दीपकम् अध्याय 11 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
शक्तिधरः — (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) “हे पितः ! … तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ?” — शक्तिधरः किम् अवदत् ? (पृष्ठ 125)
उत्तर
उत्तरम् — शक्तिधरः अवदत् — “हे पितः ! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु। तद् अहमेव भवतः प्रियतमः इति सर्वविदितः। धन्योऽहं स्वामिजीवितरक्षार्थं यदि विनियुक्तः। तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ? एवंविधे कर्मणि राष्ट्रस्य राज्ञश्च हिताय मम सर्वस्वविनियोगः परमश्लाघ्यः।”
हिन्दी अर्थ: यह सुनकर प्रसन्नता के साथ शक्तिधर बोला — “पिताजी! आपकी सबसे प्रिय वस्तु मैं जानता हूँ। वह मैं ही हूँ — यह सब जानते हैं कि मैं आपको सबसे प्रिय हूँ। मैं धन्य हूँ, यदि स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए मेरा उपयोग हो। तो अब देर किस बात की, तात ? ऐसे काम में राष्ट्र और राजा के हित के लिए मेरा सर्वस्व लगा देना परम प्रशंसनीय है।”
ध्यातव्यम्: ‘क-भागः’ में राजलक्ष्मी की शर्त थी — ‘स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै उपहारः क्रियेत’। यहाँ पुत्र स्वयं पहचान लेता है कि वह ‘सर्वप्रिय वस्तु’ वही है — किसी को उसे कहना नहीं पड़ता। यही इस पाठ की सबसे मार्मिक पंक्ति है।
व्याकरण-सङ्केतः: तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा (श्चुत्व-छत्व सन्धि)। धन्योऽहम् = धन्यः + अहम् (विसर्ग-सन्धि)। कोऽधुना = कः + अधुना। तात — सम्बोधन एकवचन (यहाँ पुत्र पिता को आदर से ‘तात’ कहता है)।
प्र2.
वेदरता — “यद्येवम् अस्मत्कुलोचितं नाचरितव्यं तर्हि गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत् ?” — वेदरतायाः कथनस्य आशयः कः ? (पृष्ठ 125)
उत्तर
उत्तरम् — वेदरता वदति यत् यदि अस्माकं कुलस्य योग्यम् आचरणं न क्रियेत, तर्हि स्वामिनः गृहीतस्य वेतनस्य ऋणात् निस्तारः (मुक्तिः) कथं भवेत् ? अतः कुलोचितम् आचरणम् अवश्यं करणीयम् एव।

माता विरोध नहीं करती — वह कुल-धर्म का तर्क देकर पति और पुत्र का निश्चय और पक्का कर देती है। उसका प्रश्न वस्तुतः प्रश्न नहीं, उत्तर है : “यदि हम अपने कुल के योग्य आचरण न करें, तो लिए हुए वेतन का ऋण चुकेगा कैसे?”

हिन्दी अर्थ: “यदि ऐसा है (कि पुत्र का समर्पण करना है), और हमारे कुल के योग्य आचरण न किया जाए, तो स्वामी से लिए हुए वेतन (के ऋण) से छुटकारा कैसे मिलेगा?”
व्याकरण-सङ्केतः: यद्येवम् = यदि + एवम् (यण् सन्धि)। नाचरितव्यम् = न + आचरितव्यम् (दीर्घ सन्धि)। भवेत् — विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन। गृहीतस्वामिवर्तनस्य — षष्ठी एकवचन; समास-विग्रह = गृहीतं यत् स्वामिवर्तनं तस्य।
प्र3.
वीरवती — “धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च। तत् कथं विलम्ब्यते ?” — वीरवती किमर्थं स्वं धन्यां मन्यते ? (पृष्ठ 125)
उत्तर
उत्तरम् — वीरवती वदति — “धन्या अहम्, यस्याः ईदृशः जनकः भ्राता च (अस्ति)। तत् कथं विलम्ब्यते ? एष एव गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारस्य उपायः।”

वीरवती स्वयं को इसलिए धन्य मानती है कि उसे ऐसा पिता (जो स्वामी के लिए सर्वस्व देने को तैयार है) और ऐसा भाई (जो हँसते हुए स्वयं को अर्पित करने चला है) मिले हैं। वह भी देर करने का कोई कारण नहीं देखती — उसके लिए यही वेतन का ऋण चुकाने का एकमात्र उपाय है।

हिन्दी अर्थ: “मैं धन्य हूँ, जिसके ऐसे पिता और ऐसा भाई हैं। तो फिर देर क्यों की जा रही है? यही तो स्वामी से लिए हुए वेतन का ऋण चुकाने का उपाय है।”
व्याकरण-सङ्केतः: धन्याहम् = धन्या + अहम् (दीर्घ सन्धि)। यस्याः — यद् (स्त्रीलिङ्ग) का षष्ठी एकवचनविलम्ब्यतेभाववाच्य, लट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘देर की जा रही है’) — यही रूप आगे ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में पढ़ाया गया है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ