दीपकम् अध्याय 10 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘जीमूतवाहनस्य कथा’ पठित्वा तस्याः सारं लिखत। कथायाः जीमूतवाहनस्य पाठस्य वीरवरेण सह कः साम्यः ?
उत्तर
कथासारः (संस्कृतम्) — पुरा विदेहनगरस्य शुद्धकेतुः नाम धर्मात्मा राजा आसीत्। तस्य पुत्रः जीमूतवाहनः बाल्यकालाद् एव धर्मनिष्ठः, त्यागशीलः, परोपकाररतः, दीनानुकम्पी च आसीत्। सः धर्माचरणं कर्तुं राज्यं त्यक्त्वा वनं गतवान्। एकदा सागरतीरे सः एकं दुःखितं वृद्धं नागम् अपश्यत्। नागः अवदत् यत् प्रतिदिनम् एकः नागः गरुडाय दातव्यः भवति, अद्य च तस्य पुत्रस्य शङ्खचूडस्य क्रमः अस्ति। तदा जीमूतवाहनः शङ्खचूडनागस्य रूपं धृत्वा स्वयं गरुडस्य समीपं गतवान्। गरुडेन भक्ष्यमाणः अपि सः किमपि कष्टं न दर्शितवान्, निश्चलः एव स्थितवान्। तस्य निर्विकारं धैर्यं दृष्ट्वा गरुडः विस्मितः अभवत्, भोजनात् विरतः, सर्वं वृत्तान्तं ज्ञात्वा तं साधुवादेन मुक्तवान्, ‘नागवंशस्य हननात् विरंस्ये’ इति प्रतिज्ञाम् अपि कृतवान्।
हिन्दी सार: प्राचीन काल में विदेहनगर के राजा शुद्धकेतु के पुत्र जीमूतवाहन बचपन से ही धर्मनिष्ठ, त्यागशील, परोपकारी और दीनों पर दया करने वाले थे। वे धर्म-आचरण के लिए राज्य छोड़कर वन चले गए। समुद्र-तट पर उन्होंने एक दुःखी वृद्ध नाग को देखा, जिसका पुत्र शङ्खचूड उस दिन गरुड़ का आहार बनने वाला था। जीमूतवाहन ने शङ्खचूड का रूप धारण करके स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया। खाए जाते समय भी उन्होंने न कोई कष्ट दिखाया, न हिले — अत्यन्तं सहिष्णुतया तत्र निश्चलः स्थितवान्। यह अद्भुत धैर्य देखकर गरुड़ रुक गया, पूरी बात जानकर उन्हें साधुवाद के साथ मुक्त कर दिया और प्रतिज्ञा की कि अब वह नागवंश का वध नहीं करेगा
वीरवरेण सह साम्यम् (वीरवर से समानता): दोनों कथाओं का केन्द्र एक ही है — सन्निमित्ते वरं त्यागः, अर्थात् अच्छे निमित्त के लिए किया गया त्याग ही श्रेष्ठ है।
  • त्याग का पात्र: वीरवर को राजा और राज्यलक्ष्मी के लिए सर्वाधिक प्रिय वस्तु का त्याग करना है; जीमूतवाहन दूसरे के प्राण बचाने के लिए अपना शरीर दे देते हैं।
  • प्रसन्नता से त्याग: राजलक्ष्मी की शर्त थी — ‘सहासवदनेन’; जीमूतवाहन भी ‘किमपि कष्टं न दर्शितवान्’ — मुख पर पीड़ा तक नहीं आने दी।
  • परिणाम: दोनों का त्याग व्यर्थ नहीं जाता — एक से राजा का जीवन बचता है, दूसरे से पूरा नागवंश।
प्र2.
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ — अस्य श्लोकस्य अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — परोपकाराय + फलन्ति + वृक्षाः। परोपकाराय + वहन्ति + नद्यः। परोपकाराय + दुहन्ति + गावः। परोपकार-अर्थम् + इदम् + शरीरम्।

अन्वयः — वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति, नद्यः परोपकाराय वहन्ति, गावः परोपकाराय दुहन्ति, इदं शरीरम् (अपि) परोपकारार्थम् (अस्ति)।

अर्थः — वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फलते हैं, नदियाँ दूसरों के उपकार के लिए बहती हैं, गाएँ दूसरों के उपकार के लिए दूध देती हैं — यह शरीर भी परोपकार के ही लिए है।

भावः — प्रकृति का हर अंग अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए काम करता है — वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती, गाय अपना दूध स्वयं नहीं पीती। इसी क्रम में अन्तिम पंक्ति मनुष्य पर आकर टिकती है: तो फिर यह मानव-शरीर भी परोपकार के लिए ही है। जीमूतवाहन और वीरवर — दोनों इसी सिद्धान्त पर जीते हैं।
अलङ्कारः — अनुप्रास तथा दृष्टान्त। ‘परोपकाराय’ की चार बार आवृत्ति (पदावृत्ति / लाटानुप्रास) श्लोक को गति और बल देती है, और वृक्ष-नदी-गाय के तीन दृष्टान्त अन्तिम कथन को स्वतः सिद्ध कर देते हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘परोपकाराय’ — चतुर्थी एकवचन (प्रयोजन/तादर्थ्य में चतुर्थी)। ‘वृक्षाः, नद्यः, गावः’ — तीनों प्रथमा बहुवचन, इसलिए क्रियाएँ भी बहुवचन में (फलन्ति, वहन्ति, दुहन्ति)।
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