दीपकम् अध्याय 11 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्। (ख) पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्। (ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’? (घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत्। (ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता। सा नारी अदृश्या अभवत्। (च) भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः। (छ) वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।
उत्तर
घटनानुसारं क्रमः — (घ) → (ख) → (छ) → (क) → (च) → (ग) → (ङ)

पूरा क्रम वाक्यों सहित :

क्रमःकथनम्हिन्दी में क्या हुआ
१. (घ)वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत्।वीरवर घर जाकर पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाता है और सारी बात बताता है।
२. (ख)पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।पिता की बात सुनकर शक्तिधर प्रसन्नता से अपने समर्पण के लिए तैयार हो जाता है।
३. (छ)वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।सब सर्वमङ्गला के मन्दिर जाते हैं और वीरवर परिवार सहित सर्वस्व अर्पित कर देता है।
४. (क)सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।छिपकर सब देख रहा राजा शूद्रक भी अपना सर्वस्व देने को तैयार हो जाता है।
५. (च)भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः।भगवती प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा से सब जीवित हो जाते हैं।
६. (ग)प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’?अगले दिन सुबह राजा वीरवर से पूछता है — “कल रात क्या हुआ?”
७. (ङ)वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता। सा नारी अदृश्या अभवत्।वीरवर कहता है — “स्वामिन्! कोई बात नहीं। वह स्त्री अदृश्य हो गई।”
क्रम कैसे तय हुआ: कथा की कड़ियाँ कारण-कार्य से जुड़ी हैं — बात बताना पहले होगा, तभी शक्तिधर सुनकर तैयार होगा (‘पितुः वार्तां श्रुत्वा’)। समर्पण के बाद ही राजा ‘सर्वं दृष्ट्वा’ तैयार होता है। देवी का प्रसन्न होना और सबका जीवित होना उसके बाद है। ‘प्रातः’ और ‘ह्यः रात्रौ’ शब्द बताते हैं कि (ग) अगले दिन का है, और (ङ) उसका उत्तर होने से अन्त में आएगा।
ध्यातव्यम्: पाठ में राजा का प्रश्न ‘का वार्ता राजपुत्र !’ रूप में छपा है, जबकि अभ्यास-वाक्य (ग) में वही प्रश्न ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत् ?’ रूप में विस्तार से दिया गया है — अर्थ एक ही है।
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