प्र1.
‘जीमूतवाहनस्य कथा’ पठित्वा तस्याः सारं लिखत। कथायाः जीमूतवाहनस्य पाठस्य वीरवरेण सह कः साम्यः ?
उत्तर
कथासारः (संस्कृतम्) — पुरा विदेहनगरस्य शुद्धकेतुः नाम धर्मात्मा राजा आसीत्। तस्य पुत्रः जीमूतवाहनः बाल्यकालाद् एव धर्मनिष्ठः, त्यागशीलः, परोपकाररतः, दीनानुकम्पी च आसीत्। सः धर्माचरणं कर्तुं राज्यं त्यक्त्वा वनं गतवान्। एकदा सागरतीरे सः एकं दुःखितं वृद्धं नागम् अपश्यत्। नागः अवदत् यत् प्रतिदिनम् एकः नागः गरुडाय दातव्यः भवति, अद्य च तस्य पुत्रस्य शङ्खचूडस्य क्रमः अस्ति। तदा जीमूतवाहनः शङ्खचूडनागस्य रूपं धृत्वा स्वयं गरुडस्य समीपं गतवान्। गरुडेन भक्ष्यमाणः अपि सः किमपि कष्टं न दर्शितवान्, निश्चलः एव स्थितवान्। तस्य निर्विकारं धैर्यं दृष्ट्वा गरुडः विस्मितः अभवत्, भोजनात् विरतः, सर्वं वृत्तान्तं ज्ञात्वा तं साधुवादेन मुक्तवान्, ‘नागवंशस्य हननात् विरंस्ये’ इति प्रतिज्ञाम् अपि कृतवान्।
हिन्दी सार: प्राचीन काल में विदेहनगर के राजा शुद्धकेतु के पुत्र जीमूतवाहन बचपन से ही धर्मनिष्ठ, त्यागशील, परोपकारी और दीनों पर दया करने वाले थे। वे धर्म-आचरण के लिए राज्य छोड़कर वन चले गए। समुद्र-तट पर उन्होंने एक दुःखी वृद्ध नाग को देखा, जिसका पुत्र शङ्खचूड उस दिन गरुड़ का आहार बनने वाला था। जीमूतवाहन ने शङ्खचूड का रूप धारण करके स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया। खाए जाते समय भी उन्होंने न कोई कष्ट दिखाया, न हिले — अत्यन्तं सहिष्णुतया तत्र निश्चलः स्थितवान्। यह अद्भुत धैर्य देखकर गरुड़ रुक गया, पूरी बात जानकर उन्हें साधुवाद के साथ मुक्त कर दिया और प्रतिज्ञा की कि अब वह नागवंश का वध नहीं करेगा।
वीरवरेण सह साम्यम् (वीरवर से समानता): दोनों कथाओं का केन्द्र एक ही है — सन्निमित्ते वरं त्यागः, अर्थात् अच्छे निमित्त के लिए किया गया त्याग ही श्रेष्ठ है।
- त्याग का पात्र: वीरवर को राजा और राज्यलक्ष्मी के लिए सर्वाधिक प्रिय वस्तु का त्याग करना है; जीमूतवाहन दूसरे के प्राण बचाने के लिए अपना शरीर दे देते हैं।
- प्रसन्नता से त्याग: राजलक्ष्मी की शर्त थी — ‘सहासवदनेन’; जीमूतवाहन भी ‘किमपि कष्टं न दर्शितवान्’ — मुख पर पीड़ा तक नहीं आने दी।
- परिणाम: दोनों का त्याग व्यर्थ नहीं जाता — एक से राजा का जीवन बचता है, दूसरे से पूरा नागवंश।