दीपकम् अध्याय 2 पाठ्य-प्रश्नाः (कथा-भागः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः ? तद् निरूप्यताम् ।”
उत्तर

चित्रग्रीवस्य निष्कर्षः — कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।

[हिन्दी — चित्रग्रीव कहता है — “इस निर्जन वन में चावल के दाने भला कहाँ से आ सकते हैं? इस पर विचार किया जाए। यहाँ कोई बहेलिया अवश्य होगा। बिना सोचा हुआ काम किसी भी हाल में नहीं करना चाहिए।”]

ऐसा क्यों: चित्रग्रीव जाल नहीं देखता — वह केवल एक असंगति देखता है। निर्जन वन में चावल अपने-आप नहीं आते; जहाँ बिना कारण लाभ दिखे वहाँ कारण छिपा होता है। यही ‘निरूप्यताम्’ (जाँचा जाए) का अर्थ है। बुद्धिमत्ता खतरे को देख लेना नहीं, खतरे का संकेत पढ़ लेना है।
व्याकरणम्: ‘निरूप्यताम्’ तथा ‘चिन्त्यताम्’ — कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘जाँचा जाए’, ‘सोचा जाए’)। संस्कृत में उपदेश देते समय यह विनम्र प्रयोग बहुत आता है।
प्र2.
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् – “आः किमर्थम् एवमुच्यते ?”
उत्तर

तस्य दर्पस्य फलम् — तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः । अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्

[हिन्दी — एक कपोत घमण्ड से बोला — “अरे! ऐसा क्यों कहा जा रहा है?” उसकी बात मानकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सब कपोत भूमि पर उतर आए और चावल खाने लगे। तुरन्त ही वे सब उस जाल में बँध गए।]

ऐसा क्यों: ध्यान दें — कपोतों ने तर्क का उत्तर तर्क से नहीं दिया, दर्प से दिया। यही पाठ की चेतावनी है : विपत्ति लोभ से आती है, पर लोभ को रास्ता अहंकार देता है। और इसीलिए बाद में चित्रग्रीव उसी दर्पी कपोत का तिरस्कार नहीं करता — क्योंकि तब वह भी वही गलती दोहरा रहा होता।
व्याकरणम्: ‘उच्यते’ — वच् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘कहा जाता है’)। ‘सदर्पम्’ = दर्पेण सह — अव्ययीभाव-सदृश क्रियाविशेषण।
प्र3.
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते । सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १॥ — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदं, अन्वयम्, अर्थं भावं च लिखत ।
उत्तर

पदच्छेदः — वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् आपत्-काले हि उपस्थिते । सर्वत्र एवम् विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम् ।

अन्वयः — आपत्-काले हि उपस्थिते वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् । तु सर्वत्र एवम् विचारे (सति) भोजने अपि अप्रवर्तनम् (भवेत्) ।

अर्थः — आपत्ति आने पर वृद्धों (अनुभवी जनों) का वचन मान लेना चाहिए। किन्तु यदि हर जगह इसी तरह (शंका करते हुए) विचार किया जाए तो भोजन में भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।

भावः — यह श्लोक कपोत की तर्क-सदृश कुतर्क है। वह कहता है — शंका करते जाओ तो खाना भी नहीं खाया जा सकता, क्योंकि उसमें भी विष की शंका हो सकती है। बात सुनने में चतुर लगती है, पर उसमें भेद यह छूट जाता है कि सामान्य सावधानी और निष्कारण भय एक वस्तु नहीं हैं। चित्रग्रीव ने सब भोजन का निषेध नहीं किया था — केवल निर्जन वन में बिना कारण मिले भोजन का निषेध किया था।

ऐसा क्यों समझें: कथा इसी कुतर्क का परिणाम तत्काल दिखा देती है — अगले ही वाक्य में सब जाल में बँध जाते हैं। हितोपदेश की शैली यही है : वह उपदेश नहीं देता, परिणाम दिखा देता है।
सन्धिः: ग्राह्यम् + आपत्काले = ग्राह्यमापत्काले ; हि + उपस्थिते = ह्युपस्थिते (यण् सन्धि) ; सर्वत्र + एवम् = सर्वत्रैवम् (वृद्धि सन्धि) ; भोजने + अपि + अप्रवर्तनम् = भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् (पूर्वरूप + यण्)।
प्र4.
अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वामिन् ! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?”
उत्तर

चित्रग्रीवस्य उत्तरम् — प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति ।

[हिन्दी — बहेलिये को लौटा हुआ देखकर कपोतों ने पूछा — “स्वामी! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव ने कहा — “प्रिय कपोतो! हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारे बन्धन काट देगा।”]

ऐसा क्यों: कपोत उड़ तो गए, पर जाल-सहित उड़े — अर्थात् संकट टला नहीं, केवल स्थगित हुआ। इसलिए चित्रग्रीव उड़ान को उपलब्धि नहीं मानता और तुरन्त दूसरा चरण बताता है। ध्यान दें — कपोतों के पास पंख हैं पर दाँत नहीं; चूहे के पास दाँत हैं पर पंख नहीं। मित्रलाभ प्रकरण का सार यही है : जो हमारे पास नहीं, वह मित्र के पास है।
सन्धिः तथा व्याकरणम्: ‘हिरण्यको नाम’ = हिरण्यकः + नाम (विसर्गसन्धि, अः + न् = ओ)। ‘सोऽस्माकम्’ = सः + अस्माकम्। ‘छेत्स्यति’ — छिद् धातु, लृट् लकार (भविष्यत्), प्रथमपुरुष एकवचन।
प्र5.
कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – “मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः । तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?”
उत्तर

उत्तरम् (कथायाः फलम्) — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।

[हिन्दी — नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सब भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के काम में लग गए। भगीरथ जैसे प्रयत्नों से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के भी प्राण बचा लिए।]

ऐसा क्यों: यह प्रश्न उत्तर माँगने के लिए नहीं, कर्म कराने के लिए है। नायक तीन चीज़ें एक साथ हटवाता है — भय (जो रोकता है), शोक (जो थकाता है) और सन्देह (जो बाँटता है)। ये तीनों हट जाएँ तो जो बचता है वही ‘संहति’ है। और ध्यान दें अन्तिम पंक्ति — उन्होंने अपने ही नहीं, दूसरों के भी प्राण बचाए; ठीक वैसे जैसे चित्रग्रीव ने पहले आश्रितों के पाश कटवाए।
शब्दार्थः: ‘भगीरथप्रयत्नैः’ — भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए जो अथक तप किया, उसी से हिन्दी का मुहावरा ‘भगीरथ प्रयत्न’ बना — अर्थात् अत्यन्त कठिन एवं अविराम परिश्रम।
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