दीपकम् अध्याय 11 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदन-ताप-ताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥ — अस्य अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
अन्वयः — यथा कनकं चतुर्भिः निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः परीक्ष्यते, तथा पुरुषः चतुर्भिः कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) परीक्ष्यते।
अर्थः — जैसे सोना चार कसौटियों से परखा जाता है — निघर्षण (कसौटी पर घिसना), छेदन (काटना), ताप (आग में तपाना) और ताडन (हथौड़े से पीटना) — वैसे ही मनुष्य भी चार बातों से परखा जाता है : कुल (वंश-परम्परा), शील (चरित्र, स्वभाव), गुण (योग्यता) और कर्म (उसके काम)।
भावः: उपमा का बल यह है कि सोने की चारों परीक्षाएँ कठिन हैं — घिसना, काटना, तपाना, पीटना। सच्चा सोना उनसे बिगड़ता नहीं, निखरता है। वैसे ही मनुष्य की परख भी सुख में नहीं, कठिनाई में होती है। यह सुभाषित पाठ के साथ इसीलिए दिया गया है : वीरवर की परीक्षा ‘चार दिन के वेतन’ से आरम्भ हुई थी और उस रात के संकट में उसका ‘कुल, शील, गुण और कर्म’ — चारों खरे उतरे।
अलङ्कारः: ‘यथा … तथा’ से बना दृष्टान्त/उपमा अलङ्कार — उपमेय ‘पुरुषः’, उपमान ‘कनकम्’, साधारण धर्म ‘परीक्ष्यते’।
व्याकरण-सङ्केतः: परीक्ष्यतेकर्मवाच्य क्रियापद (परि + ईक्ष् + य + ते), लट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन; इसीलिए कर्म ‘कनकम्/पुरुषः’ प्रथमा में और करण ‘चतुर्भिः … ताडनैः’ तृतीया में है — यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का कर्मवाच्य-नियम है।
प्र2.
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ — अस्य अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — कर्मणि · एव · अधिकारः · ते · मा · फलेषु · कदाचन। मा · कर्मफलहेतुः · भूः · मा · ते · सङ्गः · अस्तु · अकर्मणि।
अन्वयः — ते कर्मणि एव अधिकारः, फलेषु कदाचन मा (अधिकारः)। कर्मफलहेतुः मा भूः। ते अकर्मणि सङ्गः मा अस्तु।
अर्थः — तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फलों पर कभी नहीं। तुम कर्मफल के कारण मत बनो (अर्थात् फल की इच्छा से कर्म मत करो), और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
भावः: यह श्रीमद्भगवद्गीता (२.४७) का प्रसिद्ध श्लोक है और इसमें दो चेतावनियाँ हैं, एक नहीं। पहली — फल की आसक्ति मत रखो। दूसरी, जो प्रायः भुला दी जाती है — ‘फल नहीं मिलेगा’ यह सोचकर काम छोड़ भी मत दो (‘मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि’)। वीरवर इसी का जीवित उदाहरण है : उसने कर्तव्य किया, और अगले दिन उसका श्रेय तक नहीं लिया — ‘न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन्’।
व्याकरण-सङ्केतः: मा निषेधार्थक अव्यय है और इसके साथ प्रायः लुङ् (अद्यतन भूत) का रूप ‘अ’ के बिना आता है — ‘मा भूः’ (मत होओ), ‘मा अस्तु’ (न हो)। कर्मण्येव = कर्मणि + एव (यण् सन्धि)। सङ्गोऽस्तु = सङ्गः + अस्तु।
प्र3.
यो हि स्वधर्मनिरतः स तेजस्वी भवेदिह। विना स्वधर्मान्न सुखं स्वधर्मो हि परं तपः॥ — अस्य अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — यः · हि · स्वधर्मनिरतः · सः · तेजस्वी · भवेत् · इह। विना · स्वधर्मात् · न · सुखम् · स्वधर्मः · हि · परम् · तपः।
अन्वयः — यः हि स्वधर्मनिरतः (भवति), सः इह तेजस्वी भवेत्। स्वधर्मात् विना सुखं न (भवति)। स्वधर्मः हि परं तपः (अस्ति)।
अर्थः — जो अपने धर्म (कर्तव्य) में लगा रहता है, वही इस संसार में तेजस्वी होता है। अपने कर्तव्य के बिना सुख नहीं मिलता। अपना कर्तव्य ही सबसे बड़ा तप है।
भावः: ‘तेज’ यहाँ रूप या बल का नहीं, चरित्र की आभा का नाम है — वह जो वीरवर के मुख पर तब भी है जब वह द्वार पर अकेला खड़ा है। श्लोक कहता है कि यह आभा किसी विशेष तपस्या से नहीं, अपने ही कर्तव्य को पूरी निष्ठा से करने से आती है। वीरवर का ‘स्वधर्म’ था — लिया हुआ वेतन सार्थक करना; उसी को उसने ‘परं तपः’ बना दिया।
व्याकरण-सङ्केतः: विना के योग में तृतीया, द्वितीया अथवा पञ्चमी — तीनों विभक्तियाँ चलती हैं; यहाँ पञ्चमी है — ‘स्वधर्मात् विना’ (मुद्रित रूप ‘स्वधर्मान्न’ = स्वधर्मात् + न)। भवेदिह = भवेत् + इह (जश्त्व सन्धि)। भवेत् — विधिलिङ्।
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