प्र1.
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदन-ताप-ताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ — अस्य अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
अन्वयः — यथा कनकं चतुर्भिः निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः परीक्ष्यते, तथा पुरुषः चतुर्भिः कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) परीक्ष्यते।
अर्थः — जैसे सोना चार कसौटियों से परखा जाता है — निघर्षण (कसौटी पर घिसना), छेदन (काटना), ताप (आग में तपाना) और ताडन (हथौड़े से पीटना) — वैसे ही मनुष्य भी चार बातों से परखा जाता है : कुल (वंश-परम्परा), शील (चरित्र, स्वभाव), गुण (योग्यता) और कर्म (उसके काम)।
भावः: उपमा का बल यह है कि सोने की चारों परीक्षाएँ कठिन हैं — घिसना, काटना, तपाना, पीटना। सच्चा सोना उनसे बिगड़ता नहीं, निखरता है। वैसे ही मनुष्य की परख भी सुख में नहीं, कठिनाई में होती है। यह सुभाषित पाठ के साथ इसीलिए दिया गया है : वीरवर की परीक्षा ‘चार दिन के वेतन’ से आरम्भ हुई थी और उस रात के संकट में उसका ‘कुल, शील, गुण और कर्म’ — चारों खरे उतरे।
अलङ्कारः: ‘यथा … तथा’ से बना दृष्टान्त/उपमा अलङ्कार — उपमेय ‘पुरुषः’, उपमान ‘कनकम्’, साधारण धर्म ‘परीक्ष्यते’।
व्याकरण-सङ्केतः: परीक्ष्यते — कर्मवाच्य क्रियापद (परि + ईक्ष् + य + ते), लट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन; इसीलिए कर्म ‘कनकम्/पुरुषः’ प्रथमा में और करण ‘चतुर्भिः … ताडनैः’ तृतीया में है — यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का कर्मवाच्य-नियम है।
व्याकरण-सङ्केतः: परीक्ष्यते — कर्मवाच्य क्रियापद (परि + ईक्ष् + य + ते), लट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन; इसीलिए कर्म ‘कनकम्/पुरुषः’ प्रथमा में और करण ‘चतुर्भिः … ताडनैः’ तृतीया में है — यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का कर्मवाच्य-नियम है।