दीपकम् अध्याय 10 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
१. कर्तव्यनिष्ठाम् अधिकृत्य दश सूक्तीनां श्लोकानां वा सङ्ग्रहणं कुरुत।
उत्तर

करने की विधि: एक पतली कॉपी या चार्ट लीजिए। हर पृष्ठ पर एक सूक्ति/श्लोक इस क्रम में लिखिए — (1) मूल संस्कृत, (2) हिन्दी अर्थ, (3) ग्रन्थ का नाम, (4) एक पंक्ति में यह कि यह सूक्ति कर्तव्यनिष्ठा के बारे में क्या कहती है। श्लोक कहाँ से लें — गीता, यजुर्वेद, हितोपदेश, पञ्चतन्त्र, वाल्मीकि-रामायण, भर्तृहरि का नीतिशतक, चाणक्यनीति। अपनी पाठ्यपुस्तक दीपकम् में ही पाँचवें और दसवें पाठ में कई मिल जाएँगे।

नमूना उत्तर (दश सूक्तयः):

क्रमःसूक्तिः / श्लोकःहिन्दी अर्थस्रोतः
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।यजुर्वेदः ४०.२
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।तेरा अधिकार कर्म में ही है, फलों में कभी नहीं।श्रीमद्भगवद्गीता २.४७
यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्।जैसे छाया और धूप, वैसे ही कर्म और कर्ता सदा जुड़े रहते हैं।पञ्चतन्त्रम्
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति।पहले के कार्य में बाधा डाले बिना जो काम करे, वही कार्य करने योग्य है।वाल्मीकि-रामायणम्
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।हितोपदेशः
परोपकारार्थमिदं शरीरम्।यह शरीर परोपकार के लिए ही है।सुभाषितम् (पाठे)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।आलस्य मनुष्य के शरीर में बैठा हुआ सबसे बड़ा शत्रु है।हितोपदेशः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।महापुरुषों की सफलता उनके सत्त्व (आत्मबल) से होती है, साधनों से नहीं।नीतिशतकम् (भर्तृहरिः)
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।भली प्रकार किए गए दूसरे के धर्म से, गुणरहित अपना धर्म ही श्रेष्ठ है।श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५
१०सन्निमित्ते वरं त्यागः।अच्छे निमित्त के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है।अस्य पाठस्य शीर्षकम्
Tip: प्रत्येक सूक्ति के नीचे दो-तीन पंक्तियों में यह भी लिख दीजिए कि वह वीरवर के किस कार्य पर ठीक बैठती है — जैसे सूक्ति ⑧ ‘क्रियासिद्धिः सत्त्वे…’ वीरवर के उत्तर ‘इमौ बाहू, एष खड्गश्च’ पर बिलकुल सटीक बैठती है। इससे आपकी परियोजना केवल सङ्ग्रह न रहकर विवेचन बन जाएगी।
प्र2.
२. अस्य पाठस्य कृते कानिचन नूतनानि शीर्षकाणि लिखत।
उत्तर

करने की विधि: अच्छा शीर्षक तीन शर्तें पूरी करता है — (1) वह पाठ के मुख्य भाव को पकड़े, केवल घटना को नहीं; (2) वह छोटा हो; (3) उसमें पाठ का कोई महत्त्वपूर्ण पद आए तो और अच्छा। इस पाठ के तीन सम्भावित केन्द्र हैं — वीरवर की कर्तव्यनिष्ठा, स्वामिभक्ति/राष्ट्रभक्ति, और त्याग

नमूना उत्तर (नूतनानि शीर्षकाणि):

संस्कृत-शीर्षकम्हिन्दी अर्थक्यों उपयुक्त
कर्तव्यनिष्ठः वीरवरःकर्तव्यनिष्ठ वीरवरपूरा पाठ वीरवर की कर्तव्यनिष्ठा के चारों ओर घूमता है।
इमौ बाहू, एष खड्गश्चये दो भुजाएँ और यह तलवारपाठ का सबसे यादगार संवाद, जो नायक का पूरा चरित्र एक पंक्ति में कह देता है।
राजलक्ष्म्याः क्रन्दनम्राजलक्ष्मी का क्रन्दनकथा का मोड़ यहीं से आता है; यह शीर्षक जिज्ञासा जगाता है।
स्वामिभक्तेः आदर्शःस्वामिभक्ति का आदर्शपाठ की प्रस्तावना स्वयं कहती है — ‘तस्य स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः’।
अहर्निशं सेवतेदिन-रात सेवा करता हैपाठ का ही पद; वीरवर की अविराम सेवा को सीधे पकड़ता है।
दुःसाध्यः उपायःकठिन उपायक-भाग यहीं समाप्त होता है — शीर्षक आगे की कथा की ओर संकेत करता है।
वेतनार्थी राजपुत्रःवेतन चाहने वाला राजपुत्रकथा के आरम्भ को पकड़ता है और ‘वेतनार्थी’ पाठ का ही शब्द है।
Check it yourself: अपना बनाया हुआ शीर्षक जाँचने का सरल तरीका — उसे पढ़कर पूछिए, “क्या इससे यह पता चलता है कि पाठ किस बारे में है?” यदि उत्तर ‘हाँ’ है और शीर्षक पाँच शब्दों से छोटा है, तो वह अच्छा शीर्षक है।
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