दीपकम् अध्याय 10 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) किं वीरवरः राजपुत्रः आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्।”

हिन्दी: हाँ, वीरवर राजपुत्र था। वह किसी दूसरे देश से आजीविका के लिए शोभावती के राजद्वार पर आया था। उसके साथ पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और कन्या वीरवती भी आए थे।
प्र2.
(ख) “किं ते वर्तनम्” ? इति किं शूद्रकः अपृच्छत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् —राजा — किं ते वर्तनम् ?” — यह प्रश्न राजा शूद्रक ने ही पूछा था, और वीरवर ने उत्तर दिया — “प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !”

हिन्दी: हाँ, ‘तुम्हारा वेतन क्या है?’ यह शूद्रक ने ही पूछा। ध्यान रहे — पाठ में केवल ‘राजा’ लिखा है, और उस नगरी का राजा शूद्रक ही है।
प्र3.
(ग) किं वीरवरं राज्ञः समीपे दौवारिकः अनयत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “(ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।)”

हिन्दी: हाँ, वीरवर के कहने पर द्वारपाल ही उसे स्वामी (राजा) के पास ले गया। वीरवर ने उससे कहा था — “भोः प्रतिहार! वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्।”
व्याकरण-सङ्केतः: अनयत् — ‘नी’ धातु, लङ्-लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन = ‘ले गया’। प्रतिहारः और दौवारिकः दोनों का अर्थ ‘द्वारपाल’ ही है।
प्र4.
(घ) किं राजा शूद्रकः राजपुत्रं वीरवरं साक्षात् दृष्ट्वा एव वृत्तिम् अयच्छत् ?
उत्तर
उत्तरम् — (नहीं)

पाठे प्रमाणम् — पहले तो राजा ने साफ़ मना कर दिया — “नैतच्छक्यम् !” (यह सम्भव नहीं) — और वीरवर प्रणाम करके सभा से निकल गया। बाद में मन्त्रियों की सलाह पर ही नियुक्ति हुई — “अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”

हिन्दी: नहीं। राजा ने वीरवर को सामने देखते ही वृत्ति (नौकरी) नहीं दी। चार सौ स्वर्णमुद्रा प्रतिदिन का वेतन सुनकर उसने इनकार किया। मन्त्रियों ने सुझाया कि चार दिन का वेतन देकर पहले परीक्षा ली जाए — तभी ताम्बूल देकर उसे नियुक्त किया गया।
Tip: उस युग में ताम्बूल-दान नियुक्ति या स्वीकृति का औपचारिक चिह्न था — जैसे आज नियुक्ति-पत्र देना।
प्र5.
(ङ) किं वीरवरः स्ववेतनस्य चतुर्थं भागम् एव पत्न्यै यच्छति स्म ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम्स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति, निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते।”

गणना —
कुल वेतन = 1
देवेभ्यः = 1/2
शेष = 1 − 1/2 = 1/2; तस्य अर्धं दरिद्रेभ्यः = 1/2 × 1/2 = 1/4
अवशिष्टं पत्न्यै = 1 − 1/2 − 1/4 = 1/4 (चतुर्थः भागः)
हिन्दी: हाँ। वेतन का आधा देवताओं को, बचे हुए आधे का आधा (यानी कुल का चौथाई) दरिद्रों को, और जो शेष बचा — कुल का चौथाई भाग — वही भोजन तथा अन्य ख़र्च के लिए पत्नी के हाथ में देता था। यही वीरवर की त्यागवृत्ति है, जो पाठ के शीर्षक ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ की भूमिका बनाती है।
प्र6.
(च) किं करुण-रोदन-ध्वनिं राजा श्रुतवान् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”

हिन्दी: हाँ। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की आधी रात को राजा ने किसी करुण क्रन्दन की ध्वनि सुनी। उसी को सुनकर उसने पूछा — ‘कोऽत्र द्वारि तिष्ठति?’ और फिर वीरवर को आदेश दिया — ‘क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!
व्याकरण-सङ्केतः: श्रुतवान् = श्रु + क्तवतु — भूतकालिक कर्तृवाच्य रूप, पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन (‘सुना’)। यही उदाहरण ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में भी दिया गया है।
प्र7.
(छ) किं करुणरोदनध्वनिः दिवसे श्रुतः आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — (नहीं)

पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”

हिन्दी: नहीं, वह ध्वनि दिन में नहीं, कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में सुनी गई थी। इसी कारण अन्धकार भी इतना घना था कि राजा ने स्वयं कहा — ‘सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्’ (इस सुई से भी न भिदने वाले अन्धकार में)।
ध्यातव्यम्: कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे = कृष्णचतुर्दश्याम् + अर्धरात्रे — दोनों पद सप्तमी एकवचन में हैं, क्योंकि यहाँ काल का आधार बताया जा रहा है।
प्र8.
(ज) किं राजलक्ष्म्या उक्तः उपायः अतीव दुःसाध्यः आसीत् ?
उत्तर
उत्तरम् — आम् (हाँ)

पाठे प्रमाणम् — “अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।”

हिन्दी: हाँ। राजलक्ष्मी ने स्वयं कहा कि उपाय एक ही है और वह अत्यन्त कठिन है — अपनी सबसे प्रिय वस्तु को हँसते मुख से भगवती सर्वमङ्गला को अर्पित करना। कठिनाई केवल त्याग में नहीं, ‘सहासवदनेन’ (मुस्कुराते हुए) त्याग करने में है — दुःख के साथ किया गया त्याग सच्चा त्याग नहीं माना गया।
प्र9.
(झ) किं भगवती सर्वमङ्गला उपायं संसूच्य शीघ्रमेव अदृश्या अभवत् ?
उत्तर
उत्तरम् — (नहीं)

पाठे प्रमाणम् — उपाय बताकर अदृश्य होने वाली राजलक्ष्मी थी, भगवती सर्वमङ्गला नहीं — “(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)”

हिन्दी: नहीं। भगवती सर्वमङ्गला तो वह देवी हैं जिन्हें प्रिय वस्तु का उपहार देना है — वे कथा में प्रकट ही नहीं होतीं। वीरवर से बात करने वाली और उपाय बताकर उसी क्षण अदृश्य हो जाने वाली राजलक्ष्मी है, जो स्वयं को ‘एतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि’ कहकर परिचय देती है।
Check it yourself: पृष्ठ 114 का वाक्य फिर पढ़िए — ‘यदि त्वया… भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत’। यहाँ ‘सर्वमङ्गलायै’ चतुर्थी विभक्ति में है, अर्थात् वे सम्प्रदान हैं — बोलने वाली नहीं।
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