दीपकम् अध्याय 11 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठस्य कथाधारेण सरलसंस्कृतेन एकं नाटकं रचयत तस्य मञ्चनं च कुरुत।
उत्तर

यह करके सीखने वाला कार्य है — इसका उत्तर कागज़ पर नहीं, कक्षा के मंच पर बनता है। नीचे पहले विधि, फिर अच्छे नाटक में क्या-क्या होना चाहिए, और अन्त में एक नमूना दृश्य दिया गया है जिसे आप बढ़ा सकते हैं।

विधिः (कैसे करें) —
१. पात्र-चयनम् — सूत्रधारः, वीरवरः, वेदरता, शक्तिधरः, वीरवती, राजा शूद्रकः, देवी सर्वमङ्गला। (सूत्रधार कथा को जोड़ता रहता है — इससे लम्बे गद्यभाग मंच पर सरल हो जाते हैं।)
२. दृश्य-विभाजनम् — दृश्य १ : वीरवरस्य गृहम् (रात्रौ, परिवारं प्रबोधयन्)। दृश्य २ : सर्वमङ्गलायाः देवालयः (समर्पणम्)। दृश्य ३ : देव्याः प्राकट्यम् (वरदानम्)। दृश्य ४ : प्रातःकाले राजद्वारम् (राजा-वीरवर-संवादः)।
३. संवाद-लेखनम् — पाठ के संवाद जैसे के तैसे लीजिए (‘हे पितः ! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु’), और जहाँ गद्य है वहाँ छोटे-छोटे सरल वाक्य बनाइए।
४. रङ्गसङ्केताः — कोष्ठक में — (सानन्दम्), (स्वगतम्), (साष्टाङ्गं प्रणिपत्य), (तं वीक्ष्य)।
५. मञ्चनम् — सरल वेशभूषा (धोती/उत्तरीय), काठ का खड्ग, दीपक, देवी-प्रतिमा का चित्र; अभ्यास के बाद कक्षा में प्रस्तुति।
अच्छे नाटक में ये पाँच बातें अवश्य हों: (१) कथा का पूरा क्रम — गृह → देवालय → वरदान → प्रातःकालीन संवाद; (२) दोनों श्लोक अपने ठीक स्थान पर (श्लोक १ शक्तिधर के मुख से, श्लोक २ राजा के स्वगत में); (३) प्रत्येक पात्र का अपना स्वर — शक्तिधर का उत्साह, वेदरता का कुलधर्म-बोध, वीरवती का गर्व, राजा का पश्चात्ताप-मिश्रित विस्मय; (४) अन्त में वीरवर का मौन — ‘न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन्’ — यही नाटक का चरम है; (५) सरल संस्कृत — लम्बे समासों के स्थान पर छोटे वाक्य।
नमूना दृश्यम् (नमूना उत्तर — दृश्यम् १, संक्षेपेण) —
सूत्रधारः — अद्य कृष्णचतुर्दशी। अर्धरात्रौ वीरवरः स्वावासं प्रत्यागच्छति।
वीरवरः — (पत्नीं पुत्रं दुहितरं च प्रबोधयन्) उत्तिष्ठत ! शृणुत ! अद्य रात्रौ राजलक्ष्म्या सह मम संवादः अभवत्।
वेदरता — (निद्रालसा) किम् अभवत् आर्यपुत्र ?
वीरवरः — राजा शूद्रकः तृतीये दिवसे पञ्चत्वं यास्यति। एकः एव उपायः — सर्वतः प्रियस्य वस्तुनः देव्यै समर्पणम्।
शक्तिधरः — (सानन्दम्) हे पितः ! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु। तद् अहमेव। तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ?
वेदरता — यद्येवम् अस्मत्कुलोचितं नाचरितव्यं, तर्हि गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत् ?
वीरवती — धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च। तत् कथं विलम्ब्यते ?
सर्वे — (उत्थाय) गच्छामः सर्वमङ्गलायाः आयतनम्।
(पटाक्षेपः)
सङ्केतः: मंच पर बलिदान का दृश्य प्रत्यक्ष न दिखाएँ — संस्कृत नाट्यपरम्परा में भी वध, मृत्यु आदि मंच पर नहीं दिखाए जाते। दीपक बुझाकर, पर्दा गिराकर अथवा सूत्रधार के एक वाक्य से उसे सूचित करें — जैसे ‘(ततः सः आत्मानमपि देव्यै समर्पितवान्।)’। यही पुस्तक ने भी किया है।
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