नायकस्य उत्तरम् — मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
[हिन्दी — दिनेश निराशा में कहता है कि मृत्यु ही पास खड़ी है, ऐसे में उपाय कैसे सोचा जाए? नायक उत्तर देता है — “मित्र! विषाद मत करो। जब वर्षा थम जाएगी और वातावरण साफ़ हो जाएगा, तब हम मिलकर पुल और रास्ता बनाकर फिर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे।”]
ऐसा क्यों: दिनेश का प्रश्न वस्तुतः प्रश्न नहीं, हार है — वह मान चुका है कि कुछ हो ही नहीं सकता। नायक उसे तर्क से नहीं, क्रम से उत्तर देता है — पहले वृष्टि शान्त हो, फिर वातावरण स्वच्छ हो, फिर सम्भूय (मिलकर) निर्माण हो। संकट को टुकड़ों में बाँट देना ही उसे साध्य बना देता है। यही पूरे पाठ का सूत्र है।
व्याकरणम्: ‘सम्भूय’ = सम् + भू + ल्यप् (मिलकर) तथा ‘निर्माय’ = निर् + मा + ल्यप् (बनाकर)। दोनों अव्यय हैं और पूर्वकालिक क्रिया बताते हैं — पहले मिलना/बनाना, फिर जाना।