दीपकम् अध्याय 11 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यथा — यद्येवमस्मत्कुलोचितम् = यदि-एवम्-अस्मत्-कुलोचितम् · सत्त्वोत्कर्षेण = सत्त्व-उत्कर्षेण ‖ (क) गृहीतस्वामिवर्तनस्य =
उत्तर
पदच्छेदः — गृहीत-स्वामि-वर्तनस्य
अर्थः: ‘गृहीतम् यत् स्वामिवर्तनम् (स्वामिनः वेतनम्), तस्य’ = स्वामी से लिए हुए वेतन का। यह कर्मधारय-युक्त षष्ठी-तत्पुरुष समास है — गृहीत (विशेषण) + स्वामि-वर्तन (स्वामिनः वर्तनम्)।
प्रयोगः: ‘गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत् ?’ — इसी पद पर पूरा पाठ टिका है : वीरवर वेतन ले चुका है, अब उसे उसका ऋण चुकाना है।
प्र2.
(ख) निस्तारोपायः =
उत्तर
पदच्छेदः — निस्तार-उपायः
सन्धि-नियमः: अ + उ = ओ (गुण सन्धि) — निस्तार + उपायः = निस्तारोपायः। अर्थ — ‘(ऋण से) छुटकारे का उपाय’ (षष्ठी-तत्पुरुष)।
प्र3.
(ग) गृह्यतामेष =
उत्तर
पदच्छेदः — गृह्यताम्-एषः
अर्थः: ‘यह स्वीकार किया जाए’। गृह्यताम् — ‘ग्रह्’ धातु, लोट्-लकार, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन। इसीलिए वाक्य में कर्म ‘उपहारः’ प्रथमा विभक्ति में है — ‘गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः’ (मेरा दिया हुआ यह उपहार स्वीकार कीजिए)।
प्र4.
(घ) स्वपुत्रोत्सर्गेण =
उत्तर
पदच्छेदः — स्व-पुत्र-उत्सर्गेण
सन्धि-नियमः: अ + उ = ओ (गुण सन्धि) — पुत्र + उत्सर्गेण = पुत्रोत्सर्गेण। अर्थ — ‘अपने पुत्र के त्याग से’ — तृतीया एकवचन (करण)।
प्र5.
(ङ) स्वकरस्थखड्गेन =
उत्तर
पदच्छेदः — स्व-कर-स्थ-खड्गेन
अर्थः: ‘अपने हाथ में स्थित खड्ग से’ — तृतीया एकवचन (करण)। ‘स्थ’ = ‘तिष्ठति इति’ (जो स्थित है) — उपपद-तत्पुरुष।
प्र6.
(च) तदेतत्परित्यक्तेन =
उत्तर
पदच्छेदः — तत्-एतत्-परित्यक्तेन
अर्थः: ‘तो इसके (वीरवर के) छूट जाने पर (बचे हुए)’। ‘तत्’ यहाँ अव्यय है (= ‘तो’, ‘इसलिए’); ‘एतत्-परित्यक्तेन’ = इसके द्वारा त्यागे गए / इससे रहित। पूरा वाक्य — ‘तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम्’।
प्र7.
(छ) स्वशिरश्छेदनार्थमुत्क्षिप्तः =
उत्तर
पदच्छेदः — स्व-शिरः-छेदन-अर्थम्-उत्क्षिप्तः
अर्थः: ‘अपना सिर काटने के लिए ऊपर उठाया गया (खड्ग)’। उत्क्षिप्तः = उत्थापितः (उठाया गया) — यह शब्द पृष्ठ 128 की शब्दार्थ-सारणी में भी दिया है।
सन्धि-सङ्केतः: शिरः + छेदन → शिरश्छेदन (विसर्ग-सन्धि: विसर्ग का ‘श्’ में परिवर्तन, क्योंकि आगे ‘छ्’ है)। छेदन + अर्थम् → छेदनार्थम् (दीर्घ सन्धि)। अर्थम् + उत्क्षिप्तः → अर्थमुत्क्षिप्तः (व्यञ्जन-सन्धि)।
प्र8.
(ज) मद्दर्शनादद‍ृश्यताम् =
उत्तर
पदच्छेदः — मत्-दर्शनात्-अदृश्यताम्
अर्थः: ‘मेरे देखने से (मुझे देखते ही) अदृश्य अवस्था को’। ‘मत्-दर्शनात्’ पञ्चमी एकवचन (हेतु/अपादान) है, ‘अदृश्यताम्’ द्वितीया एकवचन — ‘अदृश्यतां गता’ = अदृश्य हो गई।
सन्धि-सङ्केतः: मत् + दर्शनात् = मद्दर्शनात् (जश्त्व सन्धि : त् + द् = द्द्)। दर्शनात् + अदृश्यताम् = दर्शनादद‍ृश्यताम्।
प्र9.
(झ) तत्क्षणादेव =
उत्तर
पदच्छेदः — तत्-क्षणात्-एव
अर्थः: ‘उसी क्षण से / तत्काल ही’। ‘तत्क्षणात्’ पञ्चमी एकवचन है और ‘एव’ अव्यय उसका बल बढ़ाता है।
प्र10.
(ञ) लब्धजीवितः =
उत्तर
पदच्छेदः — लब्ध-जीवितः
अर्थः: ‘जिसने जीवन पुनः प्राप्त कर लिया है, वह’ — यह बहुव्रीहि समास है (विग्रह : लब्धं जीवितं येन सः)। कथा में देवी की कृपा से वीरवर सपरिवार ‘लब्धजीवितः’ हुआ।
व्याकरण-सङ्केतः: लब्ध — ‘लभ्’ धातु + क्त प्रत्यय (कर्मवाच्य कृदन्त)। बहुव्रीहि में समास का अर्थ किसी अन्य पद (यहाँ वीरवर) पर जाता है — यही इसे तत्पुरुष से अलग करता है।
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