प्र1.
शूद्रकोऽपि · पुनर्भूपालेन · महीपतिस्तस्मै · प्रायच्छत् · नृपतिरपि · सर्वेषामदृश्य · वार्ताऽन्या · राज्यभङ्गस्ते · गतिर्गन्तव्या · इत्युक्त्वा · नेदानीं · प्रीतास्मि
उत्तर
यह प्रश्न 6 (क) का उल्टा है — यहाँ जुड़े हुए पद को तोड़ना है।
| सन्धियुक्तं पदम् | सन्धिच्छेदः | सन्धि-नियमः |
|---|---|---|
| शूद्रकोऽपि | शूद्रकः + अपि | विसर्ग (अः + अ = ओ + ऽ) |
| पुनर्भूपालेन | पुनः + भूपालेन | विसर्ग → र् (घोष व्यञ्जन ‘भ्’ के पहले) |
| महीपतिस्तस्मै | महीपतिः + तस्मै | विसर्ग → स् (‘त्’ के पहले) |
| प्रायच्छत् | प्र + अयच्छत् | दीर्घ (अ + अ = आ) |
| नृपतिरपि | नृपतिः + अपि | विसर्ग → र् (इः + अ = इर्) |
| सर्वेषामदृश्य | सर्वेषाम् + अदृश्य | व्यञ्जन-सन्धि (म् + अ) |
| वार्ताऽन्या | वार्ता + अन्या | दीर्घ (आ + अ = आ); पुस्तक में लुप्त ‘अ’ अवग्रह ‘ऽ’ से दिखाया गया है |
| राज्यभङ्गस्ते | राज्यभङ्गः + ते | विसर्ग → स् (‘त्’ के पहले) |
| गतिर्गन्तव्या | गतिः + गन्तव्या | विसर्ग → र् (घोष व्यञ्जन ‘ग्’ के पहले) |
| इत्युक्त्वा | इति + उक्त्वा | यण् (इ + उ = य् + उ) |
| नेदानीम् | न + इदानीम् | गुण (अ + इ = ए) |
| प्रीतास्मि | प्रीता + अस्मि | दीर्घ (आ + अ = आ) |
अवग्रह (ऽ) क्या बताता है: ‘शूद्रकोऽपि’ और ‘वार्ताऽन्या’ में जो ‘ऽ’ चिह्न है, वह यह बताता है कि यहाँ एक ‘अ’ लुप्त हो गया है। सन्धिच्छेद करते समय उसे लौटा देना होता है — इसीलिए उत्तर ‘शूद्रकः + अपि’ और ‘वार्ता + अन्या’ बनते हैं।