दीपकम् अध्याय 10 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
राजा — “कोऽत्र द्वारि तिष्ठति ?” (पृष्ठ 113)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः — “सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्त्तते देव !”
हिन्दी अर्थ: राजा (आधी रात को) पूछते हैं — “यहाँ द्वार पर कौन खड़ा है?” वीरवर उत्तर देता है — “हे देव! आपका सेवक वीरवर यहाँ द्वार पर है।” कृष्ण-चतुर्दशी की आधी रात में भी वह द्वार छोड़कर नहीं गया — क्योंकि ‘यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम्’ (राजा जब स्वयं आज्ञा दें, तभी वह घर जाता है)।
व्याकरण-सङ्केतः: कोऽत्र = कः + अत्र (विसर्ग-सन्धि)। वीरवरोऽत्र = वीरवरः + अत्र। द्वारि — ‘द्वार’ शब्द का सप्तमी एकवचन (आधार अर्थ में) = ‘द्वार पर’।
प्र2.
वीरवरः — “का त्वमम्ब ! किमर्थं विलपसि ?” (पृष्ठ 113)
उत्तर
उत्तरम् — सा स्त्री राज्ञः शूद्रकस्य राजलक्ष्मीः आसीत्। सा अवदत् — “वत्स ! अहमेतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि। … साम्प्रतं तु देव्या अपराधेनाद्य प्रभृति तृतीये दिवसे राजा पञ्चत्वं यास्यति, तदाहमनाथा भविष्यामि। तदिदानीं नात्र स्थास्यामीति क्रन्दामि।”
हिन्दी अर्थ: वीरवर पूछता है — “हे माता! आप कौन हैं? किसलिए विलाप कर रही हैं?” वह उत्तर देती है — “वत्स! मैं इस राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ। बहुत समय से इसकी भुजाओं की छाया में बड़े सुख से रहती हूँ। किन्तु अब देवी के अपराध के कारण आज से तीसरे दिन राजा मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा, तब मैं अनाथ हो जाऊँगी। इसलिए अब यहाँ नहीं रहूँगी — यही सोचकर रो रही हूँ।”
व्याकरण-सङ्केतः: का त्वमम्ब = का + त्वम् + अम्ब; ‘अम्ब’ सम्बोधन एकवचन (हे माता!)। पञ्चत्वं यास्यति — मुहावरा; ‘पञ्चत्वं गम्/या’ = पाँच महाभूतों में मिल जाना, अर्थात् मरनाविलपसि, क्रन्दामि — लट्-लकार, मध्यमपुरुष / उत्तमपुरुष एकवचन।
प्र3.
वीरवरः — (तदाकर्ण्य प्रणिपत्य) “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?” (पृष्ठ 114)
उत्तर
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः — “अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।”
हिन्दी अर्थ: वीरवर यह सुनकर प्रणाम करके पूछता है — “हे भगवति! क्या यहाँ कोई ऐसा उपाय है जिससे आपका फिर से यहाँ चिरकाल तक निवास हो और स्वामी दीर्घकाल तक जीवित रहें?” राजलक्ष्मी कहती है — “है, वत्स! यहाँ एक ही आचरण (उपाय) है, और वह अत्यन्त कठिन है।”
व्याकरण-सङ्केतः: भगवति — भगवती (स्त्रीलिङ्ग) का सम्बोधन एकवचनभगवत्याःषष्ठी एकवचन (आपका)। एकैवात्र = एका + एव + अत्र (वृद्धि-सन्धि से ‘एकैव’)। प्रणिपत्य, तदाकर्ण्य — ल्यप्-प्रत्ययान्त अव्यय (प्रणाम करके, वह सुनकर)।
प्र4.
वीरवरः — (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) “अम्ब ! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः ?” (पृष्ठ 114)
उत्तर
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः — “श्रूयतां पुत्र ! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।”
हिन्दी अर्थ: “सुनो पुत्र! यदि तुम अपनी सबसे प्रिय वस्तु को हँसते हुए मुख से भगवती सर्वमङ्गला को उपहार-रूप में अर्पित कर दो, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक फिर जीवित रहेगा और मैं भी सुखपूर्वक (यहाँ) निवास करूँगी।” — यही वह ‘दुःसाध्य’ उपाय है, और इसी से पाठ का शीर्षक बनता है: सन्निमित्ते वरं त्यागः (अच्छे निमित्त के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है)।
ध्यातव्यम्: यह कहकर राजलक्ष्मी उसी क्षण उसके सामने से अदृश्य हो गई — ‘(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)’। आगे वीरवर क्या करता है — यह एकादश पाठ ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)’ में है।
व्याकरण-सङ्केतः: क्रियेत — विधिलिङ्, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन (किया जाए)। इसीलिए कर्ता ‘त्वया’ तृतीया में है। भगवत्यै सर्वमङ्गलायैचतुर्थी एकवचन (सम्प्रदान — जिसके लिए उपहार दिया जाए)।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ