दीपकम् अध्याय 12 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
षट् वेदाङ्गानि कानि सन्ति ? तेषु प्रत्येकस्य विषयः कः ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘शिक्षा-कल्प-व्याकरण-निरुक्त-छन्दः-ज्योतिषम्’ इति षट् वेदाङ्गानि सन्ति। (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष — ये छह वेदाङ्ग हैं।)

वेदाङ्गम्पुस्तक का वाक्यहिन्दी में विषय
१. शिक्षाशिक्षाग्रन्थेषु वर्णानाम् उच्चारणविधिः, स्वराः, विरामः च वर्णिताः सन्ति।वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर और विराम (कहाँ रुकें)
२. कल्पःकल्पग्रन्थेषु यज्ञादीनां क्रियाविधेः वर्णनम् अस्ति।यज्ञ आदि की क्रिया-विधि
३. व्याकरणम्व्याकरणग्रन्थेषु भाषायाः नियमाः सन्ति।भाषा के नियम
४. निरुक्तम्अस्मिन् शास्त्रे शब्दानां व्युत्पत्तिः वर्तते।शब्दों की व्युत्पत्ति (शब्द कहाँ से बना)
५. छन्दःअस्मिन् शास्त्रे मात्रा-ताल-इत्यादिदृष्ट्या गायनसम्बद्धं वर्णनम् अस्ति।मात्रा-ताल आदि की दृष्टि से गायन (छन्द-रचना)
६. ज्योतिषम्अस्मिन् शास्त्रे सूर्य-चन्द्र-इत्यादीनां नक्षत्राणां गतेः एवं तेषां प्रभावस्य वर्णनम् अस्ति।सूर्य-चन्द्र आदि नक्षत्रों की गति और उनका प्रभाव
‘अङ्ग’ क्यों कहा गया: जैसे शरीर के अङ्गों के बिना शरीर काम नहीं करता, वैसे ही इन छह शास्त्रों के बिना वेद ठीक-ठीक पढ़ा और समझा नहीं जा सकता। इसी पाठ के योग्यताविस्तर (ख) का अन्तिम श्लोक इसी रूपक को खोलता है — छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते — छन्द वेद के पैर, कल्प हाथ, ज्योतिष आँख, निरुक्त कान, शिक्षा नाक और व्याकरण मुख है।
प्र2.
‘शिक्षा’ इति वेदाङ्गे किं वर्णितम् ? अस्य पाठस्य तेन सह कः सम्बन्धः ?
उत्तर

उत्तरम् — शिक्षाग्रन्थेषु वर्णानाम् उच्चारणविधिः, स्वराः, विरामः च वर्णिताः सन्ति। (शिक्षा-ग्रन्थों में वर्णों के उच्चारण की विधि, स्वर तथा विराम का वर्णन है।)

पाठ से सम्बन्ध: यह पूरा पाठ ‘शिक्षा’ वेदाङ्ग का ही विषय है — तीनों बातें पाठ में मिलती हैं :
उच्चारणविधिः — ‘एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः’ (श्लोक ३) तथा बाघिन का दृष्टान्त (श्लोक २)।
स्वराः — इन्द्र-वृत्रासुर की कथा, जहाँ ‘इन्द्रशत्रुः’ का केवल स्वर बदलने से अर्थ ही उलट गया।
विरामः — ‘पदच्छेदः’, जिसे श्लोक ४ पाठक का एक गुण गिनाता है — ठीक जगह रुकना।
और योग्यताविस्तर के अन्तिम श्लोक का चरण ‘तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते’ पाठ के शीर्षक ‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ से सीधे जुड़ जाता है।
पारिभाषिक शब्द: ‘शिक्षा’ का यहाँ अर्थ ‘पढ़ाई / education’ नहीं है। यह ध्वनि-विज्ञान (phonetics) का प्राचीन शास्त्र है। ‘पाणिनीय-शिक्षा’, ‘माण्डूक्य-शिक्षा’, ‘याज्ञवल्क्य-शिक्षा’ — इसी शास्त्र के ग्रन्थ हैं, और योग्यताविस्तर (ख) में इन्हीं तीनों के श्लोक दिए गए हैं।
प्र3.
श्लोकः १ कथयति — ‘तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्’। ‘व्याकरणम्’ इति वेदाङ्गं किमर्थम् आवश्यकम् ?
उत्तर

उत्तरम् — व्याकरणग्रन्थेषु भाषायाः नियमाः सन्ति। अतः व्याकरणेन विना शुद्धं भाषणं शुद्धं लेखनं च न सम्भवति।

क्यों: भाषा के नियम ही तय करते हैं कि कौन-सा वर्ण कहाँ आएगा, कौन-सी विभक्ति लगेगी और शब्द का रूप क्या बनेगा। नियम न जानने पर स्वजनः बोलते-बोलते श्वजनः हो जाता है और सकृत् हो जाता है शकृत् — अर्थात् अपमानजनक या हास्यास्पद अर्थ निकल आता है। इसीलिए श्लोक कहता है — बाकी विषय भले कम पढ़ो, पर व्याकरण अवश्य पढ़ो
जोड़कर देखिए: पाणिनीय-शिक्षा के श्लोक में व्याकरण को वेद का ‘मुख’ कहा गया है — ‘मुखं व्याकरणं स्मृतम्’। मुख से ही तो बोला जाता है; इसलिए शुद्ध बोलने का शास्त्र ही व्याकरण है। यही इस पाठ के पहले श्लोक की बात है।
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