पदच्छेदः — कुर्वन् + एव + इह + कर्माणि + जिजीविषेत् + शतम् + समाः। एवम् + त्वयि + न + अन्यथा + इतः + अस्ति + न + कर्म + लिप्यते + नरे।
अन्वयः — इह कर्माणि कुर्वन् एव शतं समाः जिजीविषेत्। एवं (सति) त्वयि नरे कर्म न लिप्यते; इतः अन्यथा (मार्गः) न अस्ति।
अर्थः — इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करने पर तुझ मनुष्य में कर्म का लेप (बन्धन) नहीं लगता। इससे भिन्न कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
भावः — यह श्लोक कहता है कि जीवन की लम्बाई की कामना कर्म से भागकर नहीं, कर्म करते हुए करनी चाहिए। जो व्यक्ति अपना कर्तव्य ईमानदारी से करता रहता है, कर्म उसे बाँधता नहीं। वीरवर इसी का जीवित उदाहरण है — वह ‘धृतायुधः अहर्निशं’ राजद्वार की सेवा करता है, वेतन का बड़ा भाग देवताओं और दरिद्रों को दे देता है, और आधी रात के आदेश पर भी बिना प्रश्न किए चल पड़ता है।
शब्द-सङ्केतः: समाः = वर्षाणि (वर्ष), द्वितीया बहुवचन। जिजीविषेत् = जीवितुम् इच्छेत् — ‘जीव्’ धातु का सन्नन्त रूप, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन। लिप्यते — कर्मवाच्य लट्, ‘लिप्’ धातु (चिपकना, लिपटना)।
सन्धि: कुर्वन्नेवेह = कुर्वन् + एव + इह; जिजीविषेच्छतं = जिजीविषेत् + शतम्; नान्यथेतोऽस्ति = न + अन्यथा + इतः + अस्ति।