दीपकम् अध्याय 12 चित्र-संवादः तथा कथा (पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
छात्राः आचार्यं किम् अवदन् ? आचार्यः च किम् उत्तरम् अयच्छत् ?
उत्तर

छात्राः — ‘नमस्ते आचार्य ! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छामः। कृपया कथां श्रावयति वा महोदय !
आचार्यः — ‘नमस्ते छात्राः ! भवतां मनोरञ्जनार्थम् आदौ कथाश्रवणम्। अनन्तरं पाठनम्।

हिन्दी में: छात्रों ने कहा — ‘नमस्ते आचार्य! आज हम एक कथा सुनना चाहते हैं। कृपया कथा सुनाइए।’ आचार्य ने उत्तर दिया — ‘नमस्ते छात्रो! तुम्हारे मनोरंजन के लिए पहले कथा सुनना, उसके बाद पढ़ाई।’ फिर वे कहते हैं — ‘तर्हि सावधानं शृण्वन्तु’ (तो ध्यान से सुनो)।
ध्यान दीजिए:श्रावयति’ णिजन्त (प्रेरणार्थक) रूप है — श्रु (सुनना) → श्रावयति (सुनाता है)। ‘श्रोतुम्’ तुमुन्-प्रत्ययान्त = ‘सुनने के लिए’। ‘शृण्वन्तु’ लोट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन = ‘सुनें’।
प्र2.
वृत्रासुरः किमर्थं यज्ञं कारितवान् ? यज्ञे आहुतिमन्त्रः कः आसीत् ?
उत्तर

उत्तरम् — स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान्। यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत् — ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति।

हिन्दी अर्थ: देवताओं के राजा इन्द्र थे और असुरों का राजा वृत्रासुर था। दोनों में सदा वैरभाव रहता था। अपना बल बढ़ाने और इन्द्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने यज्ञ कराया। उस यज्ञ का आहुति-मन्त्र था — ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ अर्थात् ‘इन्द्रशत्रु बढ़े’।
व्याकरण-सङ्केतः:वर्धयितुम्’ तथा ‘जेतुम्’ — तुमुन्-प्रत्यय (‘…के लिए’)। ‘कारितवान्’ — णिच् + क्तवतु, अर्थात् ‘करवाया’ (स्वयं नहीं किया)। ‘वर्धस्व’ — वृध् धातु, लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन, आत्मनेपद = ‘तू बढ़’।
प्र3.
ऋत्विजः किम् अकुर्वन् ? तस्य परिणामः कः अभवत् ?
उत्तर

उत्तरम् — ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्तितवन्तः। स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः। परिणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम्। बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान्।

यह हुआ कैसे: ऋत्विजों (यज्ञ कराने वाले पुरोहितों) ने सोचा कि यज्ञ के अन्त में वृत्रासुर बलवान् होकर लोगों को सताएगा — ‘यज्ञावसाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनान् पीडयिष्यति इति विचार्य’ — इसलिए उन्होंने मन्त्र का स्वर बदल दिया
‘इन्द्रशत्रुः’ के दो पाठ —
• जैसा वृत्रासुर चाहता था : इन्द्रः शत्रुः यस्य सः — बहुव्रीहि समास, अन्त्य स्वर उदात्त → अर्थ ‘जिसका शत्रु इन्द्र है, वह (वृत्रासुर) बढ़े’।
• जैसा ऋत्विजों ने बोला : इन्द्रस्य शत्रुः — तत्पुरुष समास, आदि स्वर उदात्त → अर्थ ‘इन्द्र का शत्रु (नाश करने वाला इन्द्र) बढ़े’।
केवल स्वर बदला, एक भी अक्षर नहीं — फिर भी अर्थ उलट गया।
पाठ से जोड़िए: यही इस पाठ की जड़ है। यदि स्वर या वर्ण की एक छोटी-सी चूक पूरे मन्त्र का फल उलट सकती है, तो पढ़ते-बोलते समय हमें कितना सावधान रहना चाहिए! इसी से आगे श्लोक ३ का सिद्धान्त निकलता है — ‘एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः’।
प्र4.
कथाश्रवणानन्तरं छात्राः हिमानी च किम् अवदन् ? कथायाः शिक्षा का ?
उत्तर

छात्रः — ‘बहु सुन्दरी कथा महोदय ! तर्हि वयमपि पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कुर्मः।
हिमानी के प्रति आचार्यः — ‘त्वं यथार्थं भाषसे हिमानि ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दर्भे एव अधुना एतं विषयं पठामः।

कथा की शिक्षा: उच्चारण केवल ‘सुनने में अच्छा लगना’ नहीं है — वह अर्थ का वाहक है। स्वर या वर्ण बदलते ही वाक्य का अर्थ, और कभी-कभी उसका उल्टा अर्थ, निकल आता है। इसलिए पढ़ते समय और बोलते समय — दोनों में — उच्चारण स्पष्ट (व्यक्त) और शुद्ध होना चाहिए।
ध्यान दीजिए:हिमानि’ — सम्बोधन प्रथमा, एकवचन (मूल रूप हिमानी, ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग; सम्बोधन में ह्रस्व ‘इ’)। ‘भाषसे’ — भाष् धातु, लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन, आत्मनेपद = ‘तुम बोलती हो’।
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