दीपकम् अध्याय 11 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
राजा (असौ) — “तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम् ?” — एतत् कः, कदा च अवदत् ? (पृष्ठ 126)
उत्तर
उत्तरम् — एतत् राजा शूद्रकः स्वगतम् अचिन्तयत् — वीरवरस्य सपरिवारं सर्वस्वसमर्पणं गुप्ततया दृष्ट्वा। सः व्यचिन्तयत् — “जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः। अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति॥ तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम्।” ततः देवीं प्रति प्रकटयन् अवदत् — “हे मातः ! सर्वमङ्गले ! गृहाण मे सर्वस्वम्। नेष्टं मे राज्यं न च जीवितं वा।”
हिन्दी अर्थ: “मेरे जैसे तुच्छ प्राणी तो जन्मते और मरते ही रहते हैं; इसके (वीरवर के) समान न कोई संसार में हुआ है, न होगा। तो फिर इसे (वीरवर को) खोकर बचे हुए मेरे राज्य से भी क्या प्रयोजन ?” — और फिर देवी के सामने प्रकट होकर बोला — “हे माता सर्वमङ्गले! मेरा सर्वस्व ले लीजिए। मुझे न राज्य चाहिए, न जीवन।”
भावः: पाठ का सन्तुलन यहीं बनता है — सेवक ने स्वामी के लिए प्राण दिए, तो स्वामी भी सेवक के लिए प्राण देने को तैयार है। इसी ‘सत्त्वोत्कर्ष’ और ‘भृत्यवात्सल्य’ पर देवी प्रसन्न होती हैं।
व्याकरण-सङ्केतः: तदेतत्परित्यक्तेन = तत् + एतत् + परित्यक्तेन (तृतीया एकवचन)। राज्येनापि = राज्येन + अपि। नेष्टम् = न + इष्टम् (गुण सन्धि)।
प्र2.
देवी — “वत्स ! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि।” — देवी केन प्रसन्ना अभवत्, किं च वरम् अयच्छत् ? (पृष्ठ 126)
उत्तर
उत्तरम् — देवी सर्वमङ्गला राज्ञः शूद्रकस्य सत्त्वोत्कर्षेण (सत्त्वगुणस्य पराकाष्ठया) भृत्यवात्सल्येन च प्रसन्ना अभवत्। सा प्रत्यक्षीभूता राज्ञः करं धृत्वा अवदत् — “वत्स ! प्रसन्ना भवामि त्वयि, अलं साहसेन। नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति।” … “तद् गच्छ, विजयी भव। अयमपि सपरिवारो जयतु राजपुत्र आदर्शचरितो वीरवरः।”

राजा ने पहले यह प्रार्थना की थी — ‘यदि मयि कृपा भगवत्या जाता, तदा ममायुःशेषेणापि प्रत्यावर्तेत राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च’ (यदि मुझ पर कृपा है, तो मेरी बची हुई आयु से भी वीरवर पुत्र, पत्नी और पुत्री सहित लौट आए)। देवी ने ठीक वही वर दिया — वीरवर सपरिवार जीवित हो गया, राजा का राज्य भी बचा रहा।

हिन्दी अर्थ: “वत्स! तुम्हारे इस सत्त्वगुण की पराकाष्ठा से और सेवक के प्रति वात्सल्य से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। अब जाओ, विजयी हो। यह आदर्श चरित्र वाला राजपुत्र वीरवर भी परिवार सहित जयशील हो।”
व्याकरण-सङ्केतः: प्रीतास्मि = प्रीता + अस्मि (दीर्घ सन्धि)। नेदानीम् = न + इदानीम् (गुण सन्धि)। राज्यभङ्गस्ते = राज्यभङ्गः + ते (विसर्ग-सन्धि)। ते — युष्मद् का षष्ठी एकवचन लघु रूप = ‘तव’।
प्र3.
राजा — (तं वीक्ष्य) “का वार्ता राजपुत्र !” — वीरवरः किम् उत्तरम् अयच्छत्, ततः किम् अभवत् ? (पृष्ठ 126)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “देव ! सा रोदनपरा नारी मद्दर्शनादद‍ृश्यतां गता। न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन् !” ततः परमां प्रीतिं गतो महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय।

अगले दिन (अन्येद्युः) वीरवर फिर द्वार पर सेवा में लगा था। राजा ने उसे देखकर पूछा — “क्या समाचार है, राजपुत्र?” वीरवर ने केवल इतना कहा कि रोती हुई वह स्त्री मुझे देखते ही अदृश्य हो गई; और कोई बात नहीं है, स्वामिन्! — अपने और अपने परिवार के बलिदान की एक भी बात उसने नहीं कही।

यही उत्तर पाठ का शिखर है: उपकार करके उसे गिनाना उपकार को छोटा कर देता है। वीरवर का मौन ही उसका सबसे बड़ा गुण सिद्ध होता है — और राजा, जो सब कुछ छिपकर देख चुका था, अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे समग्र कर्णाटप्रदेश दे देता है।
व्याकरण-सङ्केतः: मद्दर्शनादद‍ृश्यताम् = मत् + दर्शनात् + अदृश्यताम्। वार्ताऽन्या = वार्ता + अन्या। महीपतिस्तस्मै = महीपतिः + तस्मै। प्रायच्छत् = प्र + अयच्छत् (दा धातु, लङ्-लकार) = ‘दे दिया’। तस्मै … राजपुत्राय वीरवरायचतुर्थी एकवचन (सम्प्रदान कारक — जिसे दिया गया)।
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