दीपकम् अध्याय 2 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत — यथा — तिरस्कुर्वन्ति — दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति ।
उत्तर

यह उदाहरण पुस्तक में दिया हुआ है। इससे विधि समझ लीजिए — पहले क्रियापद का लकार, पुरुष और वचन देखिए, फिर उसी के अनुरूप कर्ता चुनकर एक छोटा-सा नया वाक्य बनाइए।

तिरस्कुर्वन्ति → लट् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन
अतः कर्ता भी बहुवचन चाहिए → दुर्जनाः
वाक्यम् — दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति ।
ध्यान इसी पर दीजिए: नया वाक्य बनाते समय क्रियापद को बदलना नहीं है — वह जैसा दिया है वैसा ही रहेगा। बदलना केवल कर्ता और कर्म को है, और वह भी इस तरह कि क्रिया के पुरुष-वचन से मेल खा जाए। यही इस अभ्यास का पूरा कौशल है।
प्र2.
क्रियताम् — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — छात्रैः गृहकार्यं सम्यक् क्रियताम् ।

[हिन्दी — छात्रों द्वारा गृहकार्य भली-भाँति किया जाए।]

व्याकरणम्: ‘क्रियताम्’ — कृ धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘किया जाए’)। कर्मवाच्य होने से कर्ता तृतीया में (छात्रैः) और कर्म प्रथमा में (गृहकार्यम्) आएगा। पाठ के ‘चिन्त्यताम्’, ‘निरूप्यताम्’, ‘उड्डीयताम्’ इसी प्रकार के रूप हैं।
अन्यम् उदाहरणम्: अस्माभिः विपत्काले धैर्यम् अवलम्ब्य उपायः क्रियताम् ।
प्र3.
निवसति — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — मम मित्रं वाराणस्यां निवसति ।

[हिन्दी — मेरा मित्र वाराणसी में रहता है।]

व्याकरणम्: ‘निवसति’ — नि + वस्, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन। ‘रहना’ अर्थ में स्थान सप्तमी विभक्ति में आता है — ‘वाराणस्याम्’। पाठ का वाक्य — ‘हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति।’
प्र4.
आह — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — गुरुः शिष्यम् आह — “सत्यं वद, धर्मं चर” इति ।

[हिन्दी — गुरु शिष्य से कहते हैं — “सच बोलो, धर्म का आचरण करो।”]

व्याकरणम्: ‘आह’ — ब्रू (कथन-अर्थक) धातु का विशेष रूप, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘कहता है / कहा’। इसके साथ जिससे कहा जाए वह द्वितीया में आता है (शिष्यम्)। पाठ में — ‘कपोतान् प्रति आह।’
प्र5.
छेत्स्यति — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — कृषकः तीक्ष्णेन शस्त्रेण वृक्षस्य शुष्कां शाखां छेत्स्यति ।

[हिन्दी — किसान तेज़ हथियार से पेड़ की सूखी शाखा काटेगा।]

व्याकरणम्: ‘छेत्स्यति’ — छिद् धातु, लृट् लकार (भविष्यत्), प्रथमपुरुष एकवचन — ‘काटेगा’। पाठ में — ‘सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति।’
प्र6.
सम्भाषसे — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — सखे ! त्वम् अद्य मया सह किमर्थं न सम्भाषसे ?

[हिन्दी — मित्र! तुम आज मेरे साथ बात क्यों नहीं कर रहे?]

व्याकरणम्: ‘सम्भाषसे’ — सम् + भाष्, आत्मनेपदी, लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन — ‘तुम बात करते हो’। इसलिए कर्ता ‘त्वम्’ ही होगा। ‘सह’ के योग में तृतीया आती है — ‘मया सह’। पाठ का वाक्य — ‘सखे हिरण्यक ! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे ?’
प्र7.
अब्रवीत् — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — पिता पुत्रम् अब्रवीत् — “परिश्रमेण एव सफलता लभ्यते” इति ।

[हिन्दी — पिता ने पुत्र से कहा — “परिश्रम से ही सफलता मिलती है।”]

व्याकरणम्: ‘अब्रवीत्’ — ब्रू धातु, लङ् लकार (भूतकाल), प्रथमपुरुष एकवचन — ‘कहा’। पाठ में — ‘हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत्।’
प्र8.
उपसर्पति — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — क्षुधार्तः बालकः मातरम् उपसर्पति ।

[हिन्दी — भूख से पीड़ित बालक माता के पास जाता है।]

व्याकरणम्: ‘उपसर्पति’ = उप + सृप्, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘पास आता है’ (समीपम् आगच्छति)। जिसके पास जाया जाए वह द्वितीया में आता है। पाठ में — ‘हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति।’
प्र9.
युज्यते — ………………
उत्तर

नमूना वाक्यम् — विपत्काले धैर्यम् एव युज्यते, न तु विषादः ।

[हिन्दी — विपत्ति के समय धैर्य ही उचित है, विषाद नहीं।]

व्याकरणम्: ‘युज्यते’ — युज् धातु, कर्मवाच्य/भाववाच्य, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘जोड़ा जाता है’, और लक्षणा से ‘उचित होता है, फबता है’। अभ्यास प्रश्न 6 का ‘योजयत’ इसी धातु का प्रेरणार्थक लोट्-रूप है।
अन्यम् उदाहरणम्: छात्राणां कृते नियमितम् अध्ययनं युज्यते ।
प्र10.
अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु ।
उत्तर

परिचर्चा कैसे कीजिए — कक्षा को चार-चार के दल में बाँटिए। हर दल कथा से एक शिक्षा चुने, उसे कथा की एक घटना से सिद्ध करे, और फिर अपने विद्यालय या मुहल्ले से उसका एक उदाहरण दे। अन्त में शिक्षक श्यामपट्ट पर सभी शिक्षाओं की सूची बना दें। एक अच्छे उत्तर में तीनों होने चाहिए — शिक्षा, कथा का प्रमाण, अपने जीवन का उदाहरण।

शिक्षाकथायाः प्रमाणम्स्वजीवने प्रयोगः
संगठन में शक्ति हैअकेला कपोत जाल नहीं उठा सका; सब मिलकर जाल-सहित उड़ गएविद्यालय की सफ़ाई या वृक्षारोपण — सब मिलकर करें तो एक घण्टे का काम
लोभ विपत्ति का द्वार हैनिर्जन वन में चावल देखकर कपोत लालच में उतर पड़ेबिना जाने किसी अनजान लिंक या मुफ़्त उपहार पर क्लिक न करना
विपत्ति में धैर्य, दोषारोपण नहींचित्रग्रीव ने दर्पी कपोत का तिरस्कार नहीं किया, उपाय सोचापरीक्षा में अंक कम आने पर एक-दूसरे को दोष देने के बजाय कमी ढूँढ़ना
नेता पहले अपने साथियों को देखता है“पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम”दल-नायक पहले सब सदस्यों को काम और श्रेय बाँटे
सच्चा मित्र संकट में काम आता हैहिरण्यक ने अपने मित्रों-सहित सब कपोतों के बन्धन काट दिएबीमार या पिछड़ रहे सहपाठी की पढ़ाई में सहायता करना
बड़ों/अनुभवी की बात सुननी चाहिएचित्रग्रीव ने चेताया, कपोतों ने अवज्ञा की और बँध गएयात्रा या खेल में शिक्षक-अभिभावक की चेतावनी को हल्के में न लेना
नमूना उत्तर (परिचर्चायाः सारांशः): “इस कथा से हमें सबसे बड़ी शिक्षा यह मिलती है कि संगठन बल को नहीं, स्वरूप को बदल देता है। तिनका अकेला तिनका है, पर बटकर रस्सी बन जाए तो मतवाले हाथी को बाँध लेता है। कपोत अकेले-अकेले जाल में मरते, पर एक चित्त होकर उन्होंने उसी जाल को उठा लिया। हमारे जीवन में भी अनेक काम ऐसे हैं जो अकेले असम्भव लगते हैं — विद्यालय की स्वच्छता, बाढ़ या भूकम्प में सहायता, मुहल्ले में जल-संरक्षण। इनमें सबसे कठिन भाग शक्ति जुटाना नहीं, एकचित्त होना है। इसलिए हम यह संकल्प लें कि किसी भी सामूहिक कार्य में हम पहले दिशा तय करेंगे, फिर मिलकर एक ही दिशा में शक्ति लगाएँगे।”
ध्यातव्यम्: परिचर्चा में अपने शब्दों में बोलिए और अपने आसपास का ही उदाहरण दीजिए — पाठ से केवल एक वाक्य उद्धृत कर दीजिए, पूरी कथा दोहराने की आवश्यकता नहीं।
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