दीपकम् अध्याय 11 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उदाहरणम् — धन्यः अहम् स्वामिजीवितरक्षार्थं विनियुक्तः। → शक्तिधराय ‖ (क) भगवति ! न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा।
उत्तर
उत्तरम् — शूद्रकाय (राज्ञे शूद्रकाय)
कैसे पहचानें: यह वाक्य राजा शूद्रक बोल रहा है — देवी के प्रत्यक्ष होने पर वह साष्टाङ्ग प्रणाम करके कहता है ‘भगवति ! न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा’ (हे भगवति! मुझे न राज्य से प्रयोजन है, न जीवन से)। अतः ‘मे’ (मेरा/मुझे) पद राजा शूद्रक के लिए प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरण-सङ्केतः: उत्तर चतुर्थी एकवचन में देना है (उदाहरण ‘शक्तिधराय’ की तरह) — ‘किसके लिए प्रयुक्त हुआ’। मे — अस्मद् शब्द का षष्ठी/चतुर्थी एकवचन का लघु रूप (= मम / मह्यम्)।
प्र2.
(ख) वत्स ! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि।
उत्तर
उत्तरम् — शूद्रकाय (राज्ञे शूद्रकाय)
कैसे पहचानें: यह देवी सर्वमङ्गला का वचन है और वह ‘वत्स!’ कहकर राजा शूद्रक को सम्बोधित कर रही है। जिन गुणों की वह प्रशंसा कर रही है — सत्त्वोत्कर्ष (सत्त्वगुण की पराकाष्ठा) और भृत्यवात्सल्य (सेवक के प्रति वात्सल्य) — वे राजा के ही गुण हैं, क्योंकि राजा अपने सेवक वीरवर के लिए प्राण देने को तैयार हुआ। अतः ‘ते’ राजा शूद्रक के लिए है।
व्याकरण-सङ्केतः: ते — युष्मद् शब्द का षष्ठी एकवचन लघु रूप (= तव)। प्रीतास्मि = प्रीता + अस्मि।
प्र3.
(ग) धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च।
उत्तर
उत्तरम् — वीरवत्यै
कैसे पहचानें: यह वाक्य वीरवती (वीरवर की पुत्री) बोल रही है — ‘मैं धन्य हूँ, जिसके ऐसे पिता और ऐसा भाई हैं’। ‘यस्याः’ का सम्बन्ध बोलने वाली से ही है, अतः वह पद वीरवती के लिए प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरण-सङ्केतः: उत्तर ‘वीरवती’ का चतुर्थी एकवचनवीरवत्यै (नदी-आदि ई-कारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों की तरह)। वाक्य में यस्याः — षष्ठी एकवचन, स्त्रीलिङ्ग; ईदृशः — ‘इस प्रकार का’ (जनकः का विशेषण, प्रथमा एकवचन)।
प्र4.
(घ) तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम् !
उत्तर
उत्तरम् — शूद्रकाय (राज्ञे शूद्रकाय)
कैसे पहचानें: यह भी राजा शूद्रक का ही स्वगत-कथन है। वीरवर का सपरिवार बलिदान देखकर वह सोचता है — ‘इसे (वीरवर को) खोकर बचे हुए मेरे राज्य से भी क्या लाभ?’ अतः ‘मम’ राजा शूद्रक के लिए है।
व्याकरण-सङ्केतः: मम — अस्मद् शब्द का षष्ठी एकवचनतदेतत्परित्यक्तेन = तत् + एतत् + परित्यक्तेन — तृतीया एकवचन, ‘राज्येन’ का विशेषण।
प्र5.
(ङ) अयम् अपि सपरिवारो जीवतु।
उत्तर
उत्तरम् — वीरवराय (राजपुत्राय वीरवराय)
कैसे पहचानें: यह देवी का आशीर्वचन है। पाठ में पूरा वाक्य है — ‘अयमपि सपरिवारो जयतु राजपुत्र आदर्शचरितो वीरवरः’ — अर्थात् ‘अयम्’ का अर्थ स्वयं पाठ में खुल जाता है : यह आदर्शचरित राजपुत्र वीरवर है। अतः ‘अयम्’ वीरवर के लिए प्रयुक्त हुआ है।
ध्यातव्यम्: पाठ (पृष्ठ 126) में क्रियापद ‘जयतु’ मुद्रित है, जबकि अभ्यास-वाक्य में ‘जीवतु’ छपा है। अर्थ में अन्तर नहीं है — ‘जयशील हो / जीवित रहे’; दोनों लोट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: अयम् — इदम् सर्वनाम, पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन। सपरिवारः = परिवारेण सह वर्तमानः (बहुव्रीहि)।
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