प्र1.
१. वाक्यान्वयः — संस्कृतभाषायाः ‘मुक्तः पदविन्यासक्रमः’ इति किम् ? पाठात् उदाहरणद्वयं दत्त्वा स्पष्टीकुरुत।
उत्तर
उत्तरम् — संस्कृतभाषायाः अनेकवैशिष्ट्येषु अन्यतमः अस्ति मुक्तः पदविन्यासक्रमः — तन्नाम वाक्ये कर्तृ-कर्म-क्रियादिपदानि वयं स्वेच्छया भिन्नभिन्नक्रमेण नियोजयितुं शक्नुमः।
तद्यथा (पेटिकायाः उदाहरणम्) —
- रामः वनम् अगच्छत्।
- अगच्छत् रामः वनम्।
- वनम् अगच्छत् रामः।
तीनों वाक्य शुद्ध हैं और तीनों का अर्थ एक ही है — ‘राम वन को गया’। कारण यह है कि संस्कृत में सम्बन्ध पद के स्थान से नहीं, विभक्ति से तय होता है — ‘रामः’ प्रथमा है इसलिए वही कर्ता रहेगा, चाहे वह वाक्य में कहीं भी बैठे; ‘वनम्’ द्वितीया है इसलिए वही कर्म रहेगा।
पाठात् उदाहरणे (पुस्तके प्रदत्ते) —
| सामान्यः वाक्यक्रमः | (पाठे) साहित्ये वाक्यक्रमः |
|---|---|
| शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्। | आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी। |
| तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते निक्षिपति च। | निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते। |
ऐसा क्यों होता है: साहित्य में लेखक क्रिया या कर्म को आगे रखकर रस, लय और बल उत्पन्न करता है — ‘आसीत् शोभावती…’ से कथा का ‘था एक नगरी…’ वाला वातावरण तुरन्त बन जाता है। इसीलिए पुस्तक का निर्देश है — “पाठकः पदानां विभक्तिं सम्यक् आलोच्य तेषाम् अन्वयं कुर्यात्।” (पाठक पदों की विभक्ति ठीक से देखकर उनका अन्वय करे।)
Try This: पाठ का वाक्य ‘अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।’ लीजिए और इसका सामान्य क्रम बनाइए — ‘अथ नरपतिना मन्त्रिणां वचनात् असौ राजपुत्रः वीरवरः ताम्बूलदानेन नियोजितः।’ ध्यान दीजिए, कर्ता ‘नरपतिना’ तृतीया में है क्योंकि वाक्य कर्मवाच्य में है।