दीपकम् अध्याय 12 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
श्लोकः १ — आलस्यात् मूर्खसंयोगाद् भयाद् रोगनिपीडनात्। अत्याशक्त्याच्च मानाच्च षड्भिर्विद्या विनश्यति॥ (माण्डूक्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — आलस्यात् · मूर्खसंयोगात् · भयात् · रोगनिपीडनात् · अत्याशक्त्या · च · मानात् · च · षड्भिः · विद्या · विनश्यति।
अन्वयः — आलस्यात्, मूर्खसंयोगात्, भयात्, रोगनिपीडनात्, अत्याशक्त्या मानात् च — (एभिः) षड्भिः विद्या विनश्यति।
अर्थः (शब्दशः) — आलस्यात् = आलस्य से · मूर्खसंयोगात् = मूर्खों की संगति से · भयात् = डर से · रोगनिपीडनात् = रोग की पीड़ा से · अत्याशक्त्या = अत्यधिक आसक्ति/लालसा से · मानात् = अभिमान से ‖ षड्भिः = इन छह कारणों से · विद्या विनश्यति = विद्या नष्ट हो जाती है।
भावः: विद्या पा लेना एक बात है, उसे बचाए रखना दूसरी। यह श्लोक विद्या के छह शत्रु गिनाता है — आलस्य (अभ्यास छूट जाता है), मूर्खों की संगति (गलत बात पक्की हो जाती है), भय (जानते हुए भी बोल नहीं पाते), रोग (मन पढ़ाई में नहीं लगता), अत्यधिक आसक्ति (मन दूसरी ओर खिंच जाता है) और अभिमान (‘मुझे तो आता ही है’ मान लेने पर सीखना बन्द हो जाता है)। यह श्लोक इसी पाठ के साथ इसलिए दिया गया है कि शुद्ध उच्चारण भी निरन्तर अभ्यास से ही टिकता है — छोड़ते ही बिगड़ जाता है।
व्याकरण: ‘आलस्यात्, मूर्खसंयोगात्, भयात्, रोगनिपीडनात्, मानात्’ — सब पञ्चमी विभक्ति, एकवचन (कारण/हेतु के अर्थ में)। ‘अत्याशक्त्या’ तृतीया एकवचन और ‘षड्भिः’ भी तृतीया बहुवचन (करण में)।
सन्धि: ‘अत्याशक्त्याच्च’ = अत्याशक्त्या + च; ‘मानाच्च’ = मानात् + च (श्चुत्व-सन्धि — त् → च्); ‘षड्भिर्विद्या’ = षड्भिः + विद्या (विसर्ग → र्)।
प्र2.
श्लोकः २ — जलमभ्यासयोगेन शैलानां कुरुते क्षयम्। कर्कशानां मृदुस्पर्शं किमभ्यासात् न साध्यते? (याज्ञवल्क्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — जलम् · अभ्यासयोगेन · शैलानाम् · कुरुते · क्षयम्। कर्कशानाम् · मृदुस्पर्शम् · किम् · अभ्यासात् · न · साध्यते।
अन्वयः — जलम् अभ्यासयोगेन शैलानां क्षयं कुरुते, कर्कशानां (च) मृदुस्पर्शम् (करोति)। अभ्यासात् किं न साध्यते ?
अर्थः (शब्दशः) — जलम् = पानी · अभ्यासयोगेन = बार-बार गिरते रहने के योग से · शैलानां क्षयं कुरुते = पहाड़ों को भी घिसा देता है · कर्कशानां मृदुस्पर्शम् = कठोर वस्तुओं को कोमल स्पर्श वाला (बना देता है) ‖ अभ्यासात् किं न साध्यते = भला अभ्यास से क्या सिद्ध नहीं होता ?
भावः: पानी की एक बूँद पत्थर के आगे कुछ भी नहीं — पर वही बूँद बार-बार गिरती रहे तो पत्थर में गड्ढा बन जाता है, और नदी का पानी नुकीले पत्थरों को घिसकर चिकना गोल कर देता है। अन्तिम पंक्ति प्रश्न के रूप में उत्तर देती है — अभ्यास से कुछ भी असम्भव नहीं।
इस पाठ के लिए इसका सीधा अर्थ है : आज आपका उच्चारण अटकता हो, संयुक्ताक्षर मुश्किल लगते हों — कोई बात नहीं। रोज़ थोड़ा-थोड़ा बोलकर पढ़िए; पत्थर घिसता है, तो जीभ क्यों नहीं सधेगी? इसीलिए इस पुस्तक के अभ्यास-खण्ड का नाम ही है — ‘अभ्यासात् जायते सिद्धिः’
व्याकरण: ‘अभ्यासयोगेन’ तृतीया एकवचन; ‘अभ्यासात्’ पञ्चमी एकवचन (‘अभ्यास से’); ‘शैलानाम्’ तथा ‘कर्कशानाम्’ षष्ठी बहुवचन। ‘साध्यते’ — कर्मवाच्य रूप (यक् + आत्मनेपद), लट् लकार = ‘सिद्ध किया जाता है’।
सन्धि: ‘जलमभ्यास°’ = जलम् + अभ्यास°; ‘किमभ्यासात्’ = किम् + अभ्यासात्।
प्र3.
श्लोकः ३ — येषां तीर्थाऽगता विद्या नित्यमभ्यासवर्तिता। ते भवन्ति दुराधर्षाः ससिंहाः इव पर्वताः॥ (माण्डूक्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — येषाम् · तीर्थागता · विद्या · नित्यम् · अभ्यासवर्तिता · ते · भवन्ति · दुराधर्षाः · ससिंहाः · इव · पर्वताः।
अन्वयः — येषां विद्या तीर्थागता नित्यम् अभ्यासवर्तिता च (अस्ति), ते ससिंहाः पर्वताः इव दुराधर्षाः भवन्ति।
अर्थः (शब्दशः) — येषाम् = जिनकी · विद्या तीर्थागता = विद्या योग्य गुरु/श्रेष्ठ स्रोत से आई हुई है · नित्यम् अभ्यासवर्तिता = और नित्य अभ्यास में बनी रहती है ‖ ते = वे · ससिंहाः पर्वताः इव = सिंहों से भरे पर्वतों की भाँति · दुराधर्षाः भवन्ति = अजेय (जिन्हें कोई दबा न सके) होते हैं।
भावः: श्लोक विद्या की दो शर्तें रखता है — (1) वह तीर्थ से आई हो, अर्थात् सुयोग्य गुरु और शुद्ध परम्परा से मिली हो; और (2) वह नित्य अभ्यास में बनी रहे। दोनों हों तभी वह विद्या अजेय बनाती है।
उपमा भी सोच-समझकर चुनी गई है — पर्वत तो अपने-आप में बड़ा है ही, पर सिंहों से भरा पर्वत कोई छू भी नहीं सकता। वैसे ही, केवल पढ़ा हुआ व्यक्ति बड़ा है; पर अभ्यास से जीवित रखी विद्या वाला व्यक्ति अजेय है।
अलङ्कारः: उपमा — वाचक शब्द ‘इव’; उपमेय = विद्वान् जन, उपमान = ससिंह पर्वत, साधारण धर्म = दुराधर्षत्व (अजेयता)।
व्याकरण: ‘येषाम्’ षष्ठी बहुवचन; ‘ससिंहाः’ बहुव्रीहि समास = ‘सिंहों सहित’। ‘तीर्थागता’ = तीर्थात् आगता।
सन्धि: ‘नित्यमभ्यास°’ = नित्यम् + अभ्यास°।
प्र4.
श्लोकः ४ — काकचेष्टो बकध्यानः श्वाननिद्रस्तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणः॥ (लोकप्रचलित-नीतिश्लोकः) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — काकचेष्टः · बकध्यानः · श्वाननिद्रः · तथा · एव · च · अल्पाहारी · गृहत्यागी · विद्यार्थी · पञ्चलक्षणः।
अन्वयः — काकचेष्टः, बकध्यानः, श्वाननिद्रः तथैव च अल्पाहारी, गृहत्यागी (च) — (एवं) विद्यार्थी पञ्चलक्षणः (भवति)।
लक्षणम्शब्दशः अर्थविद्यार्थी के लिए इसका अर्थ
काकचेष्टःकौए जैसी चेष्टा वालासदा सतर्क और चौकन्ना, हर अवसर पकड़ने वाला
बकध्यानःबगुले जैसे ध्यान वालाएकाग्रता — जब तक लक्ष्य न मिले, दृष्टि हटे नहीं
श्वाननिद्रःकुत्ते जैसी नींद वालाहल्की नींद — पुकारते ही जाग जाना, आलस्य नहीं
अल्पाहारीथोड़ा खाने वालाकम और सन्तुलित भोजन — भरा पेट पढ़ाई नहीं होने देता
गृहत्यागीघर छोड़ने वालाविद्या के लिए घर की सुख-सुविधा छोड़ने को तैयार
भावः: यह बहुत प्रसिद्ध नीतिश्लोक है। यहाँ तीनों पशु-पक्षियों की उपमा उनके गुण के लिए है, स्वभाव के लिए नहीं — कौए की चालाकी नहीं, उसकी सतर्कता; कुत्ते का भौंकना नहीं, उसकी हल्की नींद। इस पाठ के सन्दर्भ में सबसे काम का लक्षण है बकध्यानः — क्योंकि एकाग्रता के बिना न पदच्छेद ठीक पड़ता है, न वर्ण स्पष्ट निकलते हैं।
व्याकरण: ‘काकचेष्टः’, ‘बकध्यानः’, ‘श्वाननिद्रः’, ‘पञ्चलक्षणः’ — सब बहुव्रीहि समास (‘काकस्य इव चेष्टा यस्य सः’)। ‘अल्पाहारी’, ‘गृहत्यागी’ — णिनि-प्रत्ययान्त।
सन्धि: ‘काकचेष्टो बकध्यानः’ = काकचेष्टः + बकध्यानः (विसर्ग → ओ); ‘श्वाननिद्रस्तथैव’ = श्वाननिद्रः + तथा + एव (विसर्ग-सन्धि तथा वृद्धि-सन्धि ‘आ + ए = ऐ’)।
प्र5.
श्लोकः ५ — यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रुषुरधिगच्छति॥ (याज्ञवल्क्य-शिक्षा) — अस्य पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — यथा · खनन् · खनित्रेण · नरः · वारि · अधिगच्छति · तथा · गुरुगताम् · विद्याम् · शुश्रूषुः · अधिगच्छति।
अन्वयः — यथा नरः खनित्रेण खनन् वारि अधिगच्छति, तथा शुश्रूषुः गुरुगतां विद्याम् अधिगच्छति।
अर्थः (शब्दशः) — यथा = जैसे · नरः = मनुष्य · खनित्रेण खनन् = कुदाल से खोदता हुआ · वारि अधिगच्छति = (भूमि से) जल पा लेता है ‖ तथा = वैसे ही · शुश्रूषुः = सेवा करने वाला (शिष्य) · गुरुगतां विद्याम् = गुरु में स्थित विद्या को · अधिगच्छति = प्राप्त कर लेता है।
भावः: जल भूमि के भीतर पहले से है — पर वह अपने-आप ऊपर नहीं आता; खोदना पड़ता है। वैसे ही विद्या गुरु के भीतर पहले से है — पर वह अपने-आप शिष्य में नहीं उतरती; शुश्रूषा (सेवा, विनय और श्रद्धा से सुनना) करनी पड़ती है।
उपमा का सबसे सुन्दर बिन्दु यह है कि दोनों जगह श्रम शिष्य का है, वस्तु दूसरे के पास — इसलिए विद्या माँगने से नहीं, अर्जित करने से मिलती है।
अलङ्कारः: उपमा (यथा… तथा)। उपमेय = शुश्रूषु शिष्य का विद्या पाना, उपमान = खोदकर जल पाना, साधारण धर्म = श्रम से प्राप्ति
व्याकरण: ‘खनन्’ — शतृ-प्रत्ययान्त (‘खोदता हुआ’), प्रथमा एकवचन। ‘खनित्रेण’ तृतीया एकवचन (करण — ‘कुदाल से’)। ‘शुश्रूषुः’ — उ-प्रत्ययान्त (‘सुनने/सेवा करने की इच्छा वाला’)।
सन्धि: ‘नरो वारि’ = नरः + वारि; ‘वार्यधिगच्छति’ = वारि + अधिगच्छति (यण्-सन्धि — इ → य्); ‘शुश्रूषुरधिगच्छति’ = शुश्रूषुः + अधिगच्छति (विसर्ग → र्)।
पाठ-सूचना: पुस्तक में ‘शुश्रुषुः’ छपा है; शुद्ध रूप शुश्रूषुः (दीर्घ ऊ) है।
प्र6.
श्लोकः ६ — छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते। ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते॥ शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्। तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय-शिक्षा कारिका) — अनयोः पदच्छेदम् अन्वयम् अर्थं भावं च लिखत।
उत्तर
पदच्छेदः — छन्दः · पादौ · तु · वेदस्य · हस्तौ · कल्पः · अथ · पठ्यते। ज्योतिषाम् · अयनम् · चक्षुः · निरुक्तम् · श्रोत्रम् · उच्यते। शिक्षा · घ्राणम् · तु · वेदस्य · मुखम् · व्याकरणम् · स्मृतम्। तस्मात् · साङ्गम् · अधीत्य · एव · ब्रह्मलोके · महीयते।
अन्वयः — छन्दः तु वेदस्य पादौ, अथ कल्पः हस्तौ पठ्यते। ज्योतिषाम् अयनं चक्षुः, निरुक्तं श्रोत्रम् उच्यते। शिक्षा तु वेदस्य घ्राणम्, व्याकरणं (च) मुखं स्मृतम्। तस्मात् साङ्गम् (वेदम्) अधीत्य एव (जनः) ब्रह्मलोके महीयते।
वेदाङ्गम्वेद-पुरुष का अङ्गक्यों वही अङ्ग
छन्दःपादौ (दोनों पैर)छन्द पर ही वेद खड़ा और गतिमान है
कल्पःहस्तौ (दोनों हाथ)हाथ से काम होता है — कल्प यज्ञ की क्रिया बताता है
ज्योतिषम्चक्षुः (आँख)आँख से दूर देखते हैं — ज्योतिष काल और नक्षत्र देखता है
निरुक्तम्श्रोत्रम् (कान)कान से शब्द ग्रहण होता है — निरुक्त शब्द का मूल बताता है
शिक्षाघ्राणम् (नाक)नाक श्वास और स्वर का द्वार है — शिक्षा उच्चारण सिखाती है
व्याकरणम्मुखम् (मुख)मुख से बोला जाता है — व्याकरण शुद्ध रूप गढ़ता है
भावः: यहाँ पूरे वेद को एक पुरुष (शरीर) मानकर छहों वेदाङ्गों को उसके अङ्ग बताया गया है — यही रूपक अलंकार है। जब सब अङ्ग साथ हों तभी शरीर पूरा है; इसलिए अन्तिम चरण कहता है — ‘तस्मात् साङ्गम् अधीत्य एव ब्रह्मलोके महीयते’ — वेद को उसके छहों अङ्गों सहित पढ़कर ही मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मान पाता है।
यही श्लोक इस पाठ का नाम पूरा करता है। पाठ का शीर्षक है ‘सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ और यहाँ है ‘साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते’ — दोनों में फल एक ही है, और उस तक पहुँचने का पहला अङ्ग वही ‘शिक्षा’ है जिस पर यह पूरा पाठ है।
व्याकरण: ‘पादौ’, ‘हस्तौ’ — प्रथमा विभक्ति, द्विवचन (दो पैर, दो हाथ)। ‘वेदस्य’ षष्ठी एकवचन। ‘पठ्यते’, ‘उच्यते’, ‘महीयते’ — कर्मवाच्य / आत्मनेपदी लट् रूप। ‘अधीत्य’ — ल्यप्-प्रत्यय (‘पढ़कर’)।
सन्धि: ‘कल्पोऽथ’ = कल्पः + अथ (पूर्वरूप-सन्धि, अवग्रह ‘ऽ’); ‘चक्षुर्निरुक्तम्’ = चक्षुः + निरुक्तम्; ‘श्रोत्रमुच्यते’ = श्रोत्रम् + उच्यते; ‘साङ्गमधीत्यैव’ = साङ्गम् + अधीत्य + एव (‘अधीत्य + एव’ में वृद्धि-सन्धि ‘अ + ए = ऐ’)।
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