कक्षा ८ संस्कृत अध्याय 10 योग्यताविस्तरः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (यजुर्वेदः ४०.२)
उत्तर
पदच्छेदः — कुर्वन् + एव + इह + कर्माणि + जिजीविषेत् + शतम् + समाः। एवम् + त्वयि + न + अन्यथा + इतः + अस्ति + न + कर्म + लिप्यते + नरे।

अन्वयः — इह कर्माणि कुर्वन् एव शतं समाः जिजीविषेत्। एवं (सति) त्वयि नरे कर्म न लिप्यते; इतः अन्यथा (मार्गः) न अस्ति।

अर्थः — इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करने पर तुझ मनुष्य में कर्म का लेप (बन्धन) नहीं लगता। इससे भिन्न कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

भावः — यह श्लोक कहता है कि जीवन की लम्बाई की कामना कर्म से भागकर नहीं, कर्म करते हुए करनी चाहिए। जो व्यक्ति अपना कर्तव्य ईमानदारी से करता रहता है, कर्म उसे बाँधता नहीं। वीरवर इसी का जीवित उदाहरण है — वह ‘धृतायुधः अहर्निशं’ राजद्वार की सेवा करता है, वेतन का बड़ा भाग देवताओं और दरिद्रों को दे देता है, और आधी रात के आदेश पर भी बिना प्रश्न किए चल पड़ता है।
शब्द-सङ्केतः: समाः = वर्षाणि (वर्ष), द्वितीया बहुवचन। जिजीविषेत् = जीवितुम् इच्छेत् — ‘जीव्’ धातु का सन्नन्त रूप, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन। लिप्यते — कर्मवाच्य लट्, ‘लिप्’ धातु (चिपकना, लिपटना)।
सन्धि: कुर्वन्नेवेह = कुर्वन् + एव + इह; जिजीविषेच्छतं = जिजीविषेत् + शतम्; नान्यथेतोऽस्ति = न + अन्यथा + इतः + अस्ति।
प्र2.
यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्। एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥ (पञ्चतन्त्रम्)
उत्तर
पदच्छेदः — यथा + छाया-आतपौ + नित्यम् + सुसंबद्धौ + परस्परम्। एवम् + कर्म + च + कर्ता + च + संश्लिष्टौ + इतरेतरम्।

अन्वयः — यथा छायातपौ नित्यं परस्परं सुसंबद्धौ (स्तः), एवं कर्म च कर्ता च इतरेतरं संश्लिष्टौ (स्तः)।

अर्थः — जैसे छाया और धूप सदा एक-दूसरे से भली प्रकार जुड़े हुए हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता भी परस्पर गुँथे हुए हैं।

भावः — कर्ता अपने कर्म से अलग नहीं हो सकता। जो कर्म हम करते हैं, वही हमारी पहचान बनकर हमारे साथ चलता है — जैसे धूप हो तो छाया अवश्य होगी। इसीलिए कर्म चुनते समय सावधान रहना चाहिए: वीरवर ने जो कर्तव्य-कर्म चुना, वही उसका यश बन गया।
अलङ्कारः — उपमा। ‘यथा… एवम्’ यही उपमा का वाचक है; उपमेय = कर्म और कर्ता, उपमान = छाया और धूप, साधारण धर्म = परस्पर सुसम्बद्ध होना।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘छायातपौ’, ‘सुसंबद्धौ’, ‘संश्लिष्टौ’ — सब द्विवचन में, क्योंकि दोनों जोड़े दो-दो वस्तुओं के हैं। ‘छायातपौ’ द्वन्द्व समास है (छाया च आतपः च)।
प्र3.
कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्। पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥ (वाल्मीकि-रामायणम्)
उत्तर
पदच्छेदः — कार्ये + कर्मणि + निर्वृत्ते + यः + बहूनि + अपि + साधयेत्। पूर्व-कार्य-अविरोधेन + सः + कार्यम् + कर्तुम् + अर्हति।

अन्वयः — यः कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते (सति) पूर्वकार्याविरोधेन बहूनि अपि (कार्याणि) साधयेत्, सः कार्यं कर्तुम् अर्हति।

अर्थः — जो व्यक्ति हाथ में लिया हुआ कार्य पूरा हो जाने पर, पहले किए गए कार्य में बाधा डाले बिना और भी अनेक कार्य सिद्ध कर सके — वही कार्य करने योग्य (सच्चा कार्यकर्ता) है।

भावः — यह श्लोक कार्यकुशलता की परिभाषा देता है — एक काम अधूरा छोड़कर दूसरा उठा लेना कुशलता नहीं; कुशलता है क्रम — पहला पूरा करो, उसमें बाधा न पड़े ऐसे दूसरा उठाओ। वीरवर यही करता है: पहले वह प्रतिदिन की सेवा पूरी करता है, फिर वेतन का बँटवारा, फिर राजा की नई आज्ञा — एक भी कर्तव्य छूटता नहीं।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते’ — यह सति सप्तमी (भावे सप्तमी) का प्रयोग है, अर्थात् ‘कार्य पूरा हो जाने पर’। तीनों पद सप्तमी एकवचन में हैं। कर्तुम् अर्हति = करने योग्य है (तुमुन्नन्त + अर्ह् धातु)।
सन्धि: बहून्यपि = बहूनि + अपि (यण्); कर्तुमर्हति = कर्तुम् + अर्हति।
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