प्र1.
(क) भीता ............................ तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
उत्तर
उत्तरम् — भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
श्लोक २ का उत्तरार्ध: ‘भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्॥’ — अर्थात् ‘गिरने और चिर जाने — दोनों से डरी हुई (बाघिन)’। ये ही दो डर पूरे पाठ की दो सीमाएँ हैं : ढीला बोलो तो अव्यक्त, कसकर बोलो तो पीडित।
व्याकरण: ‘पतनभेदाभ्याम्’ — पतन + भेद का द्वन्द्व समास, तृतीया विभक्ति, द्विवचन (भय-अर्थ में यहाँ ‘भीता’ के साथ)।