दीपकम् अध्याय 10 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
उत्तर
अन्वयः — शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
हिन्दी अर्थ: शोभावती नाम की कोई नगरी थी।
क्यों यही क्रम: सामान्य (गद्य) अन्वय में क्रम होता है — कर्ता → विशेषण → क्रिया। यहाँ कर्ता ‘नगरी’ (प्रथमा एकवचन, स्त्रीलिङ्ग) है, ‘शोभावती नाम’ तथा ‘काचन’ उसके विशेषण, और ‘आसीत्’ (लङ्, प्रथमपुरुष एकवचन) क्रिया। पाठ में क्रिया को आगे रखकर कथा-शैली का सौन्दर्य उत्पन्न किया गया है — यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का पहला उदाहरण भी है।
प्र2.
(ख) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !
उत्तर
अन्वयः — देव ! (मम वर्तनम्) प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयम् (अस्ति)।
हिन्दी अर्थ: हे देव! (मेरा वेतन) प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ (है)।
क्यों यही क्रम: संवाद में सम्बोधन-पद ‘देव!’ प्रायः अन्त में रख दिया जाता है, पर अन्वय में उसे सबसे पहले लाया जाता है। साथ ही यह वाक्य पिछले प्रश्न ‘किं ते वर्तनम्?’ का उत्तर है, इसलिए अन्वय में लुप्त कर्ता ‘मम वर्तनम्’ तथा लुप्त क्रिया ‘अस्ति’ कोष्ठक में जोड़ना उचित है।
प्र3.
(ग) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथममवगम्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।
उत्तर
अन्वयः — देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन अस्य वेतनार्थिनः राजपुत्रस्य स्वरूपं प्रथमम् अवगम्यताम्, एतत् वेतनम् उपपन्नं किम्, न वा — इति।
हिन्दी अर्थ: हे देव! चार दिन का वेतन देकर पहले इस वेतन चाहने वाले राजपुत्र का स्वरूप समझ लिया जाए (परख लिया जाए) कि यह वेतन उचित है या नहीं।
क्यों यही क्रम: ‘स्वरूपम्’ (कर्म) के साथ उसका षष्ठी-सम्बन्धी पद ‘अस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य’ जुड़ा है, इसलिए अन्वय में दोनों पास-पास रखे गए। ‘अवगम्यताम्’ लोट्-लकार, कर्मवाच्य है, इसलिए वह अन्त में आता है।
ध्यातव्यम्: पाठ (पृष्ठ 112) में यही वाक्य ‘प्रथमं परीक्ष्यतां’ रूप में छपा है और अभ्यास में ‘प्रथमम् अवगम्यताम्’। अर्थ में कोई अन्तर नहीं — ‘परखा जाए / समझ लिया जाए’। परीक्षा में अभ्यास-प्रश्न में दिया गया रूप ही लिखिए।
प्र4.
(घ) क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !
उत्तर
अन्वयः — राजपुत्र ! क्रन्दनम् अनुसर।
हिन्दी अर्थ: हे राजपुत्र! (उस) क्रन्दन का अनुसरण करो (उस रोने की आवाज़ के पीछे जाओ)।
क्यों यही क्रम: सम्बोधन ‘राजपुत्र!’ पहले, फिर कर्म ‘क्रन्दनम्’ (द्वितीया एकवचन), फिर क्रिया ‘अनुसर’ (लोट्-लकार, मध्यमपुरुष एकवचन) — यही सामान्य वाक्यक्रम है।
सन्धि: क्रन्दनमनुसर = क्रन्दनम् + अनुसर (म्-सन्धि / अनुस्वार का पुनः ‘म्’ हो जाना)।
प्र5.
(ङ) अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।
उत्तर
अन्वयः — अथ नरपतिना मन्त्रिणां वचनात् असौ राजपुत्रः वीरवरः ताम्बूलदानेन नियोजितः।
हिन्दी अर्थ: इसके बाद मन्त्रियों के कहने से राजा ने ताम्बूल देकर उस राजपुत्र वीरवर को (सेवा में) नियुक्त कर लिया।
क्यों यही क्रम: यह वाक्य कर्मवाच्य में है — इसीलिए कर्ता ‘नरपतिना’ तृतीया में है और क्रिया-पद ‘नियोजितः’ कर्म (राजपुत्रः वीरवरः) के अनुसार पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन में। अन्वय में कर्ता (तृतीया) पहले, कर्म बीच में, क्रिया अन्त में रखी जाती है।
प्र6.
(च) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्।
उत्तर
अन्वयः — एषः राजपुत्रः एकाकी अस्मिन् सूचिभेद्ये तिमिरे गन्तुं न अर्हति।
हिन्दी अर्थ: यह राजपुत्र इस सुई से भी न भेदे जा सकने वाले (अत्यन्त सघन) अन्धकार में अकेला जाने योग्य नहीं है।
क्यों यही क्रम: ‘एषः’ और ‘एकाकी’ दोनों ‘राजपुत्रः’ के विशेषण हैं, इसलिए उसी के साथ रखे गए। ‘अस्मिन् सूचिभेद्ये तिमिरे’ तीनों सप्तमी एकवचन में हैं (आधार), अतः एक समूह में। अन्त में ‘गन्तुं न अर्हति’ — तुमुन्नन्त + क्रिया।
सन्धि: नैष = न + एष (वृद्धि-सन्धि); तिमिरेऽस्मिन् = तिमिरे + अस्मिन् (पूर्वरूप-सन्धि)। यह राजा का स्वगत कथन है — अर्थात् वह मन-ही-मन कहता है।
प्र7.
(छ) भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?
उत्तर
अन्वयः — भगवति ! अत्र कश्चित् उपायः अस्ति, येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति, स्वामी च सुचिरं जीवति ?
हिन्दी अर्थ: हे भगवति! क्या यहाँ कोई ऐसा उपाय है, जिससे आपका फिर से यहाँ चिरकाल तक निवास हो और स्वामी दीर्घकाल तक जीवित रहें?
क्यों यही क्रम: मूल वाक्य क्रिया ‘अस्ति’ से आरम्भ होता है (साहित्यिक क्रम); अन्वय में कर्ता ‘कश्चित् उपायः’ पहले और क्रिया ‘अस्ति’ बाद में रखी जाती है। ‘येन’ से आरम्भ होने वाला वाक्यांश उपवाक्य है, इसलिए उसका क्रम भीतर-ही-भीतर सुधारा गया — ‘स्वामी च सुचिरं जीवति’।
प्र8.
(ज) तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्।
उत्तर
अन्वयः — तदा राजा शूद्रकः वर्षाणां शतं पुनः जीविष्यति।
हिन्दी अर्थ: तब राजा शूद्रक सौ वर्षों तक फिर से जीवित रहेगा।
क्यों यही क्रम: ‘तदा’ (अव्यय) पहले, कर्ता ‘राजा शूद्रकः’ (प्रथमा एकवचन), फिर कालवाचक ‘वर्षाणां शतम्’, अन्त में क्रिया ‘पुनः जीविष्यति’ (लृट्-लकार = भविष्यत्काल, प्रथमपुरुष एकवचन)।
व्याकरण-सङ्केतः: वर्षाणाम् — नपुंसकलिङ्ग, षष्ठी बहुवचन; ‘वर्षाणां शतम्’ = वर्षों का सौ, अर्थात् सौ वर्ष।
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