पदच्छेदः — वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् आपत्-काले हि उपस्थिते । सर्वत्र एवम् विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम् ।
अन्वयः — आपत्-काले हि उपस्थिते वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् । तु सर्वत्र एवम् विचारे (सति) भोजने अपि अप्रवर्तनम् (भवेत्) ।
अर्थः — आपत्ति आने पर वृद्धों (अनुभवी जनों) का वचन मान लेना चाहिए। किन्तु यदि हर जगह इसी तरह (शंका करते हुए) विचार किया जाए तो भोजन में भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।
भावः — यह श्लोक कपोत की तर्क-सदृश कुतर्क है। वह कहता है — शंका करते जाओ तो खाना भी नहीं खाया जा सकता, क्योंकि उसमें भी विष की शंका हो सकती है। बात सुनने में चतुर लगती है, पर उसमें भेद यह छूट जाता है कि सामान्य सावधानी और निष्कारण भय एक वस्तु नहीं हैं। चित्रग्रीव ने सब भोजन का निषेध नहीं किया था — केवल निर्जन वन में बिना कारण मिले भोजन का निषेध किया था।
ऐसा क्यों समझें: कथा इसी कुतर्क का परिणाम तत्काल दिखा देती है — अगले ही वाक्य में सब जाल में बँध जाते हैं। हितोपदेश की शैली यही है : वह उपदेश नहीं देता, परिणाम दिखा देता है।
सन्धिः: ग्राह्यम् + आपत्काले = ग्राह्यमापत्काले ; हि + उपस्थिते = ह्युपस्थिते (यण् सन्धि) ; सर्वत्र + एवम् = सर्वत्रैवम् (वृद्धि सन्धि) ; भोजने + अपि + अप्रवर्तनम् = भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् (पूर्वरूप + यण्)।