दीपकम् अध्याय 10 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
राजा — “किं ते वर्तनम् ?” (पृष्ठ 112)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः — “प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !”
हिन्दी अर्थ: राजा पूछते हैं — “तुम्हारा वेतन (कितना) है?” वीरवर उत्तर देता है — “हे देव! प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ।” सुवर्णशतचतुष्टयम् = सुवर्ण-शत × चतुष्टय = सौ स्वर्णमुद्राओं का चौगुना = 400 स्वर्णमुद्राएँ
व्याकरण-सङ्केतः: ते — युष्मद् शब्द का षष्ठी एकवचन का लघु (अनुदात्त) रूप = ‘तव’ (तुम्हारा)। वर्तनम् — नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा एकवचन; इसी का पर्याय ‘वेतनम्’ पाठ में आगे आता है (वेतनार्पणेन, वेतनार्थिनः)।
प्र2.
राजा — “का ते सामग्री ?” (पृष्ठ 112)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः — “इमौ बाहू, एष खड्गश्च।”
हिन्दी अर्थ: राजा पूछते हैं — “तुम्हारे पास (काम की) सामग्री क्या है?” वीरवर कहता है — “ये दो भुजाएँ और यह तलवार।” वह न सेना गिनाता है, न धन — केवल अपना पुरुषार्थ और अपना शस्त्र। यही उत्तर पूरे पाठ में उसके चरित्र की कुंजी है।
व्याकरण-सङ्केतः: इमौ बाहूप्रथमा द्विवचन (पुंलिङ्ग), क्योंकि भुजाएँ दो हैं; ‘इदम्’ सर्वनाम का द्विवचन ‘इमौ’। एष खड्गश्च = एषः + खड्गः + च (विसर्ग-सन्धि से ‘एष खड्गश्च’); प्रथमा एकवचन, पुंलिङ्ग।
प्र3.
मन्त्री — (तदालोक्य) “देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।” — मन्त्री किम् उपायं सूचयति ?
उत्तर
उत्तरम् — मन्त्री सूचयति यत् चतुर्णां दिनानां वेतनं दत्त्वा प्रथमम् अस्य वेतनार्थिनः राजपुत्रस्य स्वरूपं परीक्ष्यताम् — एतत् वेतनम् उपपन्नम् अस्ति न वा इति ज्ञायताम्।

राजा ने पहले ‘नैतच्छक्यम्’ (यह सम्भव नहीं) कहकर मना कर दिया था और वीरवर प्रणाम करके सभा से निकल गया था। तभी मन्त्री यह बीच का मार्ग सुझाते हैं — चार दिन का वेतन देकर पहले परीक्षा ले लीजिए। मन्त्रियों के इसी वचन से राजा ने ताम्बूल देकर वीरवर को नियुक्त किया — “अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”

हिन्दी अर्थ: “हे देव! चार दिन का वेतन देकर पहले इस वेतन चाहने वाले राजपुत्र का स्वरूप परख लीजिए कि यह वेतन उचित है या नहीं।” — अर्थात् व्यक्ति को उसकी माँग से नहीं, उसके काम से आँका जाए।
ध्यातव्यम्: पाठ में यह वाक्य ‘प्रथमं परीक्ष्यतां’ रूप में छपा है, जबकि अभ्यास-प्रश्न ३ (ग) में वही वाक्य ‘प्रथमम् अवगम्यतां’ रूप में छपा है। दोनों का अर्थ एक ही है — ‘पहले परख लिया जाए / समझ लिया जाए’। दोनों लोट्-लकार, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन के रूप हैं।
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