दीपकम् अध्याय 11 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
श्लोकः १ — धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्। सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥ १॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — धनानि · जीवितम् · च · एव · परार्थे · प्राज्ञः · उत्सृजेत् · सन्निमित्ते · वरम् · त्यागः · विनाशे · नियते · सति।
अन्वयः — प्राज्ञः धनानि जीवितम् चैव परार्थे उत्सृजेत्। विनाशे नियते सति सन्निमित्ते त्यागो वरम्।
अर्थः (शब्दशः) — प्राज्ञः = बुद्धिमान् व्यक्ति · धनानि = धन-सम्पत्तियाँ · जीवितम् च एव = और जीवन भी · परार्थे = दूसरों के लिए · उत्सृजेत् = त्याग देना चाहिए ‖ विनाशे नियते सति = (शरीर का) नाश तो निश्चित ही है, ऐसी स्थिति में · सन्निमित्ते = किसी अच्छे कारण/प्रयोजन पर · त्यागः = त्याग करना · वरम् = श्रेष्ठ है।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — परोपकारार्थं बुद्धिमान् सम्पदां जीवनं च त्यक्तुं सिद्धः भवेत्। यतः शरीरस्य नाशः तु भवति एव। अतः तस्य सत्कार्यार्थं त्यागः श्रेष्ठः खलु।
भावः (हिन्दी में): शरीर और सम्पत्ति दोनों नाशवान् हैं — देर-सबेर दोनों जाएँगे ही। जब जाना निश्चित है, तो प्रश्न केवल इतना बचता है कि वे किस काम आएँ। बुद्धिमान् वही है जो उन्हें यों ही नष्ट होने देने के बजाय किसी सत्कार्य के निमित्त स्वयं अर्पित कर दे। यही ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः’ है — और यही पूरे पाठ का शीर्षक और प्राण है।
प्रसङ्गः: यह श्लोक शक्तिधर कहता है (पृष्ठ 125), जब वह अपने पिता से कहता है कि स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए उसका उपयोग हो तो वह धन्य है — ‘यतः — धनानि जीवितञ्चैव…’।
व्याकरण-सङ्केतः: विनाशे नियते सतिसति सप्तमी (भावे सप्तमी) का सुन्दर उदाहरण = ‘नाश के निश्चित होने पर’। उत्सृजेत् — विधिलिङ् (चाहिए)। जीवितञ्चैव = जीवितम् + च + एव।
पाठ-सूचना: पुस्तक में भावार्थ का पहला शब्द ‘परोपराकार्थं’ छपा है; शुद्ध रूप परोपकारार्थम् है।
प्र2.
श्लोकः २ — जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः। अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति॥ २॥ — अस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — जायन्ते · च · म्रियन्ते · च · मादृशाः · क्षुद्रजन्तवः · अनेन · सदृशः · लोके · न · भूतः · न · भविष्यति।
अन्वयः — मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च। लोके अनेन सदृशः न भूतः न भविष्यति च।
अर्थः (शब्दशः) — मादृशाः = मेरे जैसे · क्षुद्रजन्तवः = तुच्छ प्राणी · जायन्ते च म्रियन्ते च = जन्म लेते और मरते रहते हैं ‖ लोके = संसार में · अनेन सदृशः = इसके (वीरवर के) समान (व्यक्ति) · न भूतः = न हुआ · न भविष्यति = न होगा।
भावार्थः (पुस्तकानुसारम्) — मत्सदृशाः अल्पाः जन्म मृत्युं च प्राप्नुवन्ति। एतादृशः जनः तु लोके पूर्वं न जातः न अग्रे भविष्यति च।
भावः (हिन्दी में): यह राजा शूद्रक का स्वगत-कथन है, और इसका बल तुलना में है। एक ओर ‘मेरे जैसे क्षुद्र प्राणी’ — जिनका जन्म-मरण संसार में कोई अन्तर नहीं लाता; दूसरी ओर वीरवर — जिसके जैसा न कभी हुआ, न होगा। राजा होकर भी वह स्वयं को छोटा और अपने सेवक को अतुलनीय कह रहा है — यही उसका ‘सत्त्वोत्कर्ष’ है, जिस पर आगे देवी प्रसन्न होती हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: जायन्ते, म्रियन्ते — आत्मनेपदी, लट्-लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन। मादृशाः = ‘मम सदृशाः’ (मेरे जैसे) — ‘अस्मद् + दृश्’ से बना विशेषण। सदृश के योग में तृतीया — इसीलिए ‘अनेन सदृशः’। न भूतः — ‘भू’ धातु का क्तान्त रूप (भूतकाल), न भविष्यति — लृट्-लकार (भविष्यत्काल); एक ही पंक्ति में तीनों काल का संकेत मिलता है।
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