | जश्त्व-सन्धिः (त् + अ = द्) |
| राजदर्शनादनन्तरं | = | राजदर्शनात् + अनन्तरम् | जश्त्व-सन्धिः |
| वेति | = | वा + इति | गुण-सन्धिः (आ + इ = ए) |
| राजलक्ष्मीरुवाच | = | राजलक्ष्मीः + उवाच | विसर्ग-सन्धिः (ः + उ = र्) |
| चार्द्धं | = | च + अर्धम् | दीर्घ-सन्धिः (अ + अ = आ) |
| बहिर्नगरादालोकिता | = | बहिः + नगरात् + आलोकिता | विसर्ग-सन्धिः (ः + न् = र्) तथा जश्त्व-सन्धिः |
| कापि | = | का + अपि | दीर्घ-सन्धिः (आ + अ = आ) |
| प्रत्युवाच | = | प्रति + उवाच | यण्-सन्धिः (इ + उ = य्) |
| राजलक्ष्मीरस्मि | = | राजलक्ष्मीः + अस्मि | विसर्ग-सन्धिः (ः + अ = र्) |
| स्थास्यामीति | = | स्थास्यामि + इति | दीर्घ-सन्धिः (इ + इ = ई) |
| भुजच्छायायां | = | भुज + छायायाम् | छत्व(तुक्-आगम)-सन्धिः |
| अस्त्यत्र | = | अस्ति + अत्र | यण्-सन्धिः (इ + अ = य्) |
| कश्चिदुपायो | = | कश्चित् + उपायः | जश्त्व-सन्धिः (त् + उ = द्) |
तीन काम की पहचान:
① विसर्ग के बाद ‘अ’ हो तो विसर्ग और ‘अ’ मिलकर ‘ओऽ’ बनते हैं — कः + अपि = कोऽपि, ततः + असौ = ततोऽसौ।
② विसर्ग के बाद स्वर (अ को छोड़कर) या मृदु व्यञ्जन हो तो विसर्ग ‘र्’ बन जाता है — राजलक्ष्मीः + उवाच = राजलक्ष्मीरुवाच, बहिः + नगरात् = बहिर्नगरात्।
③ ‘त्’ के बाद स्वर हो तो ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है (जश्त्व) — तत् + आलोक्य = तदालोक्य, कश्चित् + उपायः = कश्चिदुपायः।
① विसर्ग के बाद ‘अ’ हो तो विसर्ग और ‘अ’ मिलकर ‘ओऽ’ बनते हैं — कः + अपि = कोऽपि, ततः + असौ = ततोऽसौ।
② विसर्ग के बाद स्वर (अ को छोड़कर) या मृदु व्यञ्जन हो तो विसर्ग ‘र्’ बन जाता है — राजलक्ष्मीः + उवाच = राजलक्ष्मीरुवाच, बहिः + नगरात् = बहिर्नगरात्।
③ ‘त्’ के बाद स्वर हो तो ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है (जश्त्व) — तत् + आलोक्य = तदालोक्य, कश्चित् + उपायः = कश्चिदुपायः।
ध्यातव्यम्: ‘चार्द्धं’ पाठ में ‘स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति’ के रूप में आया है = च + अर्धम् (‘और आधा’)। तथा ‘वर्त्तनार्थिनो’ का पूरा विच्छेद ‘वर्त्तन + अर्थिनः’ है; पाठ में यही शब्द ‘वेतनार्थिनो’ (वेतन + अर्थिनः) रूप में भी मिलता है — दोनों का अर्थ ‘वेतन चाहने वाले का’ ही है।