प्र1.
यथा — स्व + आवासम् = स्वावासम् ‖ तत् + श्रुत्वा · दुहितरम् + च · धन्यः + अहम् · जीवितम् + च + एव · विलम्बः + तात · कः + अधुना · न + आचरितव्यम् · धन्या + अहम् · निस्तारः + उपायः · वीरवरः + अवदत् · ततः + असौ · ततः + ते
उत्तर
बारहों रिक्तस्थान नीचे भरे गए हैं। तीसरा स्तम्भ बताता है कि कौन-सा सन्धि-नियम लगा, और चौथा स्तम्भ पाठ की वह पंक्ति देता है जिसमें वह सन्धियुक्त पद आया है।
| सन्धि-विच्छेदः | सन्धियुक्तं पदम् | सन्धि-नियमः | पाठे प्रयोगः |
|---|---|---|---|
| स्व + आवासम् | स्वावासम् | दीर्घ (अ + आ = आ) | वीरवरो स्वावासं गत्वा… |
| तत् + श्रुत्वा | तच्छ्रुत्वा | श्चुत्व + छत्व (त् + श् = च् + छ्) | (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) |
| दुहितरम् + च | दुहितरञ्च | परसवर्ण (म् → ञ्, ‘च’ वर्ग के पहले) | पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत् |
| धन्यः + अहम् | धन्योऽहम् | विसर्ग (अः + अ = ओ + ऽ) | धन्योऽहं स्वामिजीवितरक्षार्थं… |
| जीवितम् + च + एव | जीवितञ्चैव | परसवर्ण (म् → ञ्) + वृद्धि (अ + ए = ऐ) | धनानि जीवितञ्चैव परार्थे… |
| विलम्बः + तात | विलम्बस्तात | विसर्ग (अः + त् = अस्, सकार-आदेश) | तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ? |
| कः + अधुना | कोऽधुना | विसर्ग (अः + अ = ओ + ऽ) | तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ? |
| न + आचरितव्यम् | नाचरितव्यम् | दीर्घ (अ + आ = आ) | अस्मत्कुलोचितं नाचरितव्यं तर्हि… |
| धन्या + अहम् | धन्याहम् | दीर्घ (आ + अ = आ) | धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च |
| निस्तारः + उपायः | निस्तारोपायः | विसर्ग/गुण (अः + उ = ओ) | गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारस्य उपायः |
| वीरवरः + अवदत् | वीरवरोऽवदत् | विसर्ग (अः + अ = ओ + ऽ) | (संवाद-सङ्केतः) |
| ततः + असौ | ततोऽसौ | विसर्ग (अः + अ = ओ + ऽ) | ततोऽसौ व्यचिन्तयत्— |
| ततः + ते | ततस्ते | विसर्ग (अः + त् = अस्, सकार-आदेश) | ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गताः |
याद रखने का सूत्र: विसर्ग के बाद अ आए तो ‘ओ ऽ’ (कोऽधुना), अन्य स्वर आए तो केवल ‘ओ’ (निस्तारोपायः), और त् / थ् आए तो विसर्ग ‘स्’ बन जाता है (ततस्ते, विलम्बस्तात)। ‘म्’ के बाद वर्ग-व्यञ्जन आए तो ‘म्’ उसी वर्ग का पञ्चम वर्ण बन जाता है — च वर्ग के पहले ञ् (दुहितरञ्च)।