दीपकम् अध्याय 11 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
शूद्रकोऽपि · पुनर्भूपालेन · महीपतिस्तस्मै · प्रायच्छत् · नृपतिरपि · सर्वेषामदृश्य · वार्ताऽन्या · राज्यभङ्गस्ते · गतिर्गन्तव्या · इत्युक्त्वा · नेदानीं · प्रीतास्मि
उत्तर

यह प्रश्न 6 (क) का उल्टा है — यहाँ जुड़े हुए पद को तोड़ना है।

सन्धियुक्तं पदम्सन्धिच्छेदःसन्धि-नियमः
शूद्रकोऽपिशूद्रकः + अपिविसर्ग (अः + अ = ओ + ऽ)
पुनर्भूपालेनपुनः + भूपालेनविसर्ग → र् (घोष व्यञ्जन ‘भ्’ के पहले)
महीपतिस्तस्मैमहीपतिः + तस्मैविसर्ग → स् (‘त्’ के पहले)
प्रायच्छत्प्र + अयच्छत्दीर्घ (अ + अ = आ)
नृपतिरपिनृपतिः + अपिविसर्ग → र् (इः + अ = इर्)
सर्वेषामदृश्यसर्वेषाम् + अदृश्यव्यञ्जन-सन्धि (म् + अ)
वार्ताऽन्यावार्ता + अन्यादीर्घ (आ + अ = आ); पुस्तक में लुप्त ‘अ’ अवग्रह ‘ऽ’ से दिखाया गया है
राज्यभङ्गस्तेराज्यभङ्गः + तेविसर्ग → स् (‘त्’ के पहले)
गतिर्गन्तव्यागतिः + गन्तव्याविसर्ग → र् (घोष व्यञ्जन ‘ग्’ के पहले)
इत्युक्त्वाइति + उक्त्वायण् (इ + उ = य् + उ)
नेदानीम्न + इदानीम्गुण (अ + इ = ए)
प्रीतास्मिप्रीता + अस्मिदीर्घ (आ + अ = आ)
अवग्रह (ऽ) क्या बताता है: ‘शूद्रकोऽपि’ और ‘वार्ताऽन्या’ में जो ‘ऽ’ चिह्न है, वह यह बताता है कि यहाँ एक ‘अ’ लुप्त हो गया है। सन्धिच्छेद करते समय उसे लौटा देना होता है — इसीलिए उत्तर ‘शूद्रकः + पि’ और ‘वार्ता + न्या’ बनते हैं।
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