दीपकम् अध्याय 2 पाठ्य-प्रश्नाः (संवादः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
दिनेशः – (सविषादम्) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति । एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः

[हिन्दी — दिनेश निराशा में कहता है कि मृत्यु ही पास खड़ी है, ऐसे में उपाय कैसे सोचा जाए? नायक उत्तर देता है — “मित्र! विषाद मत करो। जब वर्षा थम जाएगी और वातावरण साफ़ हो जाएगा, तब हम मिलकर पुल और रास्ता बनाकर फिर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे।”]

ऐसा क्यों: दिनेश का प्रश्न वस्तुतः प्रश्न नहीं, हार है — वह मान चुका है कि कुछ हो ही नहीं सकता। नायक उसे तर्क से नहीं, क्रम से उत्तर देता है — पहले वृष्टि शान्त हो, फिर वातावरण स्वच्छ हो, फिर सम्भूय (मिलकर) निर्माण हो। संकट को टुकड़ों में बाँट देना ही उसे साध्य बना देता है। यही पूरे पाठ का सूत्र है।
व्याकरणम्: ‘सम्भूय’ = सम् + भू + ल्यप् (मिलकर) तथा ‘निर्माय’ = निर् + मा + ल्यप् (बनाकर)। दोनों अव्यय हैं और पूर्वकालिक क्रिया बताते हैं — पहले मिलना/बनाना, फिर जाना।
प्र2.
सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः ?
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।

[हिन्दी — सुरेश पूछता है — “इस स्थिति में क्या हम यह अत्यन्त कठिन और असम्भव काम कर सकते हैं?” नायक कहता है — “प्रिय मित्रो! हम आत्मविश्वास के बल से मिलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर लेंगे। उससे हमारा लक्ष्य भी मिलेगा और प्राण भी बचेंगे।”]

ऐसा क्यों: नायक दो शब्द जोड़ता है — आत्मविश्वासबलेन और सम्भूय। अकेला आत्मविश्वास डींग है, अकेला संगठन बिना भरोसे के बिखर जाता है; दोनों मिलकर ही ‘असम्भव’ को ‘दुःसाध्य’ भर बना देते हैं। ध्यान दें — नायक यह नहीं कहता कि काम आसान है, केवल यह कहता है कि वह साध्य है।
शब्दार्थः: दुःसाध्यम् = कठिनतया साधनीयम् (कठिनाई से होने वाला)। ‘साधयितुम्’ = साध् धातु का तुमुन्-प्रत्ययान्त रूप (सिद्ध करने के लिए)।
प्र3.
कपिलः – किम् इदं सम्भवति ?
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि ।

[हिन्दी — कपिल सन्देह करता है — “क्या यह सम्भव है?” नायक कहता है — “निश्चय ही सम्भव है, मित्र! इसी प्रसंग में मैं तुम्हें हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।”]

ऐसा क्यों: यहीं पाठ की रचना-कुशलता दिखती है। नायक सन्देह का उत्तर उपदेश से नहीं, कथा से देता है। उपदेश सुनकर मन तर्क करने लगता है, पर कथा सुनकर मन उदाहरण देख लेता है — और कपोतों का उदाहरण ठीक उन्हीं की स्थिति का है : जाल में फँसे, संख्या में बहुत, अकेले कोई असमर्थ।
व्याकरणम्: ‘श्रावयामि’ — श्रु धातु का णिजन्त (प्रेरणार्थक) रूप, लट् लकार, उत्तमपुरुष एकवचन — ‘मैं सुनाता हूँ’ (सुनने के लिए प्रेरित करता हूँ)। साधारण रूप ‘शृणोमि’ का अर्थ होता ‘मैं सुनता हूँ’।
प्र4.
सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा ? वद मित्र ! वद ।
उत्तर

नायकस्य उत्तरम् — सावधानं शृण्वन्तु — इति उक्त्वा सः हितोपदेशस्य ‘मित्रलाभ’-प्रकरणस्य चित्रग्रीव-कपोत-हिरण्यक-कथां श्रावयति ।

[हिन्दी — सब उत्सुकता से पूछते हैं — “कौन-सी कथा? कहो मित्र, कहो!” नायक कहता है — “ध्यान से सुनिए” — और हितोपदेश के ‘मित्रलाभ’ प्रकरण की वह कथा सुनाता है जिसमें कपोतराज चित्रग्रीव, बहेलिया और मूषकराज हिरण्यक आते हैं।]

ध्यातव्यम्: ‘शृण्वन्तु’ — श्रु धातु, लोट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (आदरार्थ ‘सुनिए’)। ‘सावधानम्’ यहाँ क्रियाविशेषण-रूप में प्रयुक्त द्वितीयान्त पद है।
स्मरणीयम्: पूरा पाठ इसी शैली में चलता है — बाहर की कथा (छात्रों की यात्रा) के भीतर एक और कथा। संस्कृत में इसे कथा के भीतर कथा (गर्भकथा) की परम्परा कहते हैं, जो पञ्चतन्त्र और हितोपदेश की पहचान है।
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