दीपकम् अध्याय 11 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यथा — कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रोत्सर्गेण। → गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो मया स्वपुत्रोत्सर्गेण कृतः। ‖ (क) नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति।
उत्तर
अन्वयः — इदानीं ते राज्यभङ्गः न भविष्यति।
अन्वय कैसे बनता है: संस्कृत का पदविन्यास मुक्त है, पर अन्वय में क्रम होता है — कर्ता/कर्म → अन्य पद → क्रियापद अन्त में। यहाँ सन्धियाँ भी खोल देनी हैं : ‘नेदानीम्’ = न + इदानीम्, ‘राज्यभङ्गस्ते’ = राज्यभङ्गः + ते। कर्ता ‘राज्यभङ्गः’ है, ‘ते’ (= तव) उसका सम्बन्धकारक विशेषण, और ‘न भविष्यति’ क्रिया अन्त में।
हिन्दी अर्थ: अब तुम्हारे राज्य का नाश नहीं होगा। (देवी का राजा शूद्रक को दिया वचन।)
प्र2.
(ख) तेन पातितं स्वशिरः स्वकरस्थखड्गेन।
उत्तर
अन्वयः — तेन स्वकरस्थखड्गेन स्वशिरः पातितम्।
अन्वय कैसे बनता है: यह कर्मवाच्य वाक्य है — कर्ता ‘तेन’ तृतीया में, करण ‘स्वकरस्थखड्गेन’ भी तृतीया में, कर्म ‘स्वशिरः’ प्रथमा में, और ‘पातितम्’ (क्त-प्रत्ययान्त कृदन्त, नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन) कर्म के अनुरूप। अन्वय में क्रम होगा — कर्ता → करण → कर्म → क्रिया।
हिन्दी अर्थ: उसने अपने हाथ में रखे खड्ग से अपना सिर काट गिराया।
ध्यातव्यम्: यह वाक्य पुस्तक के मुद्रित (संक्षिप्त) पाठभाग में नहीं छपा है — यह ‘हितोपदेशः’ की मूल कथा का वह अंश है जिसे पाठ में केवल संकेत से दिखाया गया है (‘गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः’ तथा ‘ततः सः आत्मानमपि देव्यै समर्पितवान्’)। इसी अंश का पद प्रश्न ५ (छ) ‘स्वशिरश्छेदनार्थमुत्क्षिप्तः’ में भी आया है।
प्र3.
(ग) तदा ममायुःशेषेणापि जीवतु राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च।
उत्तर
अन्वयः — तदा राजपुत्रः वीरवरः पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च सह मम आयुःशेषेण अपि जीवतु।
अन्वय कैसे बनता है: ‘ममायुःशेषेणापि’ = मम + आयुःशेषेण + अपि — इसे खोलकर करण-पद के स्थान पर रखा जाता है। कर्ता ‘राजपुत्रः वीरवरः’ को आगे लाकर, ‘सह’ के साथ आने वाले तृतीयान्त पद (पुत्रेण, पत्न्या, दुहित्रा) उसके पास रखे जाते हैं, और क्रिया ‘जीवतु’ अन्त में।
हिन्दी अर्थ: तब मेरी बची हुई आयु से भी राजपुत्र वीरवर पुत्र, पत्नी और पुत्री सहित जीवित हो जाए।
व्याकरण-सङ्केतः: सह के योग में तृतीया विभक्ति आती है — ‘सहयुक्तेऽप्रधाने तृतीया’। जीवतु — लोट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (प्रार्थना)।
प्र4.
(घ) तत्क्षणादेव देवी गताऽदर्शनम्।
उत्तर
अन्वयः — देवी तत्क्षणात् एव अदर्शनं गता।
अन्वय कैसे बनता है: सन्धियाँ खोलिए — ‘तत्क्षणादेव’ = तत्क्षणात् + एव; ‘गताऽदर्शनम्’ = गता + अदर्शनम्। अब कर्ता ‘देवी’ पहले, अपादान-सूचक ‘तत्क्षणात् एव’ उसके बाद, कर्म ‘अदर्शनम्’ और अन्त में क्रिया-रूप ‘गता’।
हिन्दी अर्थ: देवी उसी क्षण अदृश्य हो गईं।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘अदर्शनं गता’ एक मुहावरा है = ‘अदृश्य हो गई’। ‘गम्’ धातु के साथ ‘अदर्शनम्’ द्वितीया में है। गता — क्त-प्रत्ययान्त, स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन।
प्र5.
(ङ) महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय।
उत्तर
अन्वयः — महीपतिः तस्मै राजपुत्राय वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्।
अन्वय कैसे बनता है: ‘महीपतिस्तस्मै’ = महीपतिः + तस्मै। कर्ता ‘महीपतिः’ पहले; फिर सम्प्रदान के तीनों चतुर्थ्यन्त पद एक साथ — ‘तस्मै राजपुत्राय वीरवराय’ (वे तीनों एक ही व्यक्ति के विशेषण हैं); फिर कर्म ‘समग्रकर्णाटप्रदेशम्’; और अन्त में क्रिया ‘प्रायच्छत्’।
हिन्दी अर्थ: राजा ने उस राजपुत्र वीरवर को सम्पूर्ण कर्णाटप्रदेश दे दिया।
व्याकरण-सङ्केतः: प्रायच्छत् = प्र + अयच्छत् (‘दा’ धातु, लङ्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन)।
प्र6.
(च) जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
उत्तर
अन्वयः — मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च।
अन्वय कैसे बनता है: श्लोक में क्रिया आगे और कर्ता पीछे रखा गया है (छन्द के कारण)। गद्य-अन्वय में कर्ता ‘मादृशाः क्षुद्रजन्तवः’ पहले आएगा और दोनों क्रियाएँ ‘जायन्ते च म्रियन्ते च’ अन्त में। यही अन्वय पुस्तक ने भी योग्यताविस्तरः (पृष्ठ 136) में दिया है।
हिन्दी अर्थ: मेरे जैसे तुच्छ प्राणी तो जन्म लेते और मरते ही रहते हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: जायन्ते, म्रियन्ते — दोनों आत्मनेपदी, लट्-लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (कर्ता ‘क्षुद्रजन्तवः’ बहुवचन है)। मादृशाः = मम सदृशाः (मेरे जैसे)।
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