दीपकम् अध्याय 12 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) भीता ............................ तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।
उत्तर

उत्तरम् — भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।

श्लोक २ का उत्तरार्ध: ‘भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्॥’ — अर्थात् ‘गिरने और चिर जाने — दोनों से डरी हुई (बाघिन)’। ये ही दो डर पूरे पाठ की दो सीमाएँ हैं : ढीला बोलो तो अव्यक्त, कसकर बोलो तो पीडित
व्याकरण: ‘पतनभेदाभ्याम्’ — पतन + भेद का द्वन्द्व समास, तृतीया विभक्ति, द्विवचन (भय-अर्थ में यहाँ ‘भीता’ के साथ)।
प्र2.
(ख) ............................ लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।
उत्तर

उत्तरम् — धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।

श्लोक ४ का उत्तरार्ध:धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥’ — पूर्वार्ध में चार गुण (माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः) आ चुके हैं; शेष दो — धैर्यम् और लयसमर्थम् — यहीं आते हैं, तभी गिनती छह पूरी होती है।
अर्थ: पुस्तक की सारणी में ‘धैर्यम् = विश्वासः’ — अर्थात् आत्मविश्वास, बिना सन्देह और बिना घबराहट के पढ़ने की सामर्थ्य।
प्र3.
(ग) गीती शीघ्री ............................ तथा लिखितपाठकः।
उत्तर

उत्तरम् — गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।

श्लोक ५ का पूर्वार्ध: ‘गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।’ — ‘शिरःकम्पी’ अर्थात् यः शिरः चालयन् पठति (जो सिर हिलाते हुए पढ़ता है)।
व्याकरण: ‘शिरःकम्पी’ = शिरस् + कम्पिन् — इनि-प्रत्ययान्त कर्तृवाचक पद, प्रथमा एकवचन। ‘शिरः’ में विसर्ग है; बोलते समय उसे गिरा न दें, अन्यथा ‘शिरकम्पी’ जैसा अशुद्ध रूप बनेगा।
प्र4.
(घ) एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च ............................ ।
उत्तर

उत्तरम् — एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः

श्लोक ३ का पूर्वार्ध: ‘एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः।’ — ‘पीडिताः’ का अर्थ पुस्तक स्वयं देती है : बाधिताः (अधिकप्रयत्नयुक्ताः), अर्थात् आवश्यकता से अधिक ज़ोर लगाकर बोले गए वर्ण।
ध्यान दीजिए: यह पंक्ति दो निषेध एक साथ करती है — ‘ अव्यक्ताः’ और ‘ च पीडिताः’। इसीलिए इस रिक्तस्थान में ‘स्पष्टाः’ जैसा कोई सकारात्मक शब्द नहीं आ सकता; यहाँ दूसरी बुरी सीमा का नाम चाहिए।
प्र5.
(ङ) स्वजनः ............................ माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।
उत्तर

उत्तरम् — स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।

श्लोक १ का उत्तरार्ध: ‘स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥’ — तीनों युग्म एक ही ढाँचे पर हैं : पहले शुद्ध शब्द, फिर उसका बिगड़ा रूप — स्वजनः/श्वजनः, सकलम्/शकलम्, सकृत्/शकृत्।
सन्धि: ‘श्वजनो माभूत्’ = श्वजनः + मा + अभूत्। विसर्ग के बाद ‘म’ (मृदु व्यंजन) आने से विसर्ग का ‘ओ’ हो गया — विसर्ग-सन्धि। और ‘मा + अभूत् = माभूत्’ — दीर्घ स्वर-सन्धि।
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