प्र1.
शक्तिधरः — (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) “हे पितः ! … तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ?” — शक्तिधरः किम् अवदत् ? (पृष्ठ 125)
उत्तर
उत्तरम् — शक्तिधरः अवदत् — “हे पितः ! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु। तद् अहमेव भवतः प्रियतमः इति सर्वविदितः। धन्योऽहं स्वामिजीवितरक्षार्थं यदि विनियुक्तः। तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ? एवंविधे कर्मणि राष्ट्रस्य राज्ञश्च हिताय मम सर्वस्वविनियोगः परमश्लाघ्यः।”
हिन्दी अर्थ: यह सुनकर प्रसन्नता के साथ शक्तिधर बोला — “पिताजी! आपकी सबसे प्रिय वस्तु मैं जानता हूँ। वह मैं ही हूँ — यह सब जानते हैं कि मैं आपको सबसे प्रिय हूँ। मैं धन्य हूँ, यदि स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए मेरा उपयोग हो। तो अब देर किस बात की, तात ? ऐसे काम में राष्ट्र और राजा के हित के लिए मेरा सर्वस्व लगा देना परम प्रशंसनीय है।”
ध्यातव्यम्: ‘क-भागः’ में राजलक्ष्मी की शर्त थी — ‘स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै उपहारः क्रियेत’। यहाँ पुत्र स्वयं पहचान लेता है कि वह ‘सर्वप्रिय वस्तु’ वही है — किसी को उसे कहना नहीं पड़ता। यही इस पाठ की सबसे मार्मिक पंक्ति है।
व्याकरण-सङ्केतः: तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा (श्चुत्व-छत्व सन्धि)। धन्योऽहम् = धन्यः + अहम् (विसर्ग-सन्धि)। कोऽधुना = कः + अधुना। तात — सम्बोधन एकवचन (यहाँ पुत्र पिता को आदर से ‘तात’ कहता है)।
व्याकरण-सङ्केतः: तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा (श्चुत्व-छत्व सन्धि)। धन्योऽहम् = धन्यः + अहम् (विसर्ग-सन्धि)। कोऽधुना = कः + अधुना। तात — सम्बोधन एकवचन (यहाँ पुत्र पिता को आदर से ‘तात’ कहता है)।