प्र1.
श्लोकः १ — आलस्यात् मूर्खसंयोगाद् भयाद् रोगनिपीडनात्। अत्याशक्त्याच्च मानाच्च षड्भिर्विद्या विनश्यति॥ (माण्डूक्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — आलस्यात् · मूर्खसंयोगात् · भयात् · रोगनिपीडनात् · अत्याशक्त्या · च · मानात् · च · षड्भिः · विद्या · विनश्यति।
अन्वयः — आलस्यात्, मूर्खसंयोगात्, भयात्, रोगनिपीडनात्, अत्याशक्त्या मानात् च — (एभिः) षड्भिः विद्या विनश्यति।
अर्थः (शब्दशः) — आलस्यात् = आलस्य से · मूर्खसंयोगात् = मूर्खों की संगति से · भयात् = डर से · रोगनिपीडनात् = रोग की पीड़ा से · अत्याशक्त्या = अत्यधिक आसक्ति/लालसा से · मानात् = अभिमान से ‖ षड्भिः = इन छह कारणों से · विद्या विनश्यति = विद्या नष्ट हो जाती है।
भावः: विद्या पा लेना एक बात है, उसे बचाए रखना दूसरी। यह श्लोक विद्या के छह शत्रु गिनाता है — आलस्य (अभ्यास छूट जाता है), मूर्खों की संगति (गलत बात पक्की हो जाती है), भय (जानते हुए भी बोल नहीं पाते), रोग (मन पढ़ाई में नहीं लगता), अत्यधिक आसक्ति (मन दूसरी ओर खिंच जाता है) और अभिमान (‘मुझे तो आता ही है’ मान लेने पर सीखना बन्द हो जाता है)। यह श्लोक इसी पाठ के साथ इसलिए दिया गया है कि शुद्ध उच्चारण भी निरन्तर अभ्यास से ही टिकता है — छोड़ते ही बिगड़ जाता है।
व्याकरण: ‘आलस्यात्, मूर्खसंयोगात्, भयात्, रोगनिपीडनात्, मानात्’ — सब पञ्चमी विभक्ति, एकवचन (कारण/हेतु के अर्थ में)। ‘अत्याशक्त्या’ तृतीया एकवचन और ‘षड्भिः’ भी तृतीया बहुवचन (करण में)।
सन्धि: ‘अत्याशक्त्याच्च’ = अत्याशक्त्या + च; ‘मानाच्च’ = मानात् + च (श्चुत्व-सन्धि — त् → च्); ‘षड्भिर्विद्या’ = षड्भिः + विद्या (विसर्ग → र्)।
सन्धि: ‘अत्याशक्त्याच्च’ = अत्याशक्त्या + च; ‘मानाच्च’ = मानात् + च (श्चुत्व-सन्धि — त् → च्); ‘षड्भिर्विद्या’ = षड्भिः + विद्या (विसर्ग → र्)।