प्र1.
धातोरर्थान्तरे वृत्ते धात्वर्थेनोपसङ्ग्रहात्। प्रसिद्धेरविविक्षातः धातोरकर्मिका क्रिया॥ — अकर्मकधातोः लक्षणं स्पष्टीकुरुत।
उत्तर
अन्वयः — धातोः अर्थान्तरे वृत्ते, धात्वर्थेन उपसङ्ग्रहात्, प्रसिद्धेः, अविवक्षातः (च) धातोः क्रिया अकर्मिका (भवति)।
अर्थः — धातु की क्रिया चार कारणों से अकर्मक (कर्म-रहित) हो जाती है —
१. अर्थान्तरे वृत्ते — धातु जब अपने मूल अर्थ को छोड़कर दूसरे अर्थ में चले (जैसे ‘वर्तते’ = होना/रहना)।
२. धात्वर्थेनोपसङ्ग्रहात् — कर्म धातु के अर्थ में ही समा जाए (जैसे ‘जीवति’ में ‘जीवन’ अलग कर्म नहीं बचता)।
३. प्रसिद्धेः — कर्म इतना प्रसिद्ध हो कि उसे कहने की आवश्यकता ही न रहे।
४. अविवक्षातः — वक्ता कर्म को कहना ही न चाहे (विवक्षा न हो)।
१. अर्थान्तरे वृत्ते — धातु जब अपने मूल अर्थ को छोड़कर दूसरे अर्थ में चले (जैसे ‘वर्तते’ = होना/रहना)।
२. धात्वर्थेनोपसङ्ग्रहात् — कर्म धातु के अर्थ में ही समा जाए (जैसे ‘जीवति’ में ‘जीवन’ अलग कर्म नहीं बचता)।
३. प्रसिद्धेः — कर्म इतना प्रसिद्ध हो कि उसे कहने की आवश्यकता ही न रहे।
४. अविवक्षातः — वक्ता कर्म को कहना ही न चाहे (विवक्षा न हो)।
यह पाठ में क्यों दिया गया है: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में भाववाच्य पढ़ाया गया है, और भाववाच्य केवल अकर्मक धातुओं का होता है। तो प्रश्न उठता है — कोई धातु अकर्मक होती कैसे है? यह श्लोक उसी का उत्तर देता है। पुस्तक ने पृष्ठ 130 पर जो सूची दी थी — हस्, क्रन्द्, स्था, स्ना, शी, भू — वे सदा अकर्मक धातुएँ हैं; इसीलिए ‘बालकेन हस्यते’, ‘मया हस्यते’ जैसे भाववाच्य रूप बनते हैं और क्रिया कभी नहीं बदलती।
पाठ-सूचना: पुस्तक में ‘अविविक्षातः’ छपा है; व्याकरण-परम्परा में शुद्ध रूप अविवक्षातः (विवक्षा = कहने की इच्छा) है। साथ ही अन्तिम चरण पुस्तक में ‘धातोरकर्मिका क्रिया’ है (कुछ पाठों में ‘कर्मणोऽकर्मिका क्रिया’ मिलता है) — अर्थ में अन्तर नहीं।